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		<title>रुद्राक्ष: कितना जानते हैं आप!</title>
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		<dc:creator><![CDATA[dnv md]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 03 Aug 2022 06:43:57 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अपना शहर]]></category>
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					<description><![CDATA[रुद्राक्ष पहनना हर तरह से फायदेमंद है जितेन्द्र कुमार सिन्हा, पटना :: भारतीय संस्कृति में रुद्राक्ष, इंसान को हर तरह की हानिकारक ऊर्जा से बचाता है, इसलिए इसका बहुत महत्व है. रुद्राक्ष असरदार रूप से, कवच की तरह नकारात्मक ऊर्जा से बचाने का काम करता है. यह अपने आप में एक अलग विज्ञान है. अर्थव वेद में इस संबंध में बताया गया है कि रुद्राक्ष के ऊर्जा को, लोग अपने हित के लिए और दूसरे को अहित करने के लिए कैसे इस्तेमाल किया जा सकता है. रुद्राक्ष के संबंध में कहा गया है कि खुले में या जंगलों में रहने वाले साधु-संयासी अनजाने स्रोत का पानी नही पीते है, क्योंकि अक्सर किसी जहरीला गैस या किसी वजह से पानी जहरीला भी हो सकता है, रुद्राक्ष की मदद से यह जाना जा सकता है कि वह पानी पीने लायक है या नही। इसके लिए रुद्राक्ष को पानी के ऊपर लटकाना होगा. यदि पानी के ऊपर रुद्राक्ष घड़ी की दिशा में घूमता है तो इसका अर्थ हुआ कि पानी पीने योग्य है और यदि रुद्राक्ष घड़ी के उल्टे दिशा में घूमता है तो इसका अर्थ हुआ कि पानी पीने लायक नहीं है. रुद्राक्ष की उत्पत्ति भगवान शिव के अश्रुओं से हुई है. रुद्र अर्थात् शिव और अश्र अर्थात् आँसू. तात्पर्य यह है की शिव के आँसू ही रुद्राक्ष है, जो फल के रूप में उत्पन्न हुए है. इस संदर्भ में शिव पुराण की विद्येश्वर संहिता में उल्लेख मिलता है.हमारे पौराणिक ग्रंथों में भी रुद्राक्ष के जन्मदाता भगवान शंकर को माना गया है. [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p><em>रुद्राक्ष पहनना हर तरह से फायदेमंद है</em></p>



<p>जितेन्द्र कुमार सिन्हा, पटना ::</p>



<p>भारतीय संस्कृति में रुद्राक्ष, इंसान को हर तरह की हानिकारक ऊर्जा से बचाता है, इसलिए इसका बहुत महत्व है. रुद्राक्ष असरदार रूप से, कवच की तरह नकारात्मक ऊर्जा से बचाने का काम करता है. यह अपने आप में एक अलग विज्ञान है. अर्थव वेद में इस संबंध में बताया गया है कि रुद्राक्ष के ऊर्जा को, लोग अपने हित के लिए और दूसरे को अहित करने के लिए कैसे इस्तेमाल किया जा सकता है.</p>



<figure class="wp-block-image size-large"><img fetchpriority="high" decoding="async" width="541" height="600" src="https://www.patnanow.com/assets/2021/05/pnc-gkc-jitendra-sinha.jpg" alt="" class="wp-image-52742" srcset="https://www.patnanow.com/assets/2021/05/pnc-gkc-jitendra-sinha.jpg 541w, https://www.patnanow.com/assets/2021/05/pnc-gkc-jitendra-sinha-316x350.jpg 316w" sizes="(max-width: 541px) 100vw, 541px" /><figcaption>जितेन्द्र सिन्हा </figcaption></figure>



<p>रुद्राक्ष के संबंध में कहा गया है कि खुले में या जंगलों में रहने वाले साधु-संयासी अनजाने स्रोत का पानी नही पीते है, क्योंकि अक्सर किसी जहरीला गैस या किसी वजह से पानी जहरीला भी हो सकता है, रुद्राक्ष की मदद से यह जाना जा सकता है कि वह पानी पीने लायक है या नही। इसके लिए रुद्राक्ष को पानी के ऊपर लटकाना होगा. यदि पानी के ऊपर रुद्राक्ष घड़ी की दिशा में घूमता है तो इसका अर्थ हुआ कि पानी पीने योग्य है और यदि रुद्राक्ष घड़ी के उल्टे दिशा में घूमता है तो इसका अर्थ हुआ कि पानी पीने लायक नहीं है.</p>



<figure class="wp-block-image size-large"><img decoding="async" width="650" height="458" src="https://www.patnanow.com/assets/2022/08/pnc-rudraksh-रुद्राक्ष.jpg" alt="" class="wp-image-65088" srcset="https://www.patnanow.com/assets/2022/08/pnc-rudraksh-रुद्राक्ष.jpg 650w, https://www.patnanow.com/assets/2022/08/pnc-rudraksh-रुद्राक्ष-350x247.jpg 350w" sizes="(max-width: 650px) 100vw, 650px" /></figure>



<p>रुद्राक्ष की उत्पत्ति भगवान शिव के अश्रुओं से हुई है. रुद्र अर्थात् शिव और अश्र अर्थात् आँसू. तात्पर्य यह है की शिव के आँसू ही रुद्राक्ष है, जो फल के रूप में उत्पन्न हुए है. इस संदर्भ में शिव पुराण की विद्येश्वर संहिता में उल्लेख मिलता है.हमारे पौराणिक ग्रंथों में भी रुद्राक्ष के जन्मदाता भगवान शंकर को माना गया है. शिवपुराण, स्कन्दपुराण, लिंगपुराण आदि में रुद्राक्ष के सम्बंध में आध्यात्मिक, वैज्ञानिक और आयुर्वेदिक प्रकरण मिलते है.</p>



