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	<title>shardeey navratra &#8211; Patna Now &#8211; Local News Patna and Bihar | Breaking News Patna | Patna News</title>
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	<title>shardeey navratra &#8211; Patna Now &#8211; Local News Patna and Bihar | Breaking News Patna | Patna News</title>
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		<title>नारी, शक्ति, ऐश्वर्य और सौन्दर्य की देवी महागौरी</title>
		<link>https://www.patnanow.com/mahagauri-goddess-of-women-power-opulence-and-beauty/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[pnc]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 03 Oct 2022 04:37:40 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[फीचर]]></category>
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		<category><![CDATA[day 8]]></category>
		<category><![CDATA[mahagauri]]></category>
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					<description><![CDATA[महागौरी देवताओं की प्रार्थना पर हिमालय की श्रृंखला मे शाकंभरी के नाम से प्रकट हुई इनका वर्ण पूर्णतः गौर है. इस गौरता की उपमा शंख, चंद्र और कुंद के फूल से दी गई है. इनकी आयु आठ वर्ष की मानी गई है- &#8216;अष्टवर्षा भवेद् गौरी.&#8217; इनके समस्त वस्त्र एवं आभूषण आदि भी श्वेत हैं. महागौरी की चार भुजाएँ हैं. इनका वाहन वृषभ है. इनके ऊपर के दाहिने हाथ में अभय मुद्रा और नीचे वाले दाहिने हाथ में त्रिशूल है. ऊपरवाले बाएँ हाथ में डमरू और नीचे के बाएँ हाथ में वर-मुद्रा हैं. इनकी मुद्रा अत्यंत शांत है. यही महागौरी देवताओं की प्रार्थना पर हिमालय की श्रृंखला मे शाकंभरी के नाम से प्रकट हुई थी. माँ महागौरी ने देवी पार्वती रूप में भगवान शिव को पति-रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी, एक बार भगवान भोलेनाथ ने पार्वती जी को देखकर कुछ कह देते हैं. जिससे देवी के मन का आहत होता है और पार्वती जी तपस्या में लीन हो जाती हैं. इस प्रकार वषों तक कठोर तपस्या करने पर जब पार्वती नहीं आती तो पार्वती को खोजते हुए भगवान शिव उनके पास पहुँचते हैं वहां पहुंचे तो वहां पार्वती को देखकर आश्चर्य चकित रह जाते हैं. पार्वती जी का रंग अत्यंत ओजपूर्ण होता है, उनकी छटा चांदनी के सामन श्वेत और कुन्द के फूल के समान धवल दिखाई पड़ती है, उनके वस्त्र और आभूषण से प्रसन्न होकर देवी उमा को गौर वर्ण का वरदान देते हैं. एक कथा अनुसार भगवान शिव को पति रूप में पाने के [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p><strong> महागौरी देवताओं की प्रार्थना पर हिमालय की श्रृंखला मे शाकंभरी के नाम से प्रकट हुई </strong></p>



<p>इनका वर्ण पूर्णतः गौर है. इस गौरता की उपमा शंख, चंद्र और कुंद के फूल से दी गई है. इनकी आयु आठ वर्ष की मानी गई है- &#8216;अष्टवर्षा भवेद् गौरी.&#8217; इनके समस्त वस्त्र एवं आभूषण आदि भी श्वेत हैं. महागौरी की चार भुजाएँ हैं. इनका वाहन वृषभ है. इनके ऊपर के दाहिने हाथ में अभय मुद्रा और नीचे वाले दाहिने हाथ में त्रिशूल है. ऊपरवाले बाएँ हाथ में डमरू और नीचे के बाएँ हाथ में वर-मुद्रा हैं. इनकी मुद्रा अत्यंत शांत है. यही महागौरी देवताओं की प्रार्थना पर हिमालय की श्रृंखला मे शाकंभरी के नाम से प्रकट हुई थी.</p>



<figure class="wp-block-image size-full"><img fetchpriority="high" decoding="async" width="330" height="486" src="https://www.patnanow.com/assets/2022/10/Untitled.png" alt="" class="wp-image-67267" srcset="https://www.patnanow.com/assets/2022/10/Untitled.png 330w, https://www.patnanow.com/assets/2022/10/Untitled-238x350.png 238w" sizes="(max-width: 330px) 100vw, 330px" /></figure>



