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	<title>rajkamal prakashan &#8211; Patna Now &#8211; Local News Patna and Bihar | Breaking News Patna | Patna News</title>
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		<title>लेखकों पाठकों की नई पीढ़ी बनाने में जुटा राजकमल प्रकाशन</title>
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		<pubDate>Tue, 15 Nov 2022 06:23:27 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[किताब उत्सव के सफल आयोजन के अवसर पर राजकमल प्रकाशन की पटना शाखा में हुई प्रेस काँफ़्रेंस बिहार के पुस्तक प्रेमी पाठकों और लेखकों से मिला प्यार किताब उत्सव की अपार लोकप्रियता एवं बिहार के पुस्तक प्रेमी पाठकों और लेखकों से मिले प्यार एवं यादों साझा करने के लिए आयोजित प्रेस काँफ़्रेस में राजकमल प्रकाशन समूह के अध्यक्ष अशोक महेश्वरी ने कहा है कि राजकमल पूरी जिम्मेदारी से लेखकों और पाठकों की नई पीढ़ी का निर्माण करने में जुटा है. स्तरीय पुस्तकों के प्रकाशन के जरिये वह विगत पिचहत्तर वर्ष से हिंदी पाठकों की बौद्धिक उन्नति का निरंतर सहयोगी बना हुआ है और आगे की यात्रा में भी अपनी इस भूमिका को बनाए रखेगा. अशोक महेश्वरी ने कहा कि राजकमल अपने पचहत्तरवें वर्ष में देश के प्रमुख शहरों में किताब उत्सव आयोजित कर रहा है. भोपाल और बनारस के बाद हमने पटना में यह आयोजन किया. भोपाल में किताब उत्सव सात दिन का और  बनारस में पांच दिन का था, पर पटना में हमने नौ दिनों का किताब उत्सव मनाया. यह पटना के आप तमाम लोगों के अपनापन और सहयोग के बिना संभव नहीं हो पाता, हम आपके अत्यंत कृतज्ञ हैं. एक सवाल के जवाबमें राजकमल प्रकाशन समूह के अध्यक्ष ने कहा, अपने 75वें वर्ष में राजकमल अपने व्यापक लेखक पाठक पुस्तक प्रेमी समुदाय की भावी आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए पूरे दम ख़म से काम कर रहा है। भविष्य के लिए हमारी कई योजनाएँ हैं जिनका मूल उद्देश्य है घर घर तक स्तरीय पुस्तकें पहुँचाना, अधिक से अधिक लोगों को उनकी पसंद और बौद्धिक ज़रूरत के अनूरूप किताबें मुहैया कराना। हरेक उम्र और [&#8230;]]]></description>
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<p><br><br><strong>किताब उत्सव के सफल आयोजन के अवसर पर राजकमल प्रकाशन की पटना शाखा में हुई प्रेस काँफ़्रेंस</strong></p>



<p><strong>बिहार के पुस्तक प्रेमी पाठकों और लेखकों से मिला  प्यार</strong></p>



<figure class="wp-block-image size-full"><img fetchpriority="high" decoding="async" width="650" height="433" src="https://www.patnanow.com/assets/2022/11/WhatsApp-Image-2022-11-14-at-12.34.38-PM.jpeg" alt="" class="wp-image-68677" srcset="https://www.patnanow.com/assets/2022/11/WhatsApp-Image-2022-11-14-at-12.34.38-PM.jpeg 650w, https://www.patnanow.com/assets/2022/11/WhatsApp-Image-2022-11-14-at-12.34.38-PM-350x233.jpeg 350w" sizes="(max-width: 650px) 100vw, 650px" /></figure>



<p>किताब उत्सव की अपार लोकप्रियता एवं बिहार के पुस्तक प्रेमी पाठकों और लेखकों से मिले प्यार एवं यादों साझा करने के लिए आयोजित प्रेस काँफ़्रेस में राजकमल प्रकाशन समूह के अध्यक्ष अशोक महेश्वरी ने कहा है कि राजकमल पूरी जिम्मेदारी से लेखकों और पाठकों की नई पीढ़ी का निर्माण करने में जुटा है. स्तरीय पुस्तकों के प्रकाशन के जरिये वह विगत पिचहत्तर वर्ष से हिंदी पाठकों की बौद्धिक उन्नति का निरंतर सहयोगी बना हुआ है और आगे की यात्रा में भी अपनी इस भूमिका को बनाए रखेगा.</p>



