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	<title>Tripurari &#8211; Patna Now &#8211; Local News Patna and Bihar | Breaking News Patna | Patna News</title>
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		<title>रचनाओं की गहराई के साथ उम्र का कोई ताल्लुक नहीं &#8211; त्रिपुरारि</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Nikhil]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 19 Jul 2019 04:23:32 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अपना शहर]]></category>
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					<description><![CDATA[पटना/मुम्बई (ब्यूरो रिपोर्ट) &#124; महज़ 30 साल की उम्र में स्कूल सिलेबस में शामिल किए जाने वाले त्रिपुरारि उर्दू के शायर और अफ़्साना निगार हैं. उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी से हिंदी और उर्दू अदब की पढ़ाई की. फिर मास कम्युनिकेशन में एम.ए. किया. कुछ दिनों तक बतौर कॉपीरायटर/सम्पादक, विभिन्न मीडिया संस्थानों से जुड़े रहे और दिल्ली यूनिवर्सिटी समेत अन्य संस्थानों में पढ़ाया भी. सन् 2017 में योरकोट हिमालयन रायटिंग फ़ेलोशिप मिली. सन् 2018 में कहानी-संग्रह ‘नॉर्थ कैम्पस’ के लिए लिट्-ओ-फ़ेस्ट मैन्यूस्क्रिप्ट कॉन्टेस्ट अवार्ड से नवाज़ा गया. सन् 2019 में इनकी शायरी को महाराष्ट्र बोर्ड के स्कूल सिलेबस में ग्यारहवीं क्लास के लिए शामिल किया गया. फ़िलहाल, मुम्बई में रहते हुए फ़िल्म/टीवी के लिए गीत-स्क्रिप्ट लेखन कर रहे हैं. उनसे बातचीत कर उनके बारे में पूछा गया तो उनके जवाब मजेदार थे. आइये जानते हैं उनसे बातचीत के कुछ मुख्य अंश….सवाल: बिहार के छोटे से गाँव एरौत में रहने वाले छोटे से बच्चे ने कभी सोचा था कि महाराष्ट्र के पाठ्य पुस्तक में उसकी रचनाएं शामिल की जाएंगी? कैसा लग रहा है? त्रिपुरारि: सच कहूँ तो किताब में छपने का ख़याल एक बार आया था लेकिन तब मैं दूसरी क्लास में पढ़ता था. हुआ यूँ कि मैंने एक बहुत ख़ूबसूरत सी कविता पढ़ी थी जो बारिश पर थी. मन में अजीब सा ख़याल कौंधा- क्या कभी ऐसा हो सकता है कि मेरी लिखी कविता लोग पढ़ें. ये बात मुझे अचानक उस घड़ी याद आई, जब महाराष्ट्र की स्कूल सिलेबस बनाने वाली समिति का मेल आया. बहुत महीनों तक तो यक़ीन ही नहीं [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>पटना/मुम्बई (ब्यूरो रिपोर्ट) </strong>| महज़ 30 साल की उम्र में स्कूल सिलेबस में शामिल किए जाने वाले त्रिपुरारि उर्दू के शायर और अफ़्साना निगार हैं. उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी से हिंदी और उर्दू अदब की पढ़ाई की. फिर मास कम्युनिकेशन में एम.