परिवार से बड़ा कोई धन नहीं

भले आज की दुनिया “विश्व परिवार दिवस” मनाने का चलन शुरू किया हो, लेकिन हमारी परंपरा सदियों पुरानी है, जो आज भी चली आ रही है “वसुधैव कुटुंबकम”. आज ” वसुधैव कुटुंबकम को ही विश्व के देश विश्व परिवार दिवस के रूप में मना रहे हैं. यह हमारे पुरखों ने स्थापित किया था समूची पृथ्वी पर वास करने वाले जीवो को अपना कुटुम्ब मानते हैं. हम मानव, नदियों, तालाबों, झरनों, पहाड़ों, पेड़ ,पौधे ,पशु, पक्षी, मत्स्य, पानी ,आग, हवा ,मिट्टी ,आकाश ,सूर्य, चंद्र ,नक्षत्र, ग्रह ,तारे,यानी समस्त चराचर जीवोंं की पूजा करने वाली हमारी संस्कृति है. हमारी परंपरा रही है. भले आज परिवार का दायरा छोटा हो गया. धीरे-धीरे हम सिमटते हुए पति ,पत्नी, बच्चे तक आ गए, बहुत हुआ तो बूढ़े मां बाप तक सीमित हो गए. एक समय संयुक्त परिवार का चलन था दादा, परदादा तक सारे परिवार एक साथ जुड़कर रहते थे. अभी भी गांव के गांव गोतिया ,लैया ,भैयारी चलता है. आज भी अतिथि को हम पूजते हैं. “अतिथि देवो भव:” हमारा चारित्रिक, व्यवहारिक सूत्र वाक्य है. आगंतुकों का सत्कार कर हम खुश होते हैं. हम “सर्वे भवंतू सुखिनः,सर्वे संतु निरामया “को मानने वाले हैं. हमने दुनिया को राम के रूप में आदर्श स्थापित करने वाला महान राजा का संदेश दिया. हमने कृष्ण के रूप में दुनिया को प्यार का पाठ का संदेश देने वाला भगवान दिया. हमने बुद्ध एवं महावीर के रूप में सत्य, अहिंसा का पाठ दुनियाँ को पढ़ाया. हमने गांधी के रूप में शांति से क्रांति को सफल सिद्ध कर दिखाया. आज भी

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