उर्जा के क्षेत्र में सफलता की ओर बढ़ रहा बिहार 

बिजली उत्पादन के लिए दूसरों पर निर्भर बिहार, वितरण की व्यवस्था सुधार मात्र से लक्ष्य की ओर अग्रसर

पटना, 25 मार्च. बिहार जहाँ बिजली का उत्पादन न के बराबर है, जो विद्युत की आपूर्ति के लिए हमेशा दूसरे उत्पादक राज्यों और केंद्र पर निर्भर रहता है. अब अपनी जरूरतों और विद्युत प्राप्ति के बीच समुचित तालमेल से ही राज्य के उपभोक्ताओं के हितों का ध्यान रख रहा है.   सीमित आपूर्ति में बेहतर वितरण और वितरण में होने वाले ह्रास को कम कर व्यवस्था दुरुस्त कर रहा है. इस अनुभूति को नीति निर्माता अब व्यापक तौर पर स्वीकार करने लगे हैं कि बिजली की आपूर्ति में सुधार का एकमात्र तरीका विद्युत वितरण की दक्षता में सुधार करना है.




इस दिशा में पहले कदम के तौर पर बिहार सरकार ने पूर्ववर्ती बिहार राज्य विद्युत् बोर्ड को 5 कंपनियों में बांट दिया है जिनमें से दो कंपनियां वितरण कंपनियां हैं उत्तर बिहार विद्युत् वितरण कंपनी लिमिटेड और दक्षिण बिहार विद्युत् वितरण कंपनी लिमिटेड. ये कंपनियां अब राज्य में अपनी आर्थिक स्थिति और बिजली की आपूर्ति सुधारने के लिए विद्युत् क्षेत्र के सुधारों का क्रियान्वयन कर रही है.
देश के विद्युत क्षेत्र में लगभग सारी राज्य संचालित वितरण कंपनियां विद्युत ग्रिड से बिजली लेने और उपभोग के लिए उपभोक्ताओं के बीच वितरित करने के लिए जवाबदेह हैं. इस जवाबदेही की पूर्ति में मुख्य समस्या यह है कि ग्रिड से ली गयी अधिकांश बिजली के लिए भुगतान नहीं होता है ,और उसे अपारदर्शी तरीके से ‘सामूहित तकनीकी एवं व्यावसायिक’ (AT&C) ह्रास के रूप में गिना जाता है. लेकिन वास्तव में ये ह्रास मुख्यतः बिना मीटर वाले कनेक्शनों या सीधे बिजली चोरी के कारण होते हैं. तकनीकी या संचारण संबंधी ह्रासों का इसमें छोटा हिस्सा ही होता है. चूँकि ग्रिड से खरीदी गई बिजली के बड़े हिस्से के लिए वितरण कंपनियों को राजस्व नहीं मिलता है इसलिए यह रक्तस्राव होने जैसी रकम होती है. देश के स्तर पर यह ह्रास बहुत अधिक हो जाते हैं जिनका हर साल मूल्य प्रायः सकल घरेलू उत्पाद के 1 प्रतिशत से अधिक होता है. बिहार में ऐसा ह्रास 2015-16 तक 40 प्रतिशत के आस पास हुआ करता था और उससे पहले तो उससे भी अधिक होता था. लेकिन बिजली की बढ़ी आपूर्ति की स्थिति में अधिक ह्रास भय से वितरण कंपनियां अक्सर उपभोक्ताओं के लिए बिजली की राशनिंग करने का विकल्प अपनाती हैं – तब भी जब बिजली उपलब्ध हो ,और कभी-कभी तो कम कीमत पर बिजली उपलब्ध उपलब्ध होने के बाद भी. इस प्रकार बिजली की आपूर्ति की ख़राब हालत व्यावसायिक ह्रासों से गहरे जुडी है जिसके कारण वितरण कंपनियों को वित्तीय नुकसान होता है.
वितरण कंपनियों का एक हस्तक्षेप विद्युत आपूर्ति और छोटे व्यावसायों की वृद्धि के बीच संबंध का प्रायोगिक साक्ष्य उपलब्ध कराना और उसके साथ-साथ समूह स्तर पर प्रोत्साहन योजना का मूल्यांकन भी करना है जिसमें बिजली के लिए भुगतान बढ़ाने को बिजली की बढ़ी आपूर्ति से जोड़ने का प्रयास किया जाता है. प्रायोगिक हस्तक्षेप यूनाइटेड किंगडम के अन्तराष्ट्रीय विकास विभाग (DFID) द्वारा समर्थित इंटरनेशनल ग्रोथ सेंटर (IGC) के तहत कम करने वाली एक शोध टीम द्वारा शुरू किया गया था. अनुमान है कि पूरे बिहार में योजना लागू करने पर होने वाली राजस्व वृद्धि से वितरण कंपनिया अपनी संचरण क्षमता 170 मेगावाट बाधा पाने में सक्षम होंगी. यह बिहार में सबसे बड़े तापविद्युत संयत्र की उत्पादन क्षमता के लगभग बराबर है.