ए. किया. कुछ दिनों तक बतौर कॉपीरायटर/सम्पादक, विभिन्न मीडिया संस्थानों से जुड़े रहे और दिल्ली यूनिवर्सिटी समेत अन्य संस्थानों में पढ़ाया भी. सन् 2017 में योरकोट हिमालयन रायटिंग फ़ेलोशिप मिली. सन् 2018 में कहानी-संग्रह ‘नॉर्थ कैम्पस’ के लिए लिट्-ओ-फ़ेस्ट मैन्यूस्क्रिप्ट कॉन्टेस्ट अवार्ड से नवाज़ा गया. सन्  2019 में इनकी शायरी को महाराष्ट्र बोर्ड के स्कूल सिलेबस में ग्यारहवीं क्लास के लिए शामिल किया गया. फ़िलहाल, मुम्बई में रहते हुए फ़िल्म/टीवी के लिए गीत-स्क्रिप्ट लेखन कर रहे हैं. उनसे बातचीत कर उनके बारे में पूछा गया तो उनके जवाब मजेदार थे. आइये जानते हैं उनसे बातचीत के कुछ मुख्य अंश….<br><strong>सवाल</strong>: बिहार के छोटे से गाँव एरौत में रहने वाले छोटे से बच्चे ने कभी सोचा था कि महाराष्ट्र के पाठ्य पुस्तक में उसकी रचनाएं शामिल की जाएंगी? कैसा लग रहा है? <br><strong>त्रिपुरारि</strong>: सच कहूँ तो किताब में छपने का ख़याल एक बार आया था लेकिन तब मैं दूसरी क्लास में पढ़ता था. हुआ यूँ कि मैंने एक बहुत ख़ूबसूरत सी कविता पढ़ी थी जो बारिश पर थी. मन में अजीब सा ख़याल कौंधा- क्या कभी ऐसा हो सकता है कि मेरी लिखी कविता लोग पढ़ें. ये बात मुझे अचानक उस घड़ी याद आई, जब महाराष्ट्र की स्कूल सिलेबस बनाने वाली समिति का मेल आया. बहुत महीनों तक तो यक़ीन ही नहीं हुआ कि ये सब मेरे साथ हो रहा है. ख़ैर! आगे बातचीत हुई और अब सिलेबस में अपनी रचनाएँ देखकर कुछ कुछ यक़ीन हो रहा है. मैं तहे-दिल से उन तमाम लोगों का शुक्रगुज़ार हूँ, जिनकी मोहब्बत और दुआओं की वजह से मैं हूँ.<br><strong>सवाल</strong>: महज़ 30 साल की उम्र में आपकी रचनाएं पाठ्यक्रम में शामिल की गईं. आपकी रचनाओं में क्या ख़ास बात है?<br><strong>त्रिपुरारि</strong>: पहली बात तो ये कि रचनाओं की गहराई के साथ उम्र का कोई तअल्लुक़ नहीं है. एक कम-उम्र लेखक भी अच्छा लिख सकता है और एक उम्र-दराज़ लेखक भी बुरा लिख सकता है. दूसरी बात, जहाँ तक मैं समझता हूँ, स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों की उम्र कच्ची मिट्टी की तरह होती है. उन्हें इस उम्र में एक दोस्त की ज़रूरत होती है, जो उसे डाँटने की बजाय समझाने का हुनर जानता हो. जो हर छोटी बात पर उसकी हौसलाअफ़ज़ाई भी करे और ज़रूरत पड़ने पर ज़रा सख़्त रुख़ भी इख़्तियार करे. जो ये समझा सके ज़िंदगी में आँसू और मुस्कुराहट दोनों की अहमियत है और ज़िंन्दा रहने के लिए दोनों ज़रूरी हैं. मेरे हिसाब से, मेरी रचनाएँ एक दोस्त की तरह हैं, जिसे आप ता-उम्र अपने साथ रख सकते हैं. मैं उन छात्रों को शुभकामनाएँ देता हूँ, जिन्हें आगामी कई बरसों तक मेरी रचनाएँ पढ़नी हैं.<br><strong>सवाल</strong>: क्या घर मे भी साहित्य का माहौल था? अगर था तो कैसा था?