तो क्या 377 और 497 पर होगा पुनर्विचार ?

भारतीय जीवन-मूल्यों पर आघात है सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय–जनसंघ

आरा, 29 सितंबर. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा हाल में दिए गए दो निर्णयों को लेकर चर्चायें जोरो पर है. 377 और 497 पर चर्चाएं इन दिनों चाय की दुकानों औऱ चौपालों पर चाय की केतली की तरह गर्म है. कोई इस फैसले पर खुश हो इठला रहा है तो कोई इसके विरुद्ध तलवारें खींच संस्कृति हनन की दुहाई दे रहा है. स्थिति यह हो गयी है कि सरकार के पक्ष में खड़ा रहने वाला एक वर्ग भी अब इसके खिलाफ है और इसपर पुर्नविचार की मांग कर रहा है.




अखिल भारतीय जनसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष आचार्य भारतभूषण पाण्डेय ने सर्वोच्च न्यायालय के फैसले पर गहरा क्षोभ व्यक्त करते हुए कहा कि पहले समलैंगिक संबंधों और अब विवाहेतर संबंधों को मान्यता देकर सर्वोच्च न्यायालय ने भारतीय जीवन-मूल्यों एवं सामाजिक ताने-बाने को तार-तार कर दिया है. उच्चतम न्यायालय के निर्णयों को अभारतीय, अमानवीय और अप्राकृतिक बताते हुए जनसंघ अध्यक्ष ने इसे भारत का यूरोपीयकरण करार दिया. उन्होंने केंद्र सरकार से भारतीय दण्ड संहिता की धारा 377 और 497 पर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के पुनर्विचार के लिए संसद के विशेष अधिवेशन बुलाने और भारतीय संस्कृति के आलोक में उक्त विषयों पर निर्णय लेने की मांग की. उन्होंने कहा कि प्रगतिशीलता और आधुनिकता के नाम पर स्वेच्छाचारिता और व्यभिचार को किसी भी रूप में स्वीकार करना आत्मघाती कदम होगा. जिन विकृतियों के कारण आज पश्चिम तबाह हो रहा है, उन्हें भारत में स्थापित करना अत्यंत अदूरदर्शी व अविवेकपूर्ण कार्य होगा. उन्होंने कहा कि जनसंघ सभी के मानवाधिकारों की रक्षा का प्रबल समर्थक है किंतु इस प्रकार की अराजकता और अव्यवस्था का प्रबल विरोधी.

अब देखना यह दिलचस्प होगा की सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए इन दो फैसले के खिलाफ सरकार पुनर्विचार की मांग करती है या नहीं.

आरा से अपूर्वा की रिपोर्ट