राष्ट्रीय जलीय जीव को बचाना सबसे जरूरी

जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया गंगा भूमि प्रादेशिक केंद्र, पटना में गांगेय एवं समुद्री डॉल्फिन पर राष्ट्रीय वेबिनार का आयोजन

डॉल्फिन को बचाना सबसे जरूरी 

पटना के जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया गंगा भूमि प्रादेशिक केंद्र, पटना में गांगेय एवं समुद्री डॉल्फिन के संरक्षण को लेकर एक राष्ट्रीय वेबिनार का आयोजन किया गया.




इस वेबिनार में बोलते हुए जूलॉजिकल सर्वे ऑफ कोलकाता के निदेशक डॉ. कैलाश चंद्र ने कहा कि भारत में डॉल्फिन राष्ट्रीय जलीय जन्तु है. भारत के माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने 15 अगस्त 2020 को लाल किले के प्राचीर से गंगेय डॉल्फिन एवं समुद्री डॉल्फिन के संरक्षण पर एक राष्ट्रीय कार्यक्रम प्रोजेक्ट डॉल्फिन कि घोषणा की है जो देश में प्रोजेक्ट टाइगर तथा प्रोजेक्ट एलिफैंट के तर्ज पर चलेगा. इसके लिए हम प्रधानमंत्री जी को धन्यवाद देते हैं. डॉल्फिन के संरक्षण के कार्य अत्यंत महत्वपूर्ण हिं क्योंकि यह राष्ट्रीय संपदा है. जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया डॉल्फिन के संरक्षण में हर संभव सहयोग करेगा. हम प्रशिक्षित लोगों के साथ मिलकर डॉल्फिन को बचाने की मुहिम जल्द शुरू कर रहे हैं.

वहीं श्रीमाता वैष्णव देवी विश्वविद्यालय कटरा, जम्मू के कुलपति और डॉल्फिनमैन के नाम से विख्यात प्रो. आर के सिन्हा ने डॉल्फिन की उत्पत्ति, इसकी इतिहास एवं आजतक किये गए  इसके संरक्षण पर प्रकाश डाला.  उन्होंने कहा कि डॉल्फिन को कुछ लोग भगवान शिव का दूत मानते हैं. इसका कैरेक्टर 20 मिलियन वर्षों में भी नहीं बदला है. प्रो. सिन्हा ने डॉल्फिन के ब्लाइंड होने के रहस्यों पर भी शोध करने की जरूरत बताई. उन्होंने डॉल्फिन के संरक्षण पर जोर देते हुए कहा कि इन दिनों सोन के क्षेत्रों में बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश की सीमा पर डॉल्फिन की संख्या घट रही है जो चिंता की बात है. उन्होंने नदियों में पानी की कमी तथा इनके धार में कमी की ओर ध्यान आकृष्ट करते हुए कहा कि जरुरत से ज्यादा नदियों से पानी निकालने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि जहां कम पानी की जरुरत है वहां अधिक पानी न निकालें.

वहीं डब्लूटीआई नई दिल्ली के उप-निदेशक डॉ. समीर कुमार सिन्हा ने इस वेबिनार में बोलते हुए इस बात का जिक्र किया कि डॉल्फिन को बचाने में गंगा में रहने वाले कई अन्य जीवों की भूमिका भी अहम् है. इनमें गंगा के घड़ियाल, मछली, स्थानीय एवं प्रवासी पक्षी भी शामिल हैं. अगर हमें गांगेय डॉल्फिन का संरक्षण करना है तो हमें गंगा के इन जीवों के संरक्षित करना जरूरी है. उन्होने घड़ियाल के संरक्षण पर विशेष रूप से बल देते हुए कहा किसी समय में गंडक में केवल 30 घड़ियाल हुआ करते थे परन्तु आज 2000 से ज्यादा घड़ियाल हैं.

वहीं जूलॉजिकल सर्वे ऑफ पटना के वरीय वैज्ञानिक और ऑफिसर इंचार्ज डॉ. गोपाल शर्मा ने गंगा डॉल्फिन के साथ साथ समुद्री डॉल्फिन के बचाव के लिए भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी को बधाई देते हुए कहा कि समुद्री डॉल्फिन को बचाने के लिए कारगर कदम उठाया है अब हम संरक्षण में जुड़े व्यक्ति एवं संस्था हैं इसकी जिम्मेवारी है कि बेस लाइन डाटा उपलब्ध कराएं साथ ही इसके संरक्षण में जुड़ जाए. इससे जंतुओं की संख्या के साथ साथ पर्यटकों की संख्या भी बढ़ेगी जिससे देश की अर्थ व्यवस्था में सुधार आयेगा. इससे स्थानीय लोग भी लाभान्वित होंगे.

डॉ. शर्मा ने समुद्री डॉल्फिन जो कि भारतीय कोस्टल जोन में मिलते हैं उनको बचाने पर बल दिया. वे डॉल्फिन हैं रफटूथेद डॉल्फिन (स्टेनो ब्रेडानेंसिस), हम्पबैक डॉल्फिन (सुसा  चाइनेन्सिस,  स्ट्राईपेड डॉल्फिन (स्टेनो अट्टेनुआटा), स्पैनर डॉल्फिनस्टीनेल्ला लोंगीरोस्ट्रिस), कामन डेल्फिनस( डेल्फिनसडेल्फिस), बोट्त्लनॉज डॉल्फिन टरसीऑप्स ट्रंकेटस इर्रावदी डी डॉल्फिन ओर्केल्ला ब्रेविरोस्ट्रीस, रिस्सो डॉल्फिन (ग्राम्फास ग्रिसेयस)

गांगेय डॉल्फिन/सोंस

कार्यक्रम में धन्यवाद ज्ञापन गंगा समभूमि प्रादेशिक केंद्र के वैज्ञानिक डॉ. राहुल जोशी ने किया. इस वेबिनार में 350 लोगों ने अपनी सहभागिता दी, तथा 119 लोग युट्यूब पर लाइव रहे.

अन्य महत्वपूर्ण लोगों ने भाग लिया वे हैं आर के,शर्मा, चम्बल सैन्क्च्युँरी, नवीन कुंअर बिहार राज्य प्रदूषण नियंत्रण पर्षद, नवीन कुमार, बिहार राज्य पर्यटन विकास निगम, डा. एन.के.दास, डॉ सैयद सबीह हसन, डॉ. दिलीप केडिया.

PNCB