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		<title>सहजतावाद के पुरोधा कवि थे सोमदेव</title>
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		<pubDate>Thu, 17 Nov 2022 06:22:35 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मिथिला की गढ़ी थी नई परिचिति मैथिली और हिंदी भाषा के थे नामी साहित्यकार शाहाबाद के आरा के रहने वाले थे उनका मूल नाम गौरी शंकर प्रसाद था पग पग पोखरि माछ मखान सरस बोल मुस्की मुख पान विद्या वैभव शांति प्रतीक सरितांचल श्री मिथिला थीक संजय मिश्र,दरभंगा मिथिला की ये परिभाषा गढ़ने वाले साहित्यकार सोमदेव नहीं रहे. ये कविता लोग सुनते आए हैं लेकिन अधिकांश को नहीं पता कि मिथिला को इस तरह स्मरण करने वाले उनके अपने साहित्यकार सोमदेव ही ठहरे. जीवन की आपा धापी में व्यस्त लोगों को पता न चला कि कब ये कविता जन स्मृति में दरभंगा की पहचान बन गई. लापरवाही इतनी कि बिरले ही जानते हों कि सोमदेव शाहाबाद जिले के थे. 05 मार्च 1934को उनका जन्म श्रीवास्तव परिवार में हुआ. उसके बाद मातृक (ननिहाल) दरभंगा जिले के जयंतीपुर दाथ गांव का नेओरी टोला। दरभंगा में ही बस जाना हुआ। मैथिली के शीर्ष साहित्यकारों में शुमार हुए. मैथिली के अलावा हिंदी साहित्यकार के रूप में ख्याति अर्जित की. साल 2022 के 14 नवंबर को उनका देहांत हुआ और पटना के बांस घाट पर अंतिम संस्कार. ये अपने पीछे पुत्र हर्षवर्धन और डा. अमित वर्धन सहित भरा पूरा परिवार छोड़ गये हैं. उनका मूल नाम गौरी शंकर प्रसाद था. मैथिली साहित्य में सस्पेंस, थ्रिलर और जासूसी कथावस्तू का दृढ़तम समावेश उन्होंने किया. होटल अनारकली और चनोदाय नामक उपन्यास से मैथिली साहित्यकाश में छा गए. काल ध्वनि नामक कविता संग्रह के जरिए उन्होंने सहजतावाद नामक नई विधा को स्थापित किया. द्रौपदी &#8211; बीसम शताब्दी, आगि [&#8230;]]]></description>
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<p></p>



<p></p>



<p><strong>मिथिला की गढ़ी थी नई परिचिति</strong></p>



<p><strong>मैथिली और हिंदी भाषा के थे नामी साहित्यकार</strong></p>



<p><strong>शाहाबाद के आरा के रहने वाले थे</strong></p>



<p><strong>उनका मूल नाम गौरी शंकर प्रसाद था</strong></p>



<div class="wp-block-group"><div class="wp-block-group__inner-container is-layout-flow wp-block-group-is-layout-flow">
<p class="has-vivid-red-color has-text-color"><strong>पग पग पोखरि माछ मखान</strong></p>



<p class="has-vivid-red-color has-text-color"><strong>सरस बोल मुस्की मुख पान</strong></p>



<p class="has-vivid-red-color has-text-color"><strong>विद्या वैभव शांति प्रतीक</strong></p>



<p class="has-vivid-red-color has-text-color"><strong>सरितांचल श्री मिथिला थीक</strong></p>
</div></div>



<p><strong>संजय मिश्र,दरभंगा</strong></p>



<p>मिथिला की ये परिभाषा गढ़ने वाले साहित्यकार सोमदेव नहीं रहे. ये कविता लोग सुनते आए हैं लेकिन अधिकांश को नहीं पता कि मिथिला को इस तरह स्मरण करने वाले उनके अपने साहित्यकार सोमदेव ही ठहरे. जीवन की आपा धापी में व्यस्त लोगों को पता न चला कि कब ये कविता जन स्मृति में दरभंगा की पहचान बन गई. लापरवाही इतनी कि बिरले ही जानते हों कि सोमदेव शाहाबाद जिले के थे. 05 मार्च 1934को उनका जन्म श्रीवास्तव परिवार में हुआ. उसके बाद मातृक (ननिहाल) दरभंगा जिले के जयंतीपुर दाथ गांव का नेओरी टोला। दरभंगा में ही बस जाना हुआ। मैथिली के शीर्ष साहित्यकारों में शुमार हुए. मैथिली के अलावा हिंदी साहित्यकार के रूप में ख्याति अर्जित की.</p>