<p>माँ महागौरी ने देवी पार्वती रूप में भगवान शिव को पति-रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी, एक बार भगवान भोलेनाथ ने पार्वती जी को देखकर कुछ कह देते हैं. जिससे देवी के मन का आहत होता है और पार्वती जी तपस्या में लीन हो जाती हैं. इस प्रकार वषों तक कठोर तपस्या करने पर जब पार्वती नहीं आती तो पार्वती को खोजते हुए भगवान शिव उनके पास पहुँचते हैं वहां पहुंचे तो वहां पार्वती को देखकर आश्चर्य चकित रह जाते हैं. पार्वती जी का रंग अत्यंत ओजपूर्ण होता है, उनकी छटा चांदनी के सामन श्वेत और कुन्द के फूल के समान धवल दिखाई पड़ती है, उनके वस्त्र और आभूषण से प्रसन्न होकर देवी उमा को गौर वर्ण का वरदान देते हैं.</p>



<p>एक कथा अनुसार भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए देवी ने कठोर तपस्या की थी जिससे इनका शरीर काला पड़ जाता है. देवी की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान इन्हें स्वीकार करते हैं और शिव जी इनके शरीर को गंगा-जल से धोते हैं तब देवी विद्युत के समान अत्यंत कांतिमान गौर वर्ण की हो जाती हैं तथा तभी से इनका नाम गौरी पड़ा. महागौरी रूप में देवी करूणामयी, स्नेहमयी, शांत और मृदुल दिखती हैं. देवी के इस रूप की प्रार्थना करते हुए देव और ऋषिगण कहते हैं “सर्वमंगल मंग्ल्ये, शिवे सर्वार्थ साधिके. शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोस्तुते..”. महागौरी जी से संबंधित एक अन्य कथा भी प्रचलित है इसके जिसके अनुसार, एक सिंह काफी भूखा था, वह भोजन की तलाश में वहां पहुंचा जहां देवी उमा तपस्या कर रही होती हैं. देवी को देखकर सिंह की भूख बढ़ गयी परंतु वह देवी के तपस्या से उठने का इंतजार करते हुए वहीं बैठ गया. इस इंतजार में वह काफी कमज़ोर हो गया. देवी जब तप से उठी तो सिंह की दशा देखकर उन्हें उस पर बहुत दया आती है और माँ उसे अपना सवारी बना लेती हैं क्योंकि एक प्रकार से उसने भी तपस्या की थी. इसलिए देवी गौरी का वाहन बैल और सिंह दोनों ही हैं. एक अन्य कथा के अनुसार दुर्गम दानव के अत्याचारों से संतप्त जब देवता भगवती शाकंभरी की शरण मे आये तब माता ने त्रिलोकी को मुग्ध करने वाले महागौरी रूप का प्रादुर्भाव किया. यही माता महागौरी आसन लगाकर शिवालिक पर्वत के शिखर पर विराजमान हुई और शाकंभरी देवी के नाम से उक्त पर्वत पर उनका मंदिर बना हुआ है यह वही स्थान है जहां देवी शाकंभरी ने महागौरी का रूप धारण किया था.</p>



<figure class="wp-block-image size-full"><img decoding="async" width="650" height="540" src="https://www.patnanow.com/assets/2022/10/mahagauri.jpg" alt="" class="wp-image-67268" srcset="https://www.patnanow.com/assets/2022/10/mahagauri.jpg 650w, https://www.patnanow.com/assets/2022/10/mahagauri-350x291.jpg 350w" sizes="(max-width: 650px) 100vw, 650px" /></figure>



<p>माँ महागौरी का ध्यान, स्मरण, पूजन-आराधना भक्तों के लिए सर्वविध कल्याणकारी है. हमें सदैव इनका ध्यान करना चाहिए. इनकी कृपा से अलौकिक सिद्धियों की प्राप्ति होती है. मन को अनन्य भाव से एकनिष्ठ कर मनुष्य को सदैव इनके ही पादारविन्दों का ध्यान करना चाहिए. मां महागौरी भक्तों का कष्ट अवश्य ही दूर करती है. इसकी उपासना से अर्तजनों के असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं. अतः इसके चरणों की शरण पाने के लिए हमें सर्वविध प्रयत्न करना चाहिए.</p>



