विकास की राह देख रहा मानसिक आरोग्यशाला

2005 में भोजपुर जिला के कोइलवर में सूबे का इकलौता मानसिक अस्पताल बिहार राज्य मानसिक स्वास्थ्य एवं सम्बद्ध विज्ञान संस्थान की नींव रखी गई . लेकिन एक दशक के बाद भी सूबे के इस इकलौते मानसिक आरोग्यशाला का अभी तक पूर्णरूपेण अमलीजामा नहीं पहनाया जा सका है .कभी आवंटन की कमी तो कभी राजधानी में बैठे नेताओं और अधिकारियों के लचर रवैये के कारण संस्थान को वो गति नहीं मिल पा रही है जो किसी राज्य के इकलौते मानसिक आरोग्यशाला को मिलनी चाहिए .




बिहार से अलग होने के बाद रांची के कांके स्थित मानसिक अस्पताल झारखंड के हिस्से में जा चुका है . बिहार की आबादी लगभग 11 करोड़ है, लेकिन सूबे के इकतौते मनोरोग अस्पताल की स्थिति खराब हैं . इसका मुख्य कारण संस्थान की आर्थिक तंगी बताया जाता है . जबकि सुत्रों कि मानें तो इस मानसिक आरोग्यशाला के विकास हेतु समुचित राशि आवंटित कर दी गई है . परंतु अधिकारियों एवम प्रबंधन कर्मचारियों के कमी के कारण वर्तमान मानसिक आरोग्यशाला कि स्थिति चुस्त-दुरुस्त नहीं हो पा रही है और ना विकास कार्य हो पा रहे हैं .

आरोग्यशाला के निदेशक प्रमोद कुमार सिंह को PMCH के मनोचिकित्सा विभाग के अलावा मानसिक आरोग्यशाला कोइलवर में 29 दिसंबर 2011 से अतिरिक्त प्रभार दिया गया है . निदेशक ने विशेष रुचि दिखाते हुए प्रबंधन कार्यों में सुधार करने में उत्सुकता दिखाई जिसके कारण लम्बित पड़े कार्य का निष्पादन संभव हो पाया . साथ ही निदेशक ने मानसिक आरोग्यशाला के कर्मचारियों एवम चिकित्सकों से कहा कि हम सभी को मिलकर बेहतर से बेहतरीन बनाने का प्रयास करना चाहिये .

लगातार बढ़ रही है मरीजों की संख्या

मनोरोग आरोग्यशाला में मरीजों के पंजीकरण पर गौर करें तो इंडोर और आउटडोर में मरीजों की संख्या में दिन प्रतिदिन वृद्धि होती जा रही है, लेकिन मरीजों की तुलना में अस्पताल में सुविधाएं नही मिल पा रही है. आंकड़ों पर गौर करें तो 2011 में 13 हजार, 2012 में 14,500, 2013 में 19 हजार, 2014 में 25 हजार, 2015 में 32,300 जबकि दिसम्बर 2016 तक आउटडोर में आने वाले मरीजों की संख्या लगभग 44,562 थी.

निदेशक प्रमोद कुमार सिंह का कहना है कि इंडोर में लगभग 90 मानसिक रोगी भर्ती हैं जिनमे 38 महिलाएं और 52 पुरुष हैं. कई मनोरोगी बिल्कुल स्वस्थ हो चुके हैं और घर जाना चाहते हैं लेकिन जटिल प्रक्रियाओं और मरीजों के परिजनों की लापरवाही के कारण मजबूरन यहां पड़े हुए हैं.

मनोचिकित्सकों की कमी 

चौंकाने वाला एक आंकड़ा ये भी है कि बिहार की 11 करोड़ आबादी में कुल मनोचिकित्सकों की संख्या महज 60 है, जिनमें 30 सरकारी सेवा में हैं जबकि अन्य निजी संस्थानों में अपनी सेवा दे रहे हैं. इसकी एक मुख्य वजह ये भी है कि सरकार का मानसिक स्वास्थ्य के प्रति रवैया अब तक खास सकारात्मक नहीं रहा है और ना ही इसके लिए आगामी दिनों के लिए कोई विजन है. अभी संस्थान में कुल 9 मनोचिकित्सक हैं जिनमें निदेशक समेत चार अन्य चिकित्सक प्रतिनियुक्ति पर हैं. अस्पताल में नियुक्त और प्रतिनियुक्त कर्मियों की संख्या लगभग 100 के पार है जिनपर वेतन और मानदेय के नाम पर भारी भरकम राशि हर माह खर्च की जाती है. यहां एक बात गौर करने वाली है कि अब तक जितने भी निदेशक यहां आए वे या तो अतिरिक्त कार्य भार में आए या फिर प्रतिनियुक्ति पर. कमोबेश यही स्थिति कर्मियों की भी है जिनमे से अधिकांशत पूर्व में यहां चल रहे टीबी सेनेटोरियम के ही हैं जो मानसिक अस्पताल में प्रतिनियुक्त कर दिए गए हैं .

सूत्रों की मानें तो इतना सब होने के बावजूद अगर कोई मानसिक मरीज बिहार से बाहर रिम्पास में इलाज के लिए जाता है तो बिहार सरकार को प्रति भर्ती मरीज के एवज में 900 रूपये प्रतिदिन उस संस्थान को भुगतान करना होता है. इस एवज में बिहार सरकार को अच्छी खासी रकम वहन करना पड़ता है.

 

इस बाबत संस्थान के निदेशक डॉ पीके सिंह कहते हैं कि बेहतर संस्थान के लिये एक नये आधुनिक सर्व सुविधा संपन्न भवन के निर्माण की योजना दिल्ली के सुप्रसिद्ध आर्किटेक्ट के द्वारा बनवा लिया गया है तथा उसके अग्रतर प्रक्रिया की जा रही है . और योजना है कि हम सभी चिकित्सक व कर्मियों के आपसी ताल-मेल व सहमति द्वारा बेहतर से बेहतरी बनाया जाए ताकि किसी मरीज को कोई असुविधा ना हो.

 

कोइलवर से आमोद कुमार