<p>भारत में रुद्राक्ष, विशेषकर हिमालय के आंचलिक भागों में पाया जाता है. बिहार की सीमा से जुड़ा नेपाल के भोजपुर जिले में रुद्राक्ष की पैदावार अधिक होती है. इसके अतिरिक्त तिब्बत, इंडोनेशिया, सुमात्रा, चीन, जावा, मलेशिया, मेडागास्कर, पैसिफिक आइलैंड में भी रुद्राक्ष पैदा होती है.</p>



<figure class="wp-block-image size-large"><img decoding="async" width="650" height="440" src="https://www.patnanow.com/assets/2022/08/pnc-rudraksh-tree-रुद्राक्ष-का-पेड़.jpg" alt="" class="wp-image-65089" srcset="https://www.patnanow.com/assets/2022/08/pnc-rudraksh-tree-रुद्राक्ष-का-पेड़.jpg 650w, https://www.patnanow.com/assets/2022/08/pnc-rudraksh-tree-रुद्राक्ष-का-पेड़-350x237.jpg 350w" sizes="(max-width: 650px) 100vw, 650px" /><figcaption>रुद्राक्ष का पेड़</figcaption></figure>



<p>पुराणों में रुद्राक्ष एकमुखी से लेकर इक्कीसमुखी तक का उल्लेख है, जबकि सामान्य रूप से चौदहमुखी तक का ही रुद्राक्ष मिलता है. </p>



<p><em>एकमुखी रुद्राक्ष</em></p>



<p>एकमुखी रुद्राक्ष साक्षात शिव स्वरूप माना गया है. इसे धारण करने से ब्रह्महत्या जैसे महापाप भी दूर हो जाता है. एकमुखी रुद्राक्ष को अद्वितीय परब्रह्म, वृक्ष संभव ब्रह्म और वृक्ष सम्भव महारत्न माना गया है. इसलिए एकमुखी रुद्राक्ष सर्वोत्तम माना गया है. एकमुखी रुद्राक्ष अत्यंत दुर्लभ होता है.नेपाल के असली एकमुखी गोल दाने वाले रुद्राक्ष का दर्शन भी किसी भाग्यशाली को ही प्राप्त होता है.</p>



<p><em>द्विमुखी रुद्राक्ष</em></p>



<p>द्विमुखी रुद्राक्ष शिव और शक्ति का स्वरूप माना गया है।इसके धारण करने से मानव मुक्ति और मुक्ति, दोनों प्राप्त होता है। अनेक पापों के साथ-साथ गोवध जैसे महापाप भी दूर होता है। इसके धारक को मानसिक शांति, बुद्धि-विवेक जागृत, पारिवारिक सौहार्द में वृद्धि और कार्य-व्यापार में सफलता, मिलती है। यह द्विमुखी रुद्राक्ष भी अत्यंत दुर्लभ होता है, नेपाली गोल दाने के रूप में बहुत कम ही प्राप्त होता है।</p>



<p><em>त्रिमुखी रुद्राक्ष</em></p>



<p>त्रिमुखी रुद्राक्ष सत्व, रज और तम, इन तीनों के त्रिगुणात्मक शक्तियों का स्वरूप माना गया है. यह ब्रह्मा, विष्णु और शिव के स्वरूप का त्रिमूर्तिमय रूप होता है. त्रिमुखी रुद्राक्ष मानव को त्रिकालदर्शी बनाता है अर्थात भूत, भविष्य और वर्तमान का ज्ञान देने वाला होता है. त्रिमुखी रुद्राक्ष को अग्नि रूप माना गया है, इसलिए इसे धारण करने से मनुष्य की विध्वंसात्मक प्रवृत्तियों का दमन होता है और रचनात्मक प्रवृत्तियों का उदय होता है.</p>



<p><em>चतुर्मुखी रुद्राक्ष</em></p>



<p>चतुर्मुखी रुद्राक्ष को चतुर्मुख ब्रह्मा का स्वरूप और चारों वेदों का रूप माना गया है. यह चारों वर्ण ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र और चारों आश्रम ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास के द्वारा पूज्य और वंदनीय है.इसे धारण करने से चतुर्वर्ग फल धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति और सभी तरह के मानसिक रोग ठीक होता है.</p>



<p><em>पंचमुखी रुद्राक्ष</em></p>



<p>पंचमुखी रुद्राक्ष को भगवान शिव का पंचानन (पाँच मुखों) और पंचाक्षर मंत्र “ॐ नमः शिवाय” का साक्षात स्वरूप बताया गया है. पंचमुखी रुद्राक्ष को कालाग्निरुद्र का प्रतीक भी माना गया है. इसे धारण करने से सब प्रकार के पाप मिट जाता है, इसलिए इसे अत्यंत प्रभावशाली तथा महिमामय माना जाता है.</p>



<p>शेष अगले भाग में जानें छे, सात, आठ मुखी रुद्राक्ष और अन्य रुद्राक्ष के बारे में&#8230;</p>



<p><em><strong>जितेन्द्र कुमार सिन्हा </strong></em></p>
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