<p>श्लोक</p>



<p class="has-luminous-vivid-orange-color has-text-color">श्वेते वृषे समारुढा श्वेताम्बरधरा शुचिः । &nbsp;महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा ।</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>मां कात्यायनी की पूजा से मिलती है अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष चारों फलों की प्राप्ति</title>
		<link>https://www.patnanow.com/worship-of-maa-katyayani-gives-meaning-religion-work-salvation-and-attainment-of-four-fruits/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[pnc]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 01 Oct 2022 03:13:56 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अपना शहर]]></category>
		<category><![CDATA[फीचर]]></category>
		<category><![CDATA[सुख समृद्धि]]></category>
		<category><![CDATA[katyayini devi]]></category>
		<category><![CDATA[shardeey navratra]]></category>
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					<description><![CDATA[कात्यायनी नवदुर्गा या हिंदू देवी पार्वती (शक्ति) के नौ रूपों में छठवीं रूप &#8216;कात्यायनी&#8217; अमरकोष में पार्वती के लिए दूसरा नाम है, संस्कृत शब्दकोश में उमा, कात्यायनी, गौरी, काली, हेेमावती व ईश्वरी इन्हीं के अन्य नाम हैं. शक्तिवाद में उन्हें शक्ति या दुर्गा, जिसमे भद्रकाली और चंडिका भी शामिल है, में भी प्रचलित हैं. यजुर्वेद के तैत्तिरीय आरण्यक में उनका उल्लेख प्रथम किया है. स्कन्द पुराण में उल्लेख है कि वे परमेश्वर के नैसर्गिक क्रोध से उत्पन्न हुई थीं, जिन्होंने देवी पार्वती द्वारा दी गई सिंह पर आरूढ़ होकर महिषासुर का वध किया. वे शक्ति की आदि रूपा है, जिसका उल्लेख पाणिनि पर पतञ्जलि के महाभाष्य में किया गया है, जो दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व में रचित है. उनका वर्णन देवीभागवत पुराण, और मार्कंडेय ऋषि द्वारा रचित मार्कंडेय पुराण के देवी महात्म्य में किया गया है जिसे 400 से 500 ईसा में लिपिबद्ध किया गया था. बौद्ध और जैन ग्रंथों और कई तांत्रिक ग्रंथों, विशेष रूप से कालिका पुराण (10 वीं शताब्दी) में उनका उल्लेख है, जिसमें उद्यान या उड़ीसा में देवी कात्यायनी और भगवान जगन्नाथ का स्थान बताया गया है. परम्परागत रूप से देवी दुर्गा की तरह वे लाल रंग से जुड़ी हुई हैं. नवरात्रि उत्सव के षष्ठी को उनकी पूजा की जाती है. उस दिन साधक का मन &#8216;आज्ञा चक्र&#8217; में स्थित होता है. योगसाधना में इस आज्ञा चक्र का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है. इस चक्र में स्थित मन वाला साधक माँ कात्यायनी के चरणों में अपना सर्वस्व निवेदित कर देता है. परिपूर्ण आत्मदान करने वाले ऐसे भक्तों [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p></p>



<p><strong>कात्यायनी नवदुर्गा या हिंदू देवी पार्वती (शक्ति) के नौ रूपों में छठवीं रूप</strong></p>



<figure class="wp-block-image size-full"><img decoding="async" width="506" height="377" src="https://www.patnanow.com/assets/2022/10/katyayani.jpg" alt="" class="wp-image-67179" srcset="https://www.patnanow.com/assets/2022/10/katyayani.jpg 506w, https://www.patnanow.com/assets/2022/10/katyayani-350x261.jpg 350w" sizes="(max-width: 506px) 100vw, 506px" /></figure>



