थानों की मनमानी पर लगाम: भूमि विवाद में पुलिस की भूमिका आज से सीमित, कानून के दायरे में ही होगा हस्तक्षेप

पटना : 1 फरवरी 2026 से राज्यभर में भूमि विवाद से जुड़े मामलों में पुलिस की भूमिका को लेकर जारी नए दिशा-निर्देश प्रभावी हो गए हैं. राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग द्वारा जारी इन स्पष्ट प्रावधानों का उद्देश्य भूमि विवादों के समाधान को पूरी तरह राजस्व एवं न्यायिक प्रक्रिया के दायरे में सुनिश्चित करना है, ताकि आमजन को अनावश्यक पुलिस हस्तक्षेप, दबाव या भ्रम की स्थिति का सामना न करना पड़े.

उपमुख्यमंत्री सह मंत्री, राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग विजय कुमार सिन्हा ने कहा कि आज से भूमि विवाद राजस्व और न्यायिक प्रक्रिया का विषय है. पुलिस का दायित्व केवल शांति और कानून-व्यवस्था बनाए रखना है. बिना सक्षम प्राधिकार के आदेश के किसी भी स्तर पर दखल-कब्जा दिलाने, चहारदीवारी कराने या निर्माण कराने की शिकायत मिली, तो संबंधित पुलिस पदाधिकारी पर कड़ी कार्रवाई तय है.




नई व्यवस्था के मुख्य बिंदु

भूमि विवाद की सूचना मिलते ही थाना में स्टेशन डायरी में अलग एवं विस्तृत प्रविष्टि अनिवार्य होगी.

दोनों पक्षों का नाम-पता, विवाद का स्वरूप (राजस्व/सिविल/आपसी), भूमि का पूरा विवरण (थाना, खाता, खेसरा, रकबा, किस्म) दर्ज करना होगा.

यह भी उल्लेख करना होगा कि मामला प्रथम दृष्टया किस राजस्व न्यायालय के क्षेत्राधिकार में आता है.

प्रत्येक मामले की लिखित सूचना संबंधित अंचलाधिकारी को देना अनिवार्य होगा सूचना ई-मेल/पोर्टल के माध्यम से भी दी जा सकती है.

भूमि विवाद के त्वरित समाधान के लिए अब प्रत्येक शनिवार को अंचलाधिकारी और थाना प्रभारी की संयुक्त बैठक होगी, जिसमें मामलों की समीक्षा कर प्रगति विभागीय पोर्टल पर अपलोड की जाएगी.

धारा 107/116 दंप्रसं (BNSS समकक्ष प्रावधान) के तहत पुलिस की भूमिका यथावत रहेगी, लेकिन इसका उपयोग केवल शांति व्यवस्था बनाए रखने तक सीमित होगा.

‘सबका सम्मान, जीवन आसान’ की दिशा में बड़ा कदम

पत्र में उल्लेख है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सात निश्चय-3 (2025-2030) के अंतर्गत “सबका सम्मान, जीवन आसान (Ease of Living)” के लक्ष्य को धरातल पर उतारने के लिए यह व्यवस्था लागू की गई है. राज्य के लगभग 4.5 करोड़ जमाबंदी धारकों को भूमि विवादों में पारदर्शी, निष्पक्ष और समयबद्ध समाधान मिल सके, यही इस नई प्रणाली का उद्देश्य है.
यह व्यवस्था स्पष्ट करती है कि अब भूमि विवाद में न तो थानों की मनमानी चलेगी और न ही पुलिस हस्तक्षेप की आड़ में किसी को डराया-धमकाया जा सकेगा. हर विवाद का समाधान अब कानून के दायरे में, राजस्व न्यायालयों की प्रक्रिया के अनुसार ही सुनिश्चित किया जाएगा.

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