80 बरस के उमर में जागा जोश पुराना था…

By Amit Verma Apr 25, 2017
इतिहास के पन्नो से कुँवर सिंह की कुछ यादें

“80 बरस के उमर में जागा जोश पुराना था
सब कहते हैं बाबू कुँवर सिंह बड़ा वीर मर्दाना था”
“बाँध मुरेठा 52 गज का, एंडा दबावे घोड़न का
चमचम चमके हाथ में तेगा, भोजपुरियन के जोड़न का”
इस तरह की कई कहावतें और पंक्तियां शाहाबाद ही नहीं बल्कि पूरे बिहार में मिलेंगी। पर अफ़सोस की 1857 के इस वीर बाँकुड़ा को देश के अन्य हिस्सों में आज भी लोग नहीं जानते हैं. भले ही संसद तक उनकी तस्वीर को लगा दिया गया हो पर हक्कीकत यही है.

क्यों मनाया जाता है विजयोत्सव




80 की बूढी हुयी हड्डियों ने जिस ब्रिटिश हुकूमत की चुल हिला देने वाले तत्कालीन शाहाबाद के जगदीशपुर के निवासी वीर बाँकुड़ा बाबू वीर कुंवर सिंह की वीरता की याद आज भले ही धुंधली हो गयी हो, लेकिन आज भी उनकी वीरता को लोग याद रखते हैं. उनकी ये वीरता शाहाबाद के लिए एक पर्याय ही बन गया, तभी तो आज भी शाहबाद खासकर भोजपूर वालों को आज भी ऐसा माना जाता है जहाँ 80 वर्ष में जवानी चढ़ती है. यही कारण है आज भी उनकी याद में हर वर्ष 23 अप्रैल को मनाये जाने वाले विजय दिवस पर जगह-जगह कार्यक्रम आयोजित कर लोग उनके शौर्य की गाथा गाते हैं.

क्षत्रिय कुल के उज्जैन राजपूत में जन्मे राजा भोज के वंशज साहबजादा सिंह के पुत्र वीर कुंवर सिंह की वीरता की पहचान तो वर्ष 1845-46 में ही हो गयी थी, जब ब्रिटिश सत्ता को उखाड़ फेंकने वाले षड्यंत्र में भंडाफोड़ होने की वजह से वीर कुँवर सिंह अंग्रेजों की हिट लिस्ट में आ गए थे.

हाजी बेगम से बंधवाई थी राखी
1857 की क्रांति में वीर कुंवर सिंह की रही भूमिका को आज भी भोजपुरी पवरा (गीतों) में “बाबू कुंवर सिंह, तेगवा बहादुर, बँगला में उड़े ला अबीर” होली के गीतों में पिरो कर व्यक्त करते हैं. इस योद्धा का तब के शाहाबाद जिले में ही पड़ने वाले सासाराम अनुमंडल (जो आज रोहतास जिला बन गया है) से गहरा नाता रहा है.1857 की क्रांति, जब एक-एक कर भारतीय रियासत में बगावत की आग भड़क चुकी थी
दानानुर रेजीमेंट, बंगाल के बैरकपुर, रामगढ़ के सिपाही विद्रोह, मेरठ, कानपुर, लखनऊ, इलाहाबाद, झाँसी, दिल्ली में विद्रोह की आग भड़क उठी थी. दानापुर के तीनों देशी पलटन 25 जुलाई 1857 को वीर कुँवर सिंह के नेतृत्व में आ गए थे. 27 जुलाई को अँग्रेजों के ठिकाने रहे आरा पर कब्जा कर लिया था. अँग्रेजों के साथ किसी भी लड़ाई में वीर कुँवर सिंह को हार का सामना नहीं करना पड़ा था. तब कुँवर सिंह को वहाँ का शासक घोषित कर दिया गया था.
आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए कुँवर सिंह ने वर्तमान के रोहतास जिले के नोखा, बरांव, रोहतास, सासाराम, रामगढ़ के अलावा यूपी के मिर्जापुर, बनारस, अयोध्या, लखनऊ, फैजाबाद, रीवां बांदा, कालपी, गाजीपुर, बांसडीह, सिकंदरपुर, मानियर और बलिया का दौरा कर संगठन खड़ा किया था. उसी दौरान वीर कुंवर सिंह कुछ दिन के लिए सासाराम की छोटी जागीरदार हाजी बेगम के यहाँ ठहरे थे. विधवा हाजी बेगम ने क्रांति योद्धा कुंवर सिंह व उनके सहयोगी अमर सिंह, निशान सिंह की धर्म बहन बन कर उन्हें राखी बांधी थी.
उसी क्रम में वीर कुँवर सिंह शिवपुर घाट से गंगा पार कर रहे थे कि डगलस की सेना ने उन्हें घेर लिया. बीच गंगा में उनकी बाँह में गोली लगी थी. गोली का जहर पूरे शरीर में फैल सकता था. इसे देखते हुए वीर कुँवर सिंह ने अपनी तलवार उठाई और अपना एक हाथ गंगा नदी में काटकर फेंक दिया. वहाँ से वह 22 अप्रैल को 2 हजार सैनिकों के साथ जगदीशपुर पहुँचे और 23 अप्रैल को अंग्रेजो को हरा विजय पायी थी. अंतिम लड़ाई में भी उनकी जीत हुई लेकिन उसके तीन दिन बाद वीर कुँवर सिंह संसार से हमेशा के लिए विदा हो गए.

बचपन में जब उठायी तलवार
रणबांकुरा वीर कुंवर सिंह के बाल्य काल में पढ़ाने हेतु उनके राजा पिता ने एक शिक्षक उपलब्ध कराया था. उस ज़माने में शिक्षण कार्य में मुल्ला–मौलवी ही हुआ करते थे. इस 8 वर्ष के बालक को जब पहले दिन मौलवी ने उन्हें पाठ याद करने के लिए बोला, लेकिन बालक पाठ याद करने से दो टूक शब्द में निर्भिकतापूर्वक मना कर दिया. मौलवी ने उन पर छड़ी तान दी. तभी बालक ने बाजु में रखे तलवार को म्यान से खीच कर टीचर पर ही तान दिया. बस फिर क्या था मौलवी साहब चिल्लाते हुए कुंवर सिंह के पिता जी के चरणों में गिर पड़े. सारा वाक्या सुनने पर वीर बालक के पिता भी फुले न समाये हालाँकि उन्होंने उस समय तो कुँवर को शाबाशी नहीं दिया लेकिन बाद में ख़ुशी के उमंग में बोले, क्षत्रिय जन्म लेने से पहले ही तलवारबाजी में निपुण होते है. इस घटना के बाद उन्होंने मौलवी को वहां से विदा कर दिया.

आरा से ओपी पांडे

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