<p>&#8216;कात्यायनी&#8217; अमरकोष में पार्वती के लिए दूसरा नाम है, संस्कृत शब्दकोश में उमा, कात्यायनी, गौरी, काली, हेेमावती व ईश्वरी इन्हीं के अन्य नाम हैं. शक्तिवाद में उन्हें शक्ति या दुर्गा, जिसमे भद्रकाली और चंडिका भी शामिल है, में भी प्रचलित हैं. यजुर्वेद के तैत्तिरीय आरण्यक में उनका उल्लेख प्रथम किया है. स्कन्द पुराण में उल्लेख है कि वे परमेश्वर के नैसर्गिक क्रोध से उत्पन्न हुई थीं, जिन्होंने देवी पार्वती द्वारा दी गई सिंह पर आरूढ़ होकर महिषासुर का वध किया. वे शक्ति की आदि रूपा है, जिसका उल्लेख पाणिनि पर पतञ्जलि के महाभाष्य में किया गया है, जो दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व में रचित है. उनका वर्णन देवीभागवत पुराण, और मार्कंडेय ऋषि द्वारा रचित मार्कंडेय पुराण के देवी महात्म्य में किया गया है जिसे 400 से 500 ईसा में लिपिबद्ध किया गया था. बौद्ध और जैन ग्रंथों और कई तांत्रिक ग्रंथों, विशेष रूप से कालिका पुराण (10 वीं शताब्दी) में उनका उल्लेख है, जिसमें उद्यान या उड़ीसा में देवी कात्यायनी और भगवान जगन्नाथ का स्थान बताया गया है. परम्परागत रूप से देवी दुर्गा की तरह वे लाल रंग से जुड़ी हुई हैं. नवरात्रि उत्सव के षष्ठी को उनकी पूजा की जाती है. उस दिन साधक का मन &#8216;आज्ञा चक्र&#8217; में स्थित होता है. योगसाधना में इस आज्ञा चक्र का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है. इस चक्र में स्थित मन वाला साधक माँ कात्यायनी के चरणों में अपना सर्वस्व निवेदित कर देता है. परिपूर्ण आत्मदान करने वाले ऐसे भक्तों को सहज भाव से माँ के दर्शन प्राप्त हो जाते हैं.</p>



<figure class="wp-block-image size-full"><img loading="lazy" decoding="async" width="650" height="416" src="https://www.patnanow.com/assets/2022/10/कात्यायिनी.png" alt="" class="wp-image-67180" srcset="https://www.patnanow.com/assets/2022/10/कात्यायिनी.png 650w, https://www.patnanow.com/assets/2022/10/कात्यायिनी-350x224.png 350w" sizes="(max-width: 650px) 100vw, 650px" /></figure>



<p>माँ का नाम कात्यायनी कैसे पड़ा इसकी भी एक कथा है- कत नामक एक प्रसिद्ध महर्षि थे. उनके पुत्र ऋषि कात्य हुए. इन्हीं कात्य के गोत्र में विश्वप्रसिद्ध महर्षि कात्यायन उत्पन्न हुए थे. इन्होंने भगवती पराम्बा की उपासना करते हुए बहुत वर्षों तक बड़ी कठिन तपस्या की थी. उनकी इच्छा थी माँ भगवती उनके घर पुत्री के रूप में जन्म लें. माँ भगवती ने उनकी यह प्रार्थना स्वीकार कर ली. कुछ समय पश्चात जब दानव महिषासुर का अत्याचार पृथ्वी पर बढ़ गया तब भगवान ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों ने अपने-अपने तेज का अंश देकर महिषासुर के विनाश के लिए एक देवी को उत्पन्न किया. महर्षि कात्यायन ने सर्वप्रथम इनकी पूजा की. इसी कारण से यह कात्यायनी कहलाईं. ऐसी भी कथा मिलती है कि ये महर्षि कात्यायन के वहाँ पुत्री रूप में उत्पन्न हुई थीं. आश्विन कृष्ण चतुर्दशी को जन्म लेकर शुक्त सप्तमी, अष्टमी तथा नवमी तक तीन दिन इन्होंने कात्यायन ऋषि की पूजा ग्रहण कर दशमी को महिषासुर का वध किया था.माँ कात्यायनी अमोघ फलदायिनी हैं. भगवान कृष्ण को पतिरूप में पाने के लिए ब्रज की गोपियों ने इन्हीं की पूजा कालिन्दी-यमुना के तट पर की थी. ये ब्रजमंडल की अधिष्ठात्री देवी के रूप में प्रतिष्ठित हैं.</p>



<p>माँ कात्यायनी का स्वरूप अत्यंत चमकीला और भास्वर है. इनकी चार भुजाएँ हैं. माताजी का दाहिनी तरफ का ऊपरवाला हाथ अभयमुद्रा में तथा नीचे वाला वरमुद्रा में है. बाईं तरफ के ऊपरवाले हाथ में तलवार और नीचे वाले हाथ में कमल-पुष्प सुशोभित है. इनका वाहन सिंह है. माँ कात्यायनी की भक्ति और उपासना द्वारा मनुष्य को बड़ी सरलता से अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष चारों फलों की प्राप्ति हो जाती है. वह इस लोक में स्थित रहकर भी अलौकिक तेज और प्रभाव से युक्त हो जाता है.</p>



<p><strong>श्लोक</strong></p>



<p><strong>चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहन .</strong></p>



