विंध्याचल- शक्तिपीठ या सिद्धिपीठ ?

सिद्धि देने वाली पीठ है विंध्यवासिनी शक्तिपीठ

विंध्याचल, 27 जनवरी. पुराणों में विंध्य क्षेत्र का महत्व तपोभूमि के रूप में वर्णित है. विंध्याचल की पहाड़ियों में गंगा की पवित्र धाराओं की कल-कल करती ध्वनि, प्रकृति की अनुपम छटा बिखेरती है. विंध्याचल पर्वत न केवल प्राकृतिक सौंदर्य का अनूठा स्थल है बल्कि संस्कृति का अद्भुत अध्याय भी है. इसकी माटी की गोद में पुराणों के विश्वास और अतीत के अध्याय जुडे हुए हैं. त्रिकोण यंत्र पर स्थित विंध्याचल निवासिनी देवी लोकहिताय, महालक्ष्मी, महाकाली तथा महासरस्वती का रूप धारण करती हैं. विंध्यवासिनी देवी विंध्य पर्वत पर स्थित मधु तथा कैटभ नामक असुरों का नाश करने वाली भगवती यंत्र की अधिष्ठात्री देवी हैं. कहा जाता है कि जो मनुष्य इस स्थान पर तप करता है, उसे अवश्य सिध्दि प्राप्त होती है. विविध संप्रदाय के उपासकों को मनवांछित फल देने वाली मां विंध्यवासिनी देवी अपने अलौकिक प्रकाश के साथ यहां नित्य विराजमान रहती हैं. ऐसी मान्यता है कि सृष्टि आरंभ होने से पूर्व और प्रलय के बाद भी इस क्षेत्र का अस्तित्व कभी समाप्त नहीं हो सकता. यहां पर संकल्प मात्र से उपासकों को सिध्दि प्राप्त होती है. इस कारण यह क्षेत्र सिध्द पीठ के रूप में विख्यात है. साथ ही यहाँ पर स्वयं शक्ति का प्रादुर्भाव हुआ. साक्षात् शक्ति स्वरूपा इस पवित्र स्थल पर प्रकट हुई इसलिए यह शक्तिस्थल के नाम से भी विख्यात है,जहाँ माँ का नित्य निवास बना है. आदि- शक्ति की शाश्वत लीला भूमि माँ विंध्यवासिनी के धाम में पूरे वर्ष दर्शनाथयों का आना-जाना लगा रहता है. चैत्र व शारदीय नवरात्र के अवसर पर यहां देश के कोने-कोने से लोगों का का समूह जुटता है.




ब्रह्मा, विष्णु व महेश भी भगवती की मातृभाव से उपासना करते हैं, तभी वे सृष्टि की व्यवस्था करने में समर्थ होते हैं. इसकी पुष्टि मार्कंडेय पुराण श्री दुर्गा सप्तशती की कथा से भी होती है, जिसमें लिखा हुआ है कि सृजन की आरंभिक अवस्था में संपूर्ण रूप से सर्वत्र जल ही विद्मान था. शेषमयी नारायण निद्रा में लीन थे. भगवान के नाभि कमल पर वृध्द प्रजापति आत्मचिंतन में मग्न थे तभी विष्णु के कर्ण रंध्र से दो अतिबली असुरों का प्रादुर्भाव हुआ. ये ब्रह्मा को देखकर उनका वध करने के लिए दौड़े. ब्रह्मा को अपना अनिष्ट निकट दिखाई देने लगा. असुरों से लड़ना रजोगुणी ब्रह्मा के लिए संभव नहीं था. यह कार्य श्री विष्णु ही कर सकते थे, जो निद्रा के वशीभूत थे. ऐसे में ब्रह्मा को भगवती महामाया की स्तुति करनी पड़ी, तब जाकर उनके ऊपर आया संकट दूर हो सका.

विंध्याचल से पटना नाउ ब्यूरो की रिपोर्ट