<br><strong>त्रिपुरारि</strong>: घर में साहित्य का माहौल बस इतना था कि बाबूजी को साहित्य से बड़ा लगाव था. हमारे पड़ोसी महाकवि आरसी प्रसाद सिंह से वो बहुत प्रभावित थे. मेरे घर में, सिलेबस के अलावे महज़ दो-चार किताबें थी… जो कभी कभार मैं उलट-पलट लेता था. समझ तो कुछ आता नहीं था. जब मैंने लिखना शुरू किया तो मैं 9वीं क्लास में था… तब से मेरी पढ़ने की भूख धीरे धीरे बढ़ने लगी. जब मैं दिल्ली पढ़ने के लिए आया, तब मेरे सामने किताबों की एक दुनिया थी. अपने कॉलेज और यूनिवर्सिटी की लाइब्रेरी में उस वक़्त जितनी भी उर्दू, हिंदी और अंग्रेज़ी शायरी की किताब थी, मैंने पढ़ ली थी. और अब तो मेरी पर्सनल [होम+डिज़िटल] लाइब्रेरी में वर्ल्ड लिटरेचर की लगभग 10 हज़ार किताबें होंगी. मुझे लगता है बचपन जैसा भी हो, लेखन के दौरान लगातार पढ़ना बहुत ज़रूरी है ताकि आप वो लिखने से बच सकेंगे, जो लिखा जा चुका है. <br><strong>सवाल</strong>: आप तो गीत लिखने मुम्बई गए थे तब क्या सोचा था कि बॉलीवुड में काम करना मुश्किल होगा?<br><strong>त्रिपुरारि</strong>: जहाँ तक फ़िल्म लेखन का सवाल है, पिछले कुछ बरसों में मैंने यही सीखा है कि अपने हुनर पर यक़ीन करना चाहिए और सब्र रखना चाहिए. क्यूँकि  कम-अज़-कम इस क्षेत्र में शॉर्ट-कट जैसा कोई रास्ता नहीं है. यहाँ सिर्फ़ उसी को काम मिलता है, जो मेहनत और लगातार मेहनत करता है. मेरी कोशिश भी जारी है…    <br><strong>सवाल</strong>: अब तक किस-किस फ़िल्म और सीरियल के लिए लिखा है?<br><strong>त्रिपुरारि</strong>: फ़िल्म के लिए जो मैंने अब तक काम किया, सन्योग से वो रिलीज़ नहीं हुआ है. मुझे इंतज़ार है. देखिए कब तक और क्या क्या होता है? हाँ, पिछले चंद बरसों में मैंने ज़ी टीवी, सोनी, स्टार वग़ैरह के लिए दो-तीन नॉन फ़िक्शन शोज़ और टायटल सॉन्ग लिखे थे, वो ऑन एयर हुए थे. कुछ एक एड फ़िल्में और म्युज़िक एलबम्स के लिए भी गीत लिखे, जिसे टी-सीरीज़ और ज़ी म्युज़िक ने रिलीज़ किया है, जिसे ऑनलाइन देखा जा सकता है.<br><strong>सवाल</strong>: भविष्य की क्या योजनाएं है?<br><strong>त्रिपुरारि</strong>: मेरी कभी कोई योजना नहीं रही. मैं योजना बना कर नहीं बल्कि वक़्त के कंधे से कंधा मिला कर चलता हूँ. जब जो ठीक लगे, वही करता हूँ, बस मज़ा आना चाहिए. उस तरह की ज़िंदगी जीता हूँ….जैसे आज ही पैदा हुआ हूँ और आज ही मर जाना है. जब कल क्या होने वाला है, ये मालूम हो तो जीने का मज़ा ही नही. इसीलिए योजना तो कुछ नहीं मगर एक इंफ़ॉरमेशन है- कुछ गीत रीलिज़ होने वाले हैं. <br><strong>सवाल</strong>: बिहार के युवा लेखकों को क्या कहना चाहेंगे?<br><strong>त्रिपुरारि</strong>: बिहार के बहुत से युवा लेखक मुझसे सोशल मीडिया पर जुड़े हैं, कुछ लोगों से बातचीत भी है. एक से बढ़कर एक अच्छा लिखने वाले हैं. बस इतनी दुआ करता हूँ अपने लेखन पर यक़ीन करें. लगातार लिखें और ख़ूब पढ़ें. आज दुनिया भर में फ़ॉर्म्स और क्राफ़्ट को लेकर बहुत से एक्सपेरिमेंट हो रहे हैं. इन सब चीज़ों की जानकारी रखें और अपने लेखन की धार कम न होनें दें. आपकी कामयाबी आपकी मेहनत और आपके सब्र पर निर्भर है.</p>
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