<p><strong>कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानवघातिनी ॥</strong></p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>जीवन में स्थिरता और सुख प्रदान करती हैं मां शैलपुत्री</title>
		<link>https://www.patnanow.com/maa-shailputri-provides-stability-and-happiness-in-life/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[pnc]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 26 Sep 2022 01:32:03 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अपना शहर]]></category>
		<category><![CDATA[सुख समृद्धि]]></category>
		<category><![CDATA[maa shailputri]]></category>
		<category><![CDATA[shardeey navratra]]></category>
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					<description><![CDATA[पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री रूप में उत्पन्न होने के कारण माता का नाम शैलपुत्री पड़ा मां शैलपुत्री का जन्म शैल या पत्थर से हुआ मां शैलपुत्री आदिशक्ति मां दुर्गा की प्रथम स्वरूप हैं नवरात्रि का पावन पर्व नौ दिनों तक श्रद्धा के साथ मनाया जाता है. नवरात्रि के प्रथम दिन मां के प्रथम स्वरूप मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है. पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री रूप में उत्पन्न होने के कारण माता का नाम शैलपुत्री पड़ा. मां शैलपुत्री का जन्म शैल या पत्थर से हुआ, इसलिए इनकी पूजा से जीवन में स्थिरता आती है. मां शैलपुत्री की उपासना से समस्त मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं. मां को वृषारूढ़ा, उमा नाम से जाना जाता है. मां को हेमवती भी कहा गया है. नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की कथा का पाठ अवश्य करना चाहिए. नवरात्रि के प्रथम दिन कलश स्थापना कर मां दुर्गा को आह्वान करें. मां शैलपुत्री आदिशक्ति मां दुर्गा की प्रथम स्वरूप हैं. मां शैलपुत्री की कृपा से निडरता प्राप्त होती है और हर प्रकार का भय दूर हो जाता है. मां शांति, धन, विद्या, यश, कीर्ति और मोक्ष प्रदान करने वाली हैं. मां के दाहिने हाथ में त्रिशूल तथा बाएं हाथ में कमल शोभायमान है. इनका वाहन वृषभ है. माता शैलपुत्री की उपासना से मूलाधार चक्र जागृत होता है. मां की उपासना में दुर्गा सप्तशती का पाठ करें. मां की वंदना करते हुए व्रत का संकल्प लें और सफेद रंग के पुष्प अर्पित करें. अक्षत और सिंदूर अर्पित करें. मां शैलपुत्री को सफेद रंग का [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p><strong>पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री रूप में उत्पन्न होने के कारण माता का नाम शैलपुत्री पड़ा</strong></p>



<p><strong>मां शैलपुत्री का जन्म शैल या पत्थर से हुआ</strong></p>



<p><strong>मां शैलपुत्री आदिशक्ति मां दुर्गा की प्रथम स्वरूप हैं</strong></p>



<p></p>



<p></p>



<p>नवरात्रि का पावन पर्व नौ दिनों तक श्रद्धा के साथ मनाया जाता है. नवरात्रि के प्रथम दिन मां के प्रथम स्वरूप मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है. पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री रूप में उत्पन्न होने के कारण माता का नाम शैलपुत्री पड़ा. मां शैलपुत्री का जन्म शैल या पत्थर से हुआ, इसलिए इनकी पूजा से जीवन में स्थिरता आती है. मां शैलपुत्री की उपासना से समस्त मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं. मां को वृषारूढ़ा, उमा नाम से जाना जाता है. मां को हेमवती भी कहा गया है. नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की कथा का पाठ अवश्य करना चाहिए. नवरात्रि के प्रथम दिन कलश स्थापना कर मां दुर्गा को आह्वान करें. मां शैलपुत्री आदिशक्ति मां दुर्गा की प्रथम स्वरूप हैं. मां शैलपुत्री की कृपा से निडरता प्राप्त होती है और हर प्रकार का भय दूर हो जाता है.</p>



<figure class="wp-block-image size-full"><img loading="lazy" decoding="async" width="640" height="360" src="https://www.patnanow.com/assets/2022/09/1664139714.jpg" alt="" class="wp-image-66947" srcset="https://www.patnanow.com/assets/2022/09/1664139714.jpg 640w, https://www.patnanow.com/assets/2022/09/1664139714-350x197.jpg 350w" sizes="(max-width: 640px) 100vw, 640px" /></figure>