राज्य के सभी अविद्युतीकृत गावों एवं 1,06,249 टोलों/बसावटों में से 84,359 टोलों/बसावटों को पूर्णतः उर्जान्वित किया जा चूका है तथा अप्रैल 2018 तक शेष 21,890 टोलों/बसावटों को उर्जान्वित करने का लक्ष्य है. साथ ही दिसम्बर 2018 तक राज्य के सभी परिवारों को बिजली का कनेक्सन देने का लक्ष्य है.
राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में हर घर को विद्युत संबंध देनें के लिए पूर्व से स्वीकृत ‘मुख्यमंत्री विद्युत संबंध निश्चय योजना ‘ को साऊथ/नार्थ बिहार पॉवर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लि. द्वारा प्रधानमंत्री सहज बिजली हर घर योजना –सौभाग्य के लिए केंद्र सरकार के द्वारा निर्धारित शर्तों के अनुसार अंगीकृत एवं समाहित कर राज्य योजना मद से 1897.50 रु.के व्यय पर मुख्मंत्री विद्युत संबंध निश्चय योजनान्तर्गत बिना मीटर वाले विद्युत संबंध में मीटर स्थापित करने ,11 के.वी.2 फेज तार को 3 फेज तार करने ,जहाँ न्यूट्रल तार उपलब्ध नहीं है वहां न्यूट्रल तार उपलब्ध कराने की स्वीकृति दी गयी है .
1847 सोलर पम्प का अधिष्ठापन कार्य कराया जा चुका है तथा 2980 का अधिष्ठापन वर्ष 2018-19 तक कराये जाने का लक्ष्य है. राज्य के शहरी और ग्रामीण आवासीय तथा व्यावसायिक परिसरों में 1 KWP क्षमता के 2170 रूफटॉप सोलर पॉवर प्लांट का अधिष्ठापन का कार्य कराया जा चुका है.
दीन दयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना अंतर्गत 6324.84 करोड़ रु. की लागत से 275 नया पॉवर सब स्टेशन,11 KV के कृषि क्षेत्र में 732 एवं ग्रामीण क्षेत्र में 795 फीडर का निर्माण कराया जायेगा. खेती के लिए किसानों को अलग से पॉइंट मुहैया कराने के लिए राज्य में फीडर,तार से लेकर अलग ट्रांसफार्मर लगाये जा रहे हैं. फीडर से निकले इन तारों से किसानों को केवल पटवन की सुविधा मिलेगी. 2019 तक इस योजना को पूरा करने का लक्ष्य है. वर्ष 2017-18 से 2021-22 तक 6.94 लाख कृषि पम्प सेटों को उर्जान्वित किया जायेगा.
समेकित उर्जा विकास योजना के तहत राज्य के 133 शहरों में 2100 करोड़ रूपये की लागत से 62 नए पॉवर स्टेशन का निर्माण किया जायेगा तथा 2423 CKM की लम्बाई में पुराने तारों को AB Cable द्वारा बदला जायेगा ,जिससे शहरी क्षेत्र के उपभोक्ता को गुणवत्तापूर्ण ,विश्वसनीय तथा निरंतर विद्युत की उपलब्धता करायी जा सकेगी.
राज्य के पुराने एवं जर्जर तार को बदलने के लिए 3070.23 करोड़ रूपये की योजना के तहत 33 KV फीडर के 1061.56 CKM,11 KV फीडर के 25271.51 CKM एवं LT लाइन के 45338.81 CKM की लम्बाई में तारों को बदला जायेगा.
राज्य सरकार द्वारा विद्युत कंपनियों को वार्षिक अनुदान के रूप में 4308 करोड़ रूपये दिए जा रहे हैं .जिसमें उपभोक्ताओं को विद्युत आपूर्ति के विरुद्ध सब्सिडी के 2832 करोड़ रूपये एवं संचारण क्षति के लिए 1476 करोड़ रूपये शामिल हैं. NTPC द्वारा बरौनी थर्मल पॉवर स्टेशन ,नवीनगर पॉवर जेनेरेटिंग कंपनी लि. एवं काँटी बिजली उत्पादन निगम लि. के अधिग्रहण की सैधांतिक सहमति दी जा चुकी है.
बिहार विद्युत स्तिथि में सुधार कर ,वितरण की बेहतर व्यवस्था कर और वितरणजनित ह्रासों को कम कर घर-घर तक निरंतर बिजली पहुँचाने के अपने लक्ष्य की ओर सफलतापूर्वक तेजी से आगे बढ़ रहा है

पटना नाउ ब्यूरो की रिपोर्ट