<figure class="wp-block-image size-full"><img fetchpriority="high" decoding="async" width="500" height="261" src="https://www.patnanow.com/assets/2022/11/7904351027968072940.jpg" alt="" class="wp-image-68758" srcset="https://www.patnanow.com/assets/2022/11/7904351027968072940.jpg 500w, https://www.patnanow.com/assets/2022/11/7904351027968072940-350x183.jpg 350w" sizes="(max-width: 500px) 100vw, 500px" /></figure>



<p>साल 2022 के 14 नवंबर को उनका देहांत हुआ और पटना के बांस घाट पर अंतिम संस्कार. ये अपने पीछे पुत्र हर्षवर्धन और डा. अमित वर्धन सहित भरा पूरा परिवार छोड़ गये हैं. उनका मूल नाम गौरी शंकर प्रसाद था. मैथिली साहित्य में सस्पेंस, थ्रिलर और जासूसी कथावस्तू का दृढ़तम समावेश उन्होंने किया. होटल अनारकली और चनोदाय नामक उपन्यास से मैथिली साहित्यकाश में छा गए. काल ध्वनि नामक कविता संग्रह के जरिए उन्होंने सहजतावाद नामक नई विधा को स्थापित किया. द्रौपदी &#8211; बीसम शताब्दी, आगि तांबूल वन मे और कालिंदी नव यौवना जैसी कथा रचनाओं ने उन्हें मैथिली का सशक्त हस्ताक्षर बनाया. अकाल जैसे विषय पर रचनाएं आई.</p>



<figure class="wp-block-image size-full"><img decoding="async" width="650" height="351" src="https://www.patnanow.com/assets/2022/11/9e808f80-7553-4da8-8419-823221c3a94d.jpg" alt="" class="wp-image-68759" srcset="https://www.patnanow.com/assets/2022/11/9e808f80-7553-4da8-8419-823221c3a94d.jpg 650w, https://www.patnanow.com/assets/2022/11/9e808f80-7553-4da8-8419-823221c3a94d-350x189.jpg 350w" sizes="(max-width: 650px) 100vw, 650px" /></figure>



<p>शंकर सोम और अजातशत्रु नाम से भी लेखन करते रहे. कई पत्रिकाओं का संपादन किया. तंत्र, योग और होम्योपैथ इनके जीवन का अंग बना रहा. इन्हें &#8220;सहसमुखी चौक पर&#8221; के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार वर्ष 2002 में मिला था। गौरी शंकर प्रसाद श्रीवास्तव, जिस पर इन्होंने सोमदेव नाम का ऐसा आवरण चढ़ाया कि वही मूल नाम होकर रह गया. वे हिंदी के प्राध्यापक थे, पहली पुस्तक लाल एशिया भी हिंदी में ही छपी, किन्तु ननिहाल की भाषा में कदम रखा तो फिर आजीवन मैथिली के ही होकर रह गए. इसका कारण उन्होंने खुद कहा है कि हिंदी में लिखना मुझे दिमागी कंप्यूटर पर मैथिली से हिंदी अनुवाद होता दिखता था. वे बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी थे, जिसका लाभ मैथिली को हुआ. जय बाबा बैद्यनाथ और भौजी माय मैथिली सिनेमा की पटकथा लेखन हो या फिर मैथिली में गजल, नातया कव्वाली लिखना सभी में आगे रहे और भाषा-साहित्य को एक नया मार्ग भी दिया.</p>



<p class="has-vivid-purple-color has-text-color"><strong>फहरि रहल सहसमुखी चौक पर सोममदेव यश-धवल पताका जीवित शब्द-शब्दमे सदिखन जा नभ-आंगन दिनकर-राका</strong></p>
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