<p> मां शांति, धन, विद्या, यश, कीर्ति और मोक्ष प्रदान करने वाली हैं. मां के दाहिने हाथ में त्रिशूल तथा बाएं हाथ में कमल शोभायमान है. इनका वाहन वृषभ है. माता शैलपुत्री की उपासना से मूलाधार चक्र जागृत होता है. मां की उपासना में दुर्गा सप्तशती का पाठ करें. मां की वंदना करते हुए व्रत का संकल्प लें और सफेद रंग के पुष्प अर्पित करें. अक्षत और सिंदूर अर्पित करें. मां शैलपुत्री को सफेद रंग का वस्त्र अर्पित करें और गाय के घी से बने मिष्ठान का भोग लगाएं. मां शैलपुत्री वृषभ की सवारी करती हैं. इस कारण मां को वृषारूढ़ा भी कहा जाता है. मां के दाएं हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल सुशोभित है. मां शैलपुत्री को स्नेह, करुणा, धैर्य और इच्छाशक्ति का प्रतीक माना जाता है.</p>



<p><strong>PNCDESK</strong></p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>कैसे हुआ देवी का जन्म? नवदुर्गा से जुड़े 9 बातें जाने</title>
		<link>https://www.patnanow.com/how-was-devi-born-9-things-to-know-about-navdurga/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[pnc]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 25 Sep 2022 05:27:58 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Big News]]></category>
		<category><![CDATA[PATNA]]></category>
		<category><![CDATA[अपना शहर]]></category>
		<category><![CDATA[कला और साहित्य]]></category>
		<category><![CDATA[देश दुनिया]]></category>
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		<category><![CDATA[2022 navratra]]></category>
		<category><![CDATA[navratra]]></category>
		<category><![CDATA[shardeey navratra]]></category>
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					<description><![CDATA[नवरात्रि का महत्व तो सभी जानते हैं. हिंदू धर्म में दुर्गा की पूजा के लिए खास ये दिन बहुत ही शुभ होते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं देवी दुर्गा का जन्म कब हुआ था, उससे जुड़ी मान्यताएं क्या हैं और क्यों कन्या पूजा की जाती है? नवरात्रि यानी वो 9 दिन जब शक्ति की पूजा की जाती है जिसे देवी के रूप में मान्यता दी गई है. वो शक्ति जिसे देवताओं के महिला रूपी अवतार में देखा जाता है. दुर्गा के जन्म से लेकर उनके युद्ध में विजय पाने तक शक्ति के अनेक रूपों के बारे में हिंदू शास्त्र बताते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिस नवरात्रि में हम दुर्गा पूजा करते हैं उससे जुड़ी मान्यताएं क्या हैं, क्यों कन्या पूजा की जाती है, कैसे देवी का जन्म हुआ और क्यों दुर्गा की सवारी शेर है? 1. कैसे हुआ देवी का जन्म? देवी का जन्म सबसे पहले दुर्गा के रूप में ही माना जाता है जिसे राक्षस महिषासुर का वध करने के लिए जन्म दिया गया था और यही कारण है कि उन्हें महिषासुर मर्दिनी भी कहा जाता है. पौराणिक कथाओं के अनुसार देवताओं को भगा कर महिषासुर ने स्वर्ग पर कब्जा कर लिया था तब सभी देवता मिलकर त्रिमूर्ती के पास गए थे. ब्रह्मा, विष्णु और शिव ने अपने शरीर की ऊर्जा से एक आकृति बनाई और सभी देवताओं ने अपनी शक्तियां उस आकृति में डाली. इसीलिए दुर्गा को शक्ति भी कहा जाता है. दुर्गा की छवि बेहद सौम्य और आकर्षक थी और उनके कई हाथ [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p></p>



<p></p>



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<p class="has-luminous-vivid-amber-color has-text-color"><strong>नवरात्रि का महत्व तो सभी जानते हैं. हिंदू धर्म में दुर्गा की पूजा के लिए खास ये दिन बहुत ही शुभ होते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं देवी दुर्गा का जन्म कब हुआ था, उससे जुड़ी मान्यताएं क्या हैं और क्यों कन्या पूजा की जाती है?</strong></p>



<p>नवरात्रि यानी वो 9 दिन जब शक्ति की पूजा की जाती है जिसे देवी के रूप में मान्यता दी गई है. वो शक्ति जिसे देवताओं के महिला रूपी अवतार में देखा जाता है. दुर्गा के जन्म से लेकर उनके युद्ध में विजय पाने तक शक्ति के अनेक रूपों के बारे में हिंदू शास्त्र बताते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिस नवरात्रि में हम दुर्गा पूजा करते हैं उससे जुड़ी मान्यताएं क्या हैं, क्यों कन्या पूजा की जाती है, कैसे देवी का जन्म हुआ और क्यों दुर्गा की सवारी शेर है?</p>



<figure class="wp-block-image size-full is-style-rounded"><img loading="lazy" decoding="async" width="650" height="366" src="https://www.patnanow.com/assets/2022/09/durga1.png" alt="" class="wp-image-66922" srcset="https://www.patnanow.com/assets/2022/09/durga1.png 650w, https://www.patnanow.com/assets/2022/09/durga1-350x197.png 350w" sizes="(max-width: 650px) 100vw, 650px" /></figure>



<p class="has-vivid-red-color has-text-color">1. कैसे हुआ देवी का जन्म?</p>



<p>देवी का जन्म सबसे पहले दुर्गा के रूप में ही माना जाता है जिसे राक्षस महिषासुर का वध करने के लिए जन्म दिया गया था और यही कारण है कि उन्हें महिषासुर मर्दिनी भी कहा जाता है. पौराणिक कथाओं के अनुसार देवताओं को भगा कर महिषासुर ने स्वर्ग पर कब्जा कर लिया था तब सभी देवता मिलकर त्रिमूर्ती के पास गए थे. ब्रह्मा, विष्णु और शिव ने अपने शरीर की ऊर्जा से एक आकृति बनाई और सभी देवताओं ने अपनी शक्तियां उस आकृति में डाली. इसीलिए दुर्गा को शक्ति भी कहा जाता है. दुर्गा की छवि बेहद सौम्य और आकर्षक थी और उनके कई हाथ थे.</p>



<p>क्योंकि सभी देवताओं ने मिलकर उन्हें शक्ति दी इसलिए वो सबसे ताकतवर भगवान मानी जाती हैं. उन्हें शिव का त्रिशूल मिला, विष्णु का चक्र, बह्मा का कमल, वायु देव से उन्हें नाक मिली, हिमावंत (पर्वतों के देवता) से कपड़े, धनुष और शेर मिला और ऐसे एक-एक कर शक्तियों से वो दुर्गा बनी और युद्ध के लिए तैयार हुईं. दुर्गा की शक्तियों के बारे में रिगवेद के श्लोक 10.125.1 से लेकर 10.125.8 तक देवी सूक्त: में पढ़ा जा सकता है.</p>



<p class="has-vivid-purple-color has-text-color">2. आखिर पूजा 9 दिन ही क्यों की जाती है?</p>



<p>जब दुर्गा या देवी ने महिषासुर पर हमला किया और एक-एक कर दैत्यों को मारना शुरू किया तब भैंसे का रूप धारण करने वाले महिषासुर को मारने के लिए उन्हें 9 दिन लगे. इसलिए नवरात्रि को 9 दिन मनाया जाता है. इससे जुड़ी अन्य कथाएं भी हैं जैसे नवरात्रि को दुर्गा के 9 रूपों से जोड़कर देखा जाता है और कहते हैं कि हर दिन युद्ध में देवी ने अलग रूप लिया था और इसलिए 9 दिन 9 अलग-अलग देवियों की पूजा की जाती है. हर दिन को अलग रंग से जोड़कर भी देखा जाता है.दुर्गा पूजा में दुर्गा के 9 रूपों की पूजा की जाती है</p>



<p class="has-vivid-cyan-blue-color has-text-color">3. क्यों है अष्ट भुजाओं वाली?</p>



<p>देवी दुर्गा को अष्ट भुजाओं वाली कहा जाता है. कुछ शास्त्रों में 10 भुजाओं वाला भी कहा जाता है. वास्तु शास्त्र में 8 अहम दिशाएं होती हैं, लेकिन कई जगहों पर 10 कोण या दिशाओं की बात की जाती है. इनमें हैं प्राची (पूर्व), प्रतीची (पश्चिम), उदीची (उत्तर), अवाचि (दक्षिण), ईशान (नॉर्थ ईस्ट), अग्निया (साउथ ईस्ट), नैऋत्य (साउथ वेस्ट), वायु (नॉर्थ वेस्ट), ऊर्ध्व (आकाश की ओर), अधरस्त (पाताल की ओर). कई जगह 8 दिशाएं ही मानी जाती हैं क्योंकि आकाश और पाताल की ओर को दिशा का दर्जा नहीं दिया जाता. हिंदू शास्त्रों के अनुसार ऐसा माना गया है कि देवी दुर्गा हर दिशा से अपने भक्तों की रक्षा करती हैं और यही कारण है कि उनकी 8 भुजाएं हैं जो आठों दिशाओं में काम करती हैं.</p>



<figure class="wp-block-image size-full is-style-rounded"><img loading="lazy" decoding="async" width="650" height="366" src="https://www.patnanow.com/assets/2022/09/durga.png" alt="" class="wp-image-66923" srcset="https://www.patnanow.com/assets/2022/09/durga.png 650w, https://www.patnanow.com/assets/2022/09/durga-350x197.png 350w" sizes="(max-width: 650px) 100vw, 650px" /></figure>



<p class="has-vivid-cyan-blue-color has-text-color">4. शेर की सवारी ही क्यों?</p>



<p>देवी को शेर पर सवार बताया जाता है. दुर्गा का वाहन शेर है और इसे अतुल्य शक्ति से जोड़कर देखा जाता है. ऐसा माना जाता है कि शेर पर सवार होकर दुर्गा मां दुख और बुराई का अंत करती हैं.</p>



<p class="has-vivid-red-color has-text-color">5. दुर्गा को त्रयंबके क्यों कहा जाता है?</p>



<p>दुर्गा को त्रयंबके कहा जाता है यानी तीन आखों वाली. शिव भी त्रिनेत्र कहलाएं हैं जिनकी तीन आखें थी. दुर्गा को शिव का ही आधा रूप माना जाता है जिसे शक्ति भी कहा जाता है. दुर्गा की तीन आखें अग्नि, सूर्य और चंद्र का प्रतीक मानी जाती हैं.</p>



<p class="has-luminous-vivid-orange-color has-text-color">6. दुर्गा की पूजा के लिए 108 मंत्रों का जाप क्यों होता है?</p>



<p>नवरात्रि को दुर्गा पूजा के नाम से भी जाना जाता है. कहा जाता है कि भगवान राम ने मां दुर्गा की पूजा की थी जिन्हें राम ने महिषासुर मर्दिनी के नाम से ही संबोधित किया था. ये पूजा रावण से युद्ध करने के पूर्व की गई थी और इसीलिए दशहरा नवरात्रि के अंत में मनाया जाता है जिस दिन रावण का वध हुआ था. माना जाता है कि राम जी ने दुर्गा पूजा के वक्त 108 नीलकमल चढ़ाए थे दुर्गा को और इसलिए ही 108 को शुभ माना जाता है.</p>



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<p class="has-vivid-green-cyan-color has-text-color">7. पितृपक्ष के अंत में नवरात्रि क्यों मनाई जाती है?</p>



<p>पितृपक्ष में पितृों की पूजा के बाद ऐसा माना जाता है कि घर की शुद्धी होती है और उसके बाद आता है देवी पक्ष यानी नवरात्रि और इसके बाद से हर तरह के त्योहारों की शुरुआत होती है. ऐसा माना जाता है कि देवी पक्ष के पहले दिन मां दुर्गा अपने बच्चों के साथ पृथ्वी की ओर यात्रा करना शुरू करती हैं.</p>



<p class="has-pale-pink-color has-text-color">8. क्यों ली जाती है तवायफ के घर की मिट्टी?</p>



<p>इस प्रथा से जुड़ी मान्यता ये है कि तवायफ के घर जाने से पहले एक पुरुष अपनी सारी अच्छाइयां और पवित्रता उसके आंगन में छोड़कर ही अंदर जाता है. और यही कारण है कि तवायफ के आंगन की मिट्टी बहुत पवित्र हो जाती है. इसी मिट्टी को मिलाकर दुर्गा की मूर्ति बनती है.</p>



<p class="has-luminous-vivid-amber-color has-text-color"><strong>9. कन्या पूजन या कुमारी पूजन क्यों होता है?</strong></p>



<p>कन्याओं को देवी का रूप माना जाता है और उन्हें सबसे पवित्र माना जाता है जब तक उनकी महावारी शुरू नहीं होती. क्योंकि नवरात्रि को देवी यानी महिला रूप को पूजने के लिए मनाई जाती है इसीलिए इसे छोटी कन्याओं को इससे जोड़ा जाता है. असल में ये पूजा स्वामी विवेकानंद ने 1901 में बेलुर मठ में शुरू की थी. इसे दुर्गा की शक्ति से जोड़कर भी देखा जाता है.</p>



<p><strong>PNCDESK</strong></p>
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