<p>अशोक महेश्वरी ने कहा कि राजकमल अपने पचहत्तरवें वर्ष में देश के प्रमुख शहरों में किताब उत्सव आयोजित कर रहा है. भोपाल और बनारस के बाद हमने पटना में यह आयोजन किया. भोपाल में किताब उत्सव सात दिन का और  बनारस में पांच दिन का था, पर पटना में हमने नौ दिनों का किताब उत्सव मनाया. यह पटना के आप तमाम लोगों के अपनापन और सहयोग के बिना संभव नहीं हो पाता, हम आपके अत्यंत कृतज्ञ हैं.</p>



<p>एक सवाल के जवाबमें राजकमल प्रकाशन समूह के अध्यक्ष ने कहा, अपने 75वें वर्ष में राजकमल अपने व्यापक लेखक पाठक पुस्तक प्रेमी समुदाय की भावी आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए पूरे दम ख़म से काम कर रहा है। भविष्य के लिए हमारी कई योजनाएँ हैं जिनका मूल उद्देश्य है घर घर तक स्तरीय पुस्तकें पहुँचाना, अधिक से अधिक लोगों को उनकी पसंद और बौद्धिक ज़रूरत के अनूरूप किताबें मुहैया कराना। हरेक उम्र और आय वर्ग के लोगों को ध्यान में रखते हुए काम कर रहे हैं। हम लेखकों और पाठकों की नई पीढ़ी के निर्माण में अभी से जुटे हुए हैं। ताकि राजकमल अपनी 100वीं वर्षगाँठ के पड़ाव पर पहुँचकर एक बिलकुल नई विविधतापूर्ण और सम्यक् लेखक पाठक पीढ़ी के साथ नज़र आए। साथ ही, अपनी पूर्ववर्ती पीढ़ियों की साहित्यिक सांस्कृतिक धरोहर को भी अगली पीढ़ियों तक ले जाए।</p>



<p>राजकमल प्रकाशन समूह के सम्पादकीय निदेशक सत्यानंद निरुपम और सीईओ आमोद महेश्वरी ने भी संवाददाताओं को सम्बोधित किया। राजकमल से प्रकाशित किताबों की प्रस्तुति को लेकर एक सवाल के जवाब में सत्यानंद निरुपम ने कहा, प्रस्तुति से लेकर विषय तक हम किताबों को नए रंग रूप में पेश कर रहे हैं। हमने लप्रेक की शुरुआत की जिसकी चर्चा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर रही। कई विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में उसे जगह दी गयी। लप्रेक एक ऐसा प्रयोग था जो सफल रहा। प्रयोग रोज़ रोज़ नहीं होते। रोज़ रोज़ खेल हो सकते हैं। आने वाले नए साल में इस शृंखला की नई किताबें भी आपके सामने होंगी। एक अन्य सवाल के जवाब में उन्होंने कहा, हिंदी की कठिनता की चर्चा अक्सर की जाती है। यह सवाल हिंदी भाषी के लोग ही अक्सर उठाते हैं।अंग्रेज़ी के संदर्भ में ऐसी शिकायत प्रायः नहीं देखी जाती। सरलता की माँग हिंदी से ही की जाती है। यह विचार करने की बात है। किसी को कोई किताब कोई शैली पसंद आ सकती है। किसी अन्य को कोई और। यह एक स्वाभाविक बात है। &nbsp;</p>



<p>राजकमल प्रकाशन समूह के सीईओ आमोद महेश्वरी ने कहा, भोपाल और बनारस के बाद हम ने पटना में किताब उत्सव का आयोजन किया। हर जगह लोगों ने बढ़ चढ़कर इसमें शिरकत की। लेकिन पटना में जिस उत्साह के साथ लोग उत्सव में शामिल हुए, उससे हमारा हौसला और मज़बूत हुआ।भोपाल में हमने सात दिन का किताब उत्सव किया था। जबकि बनारस में यह पाँच दिन का रहा। वहीं पटना में नौ दिन का किताब उत्सव मनाया गया। इस दौरान पंद्रह हज़ार से अधिक पाठकों व पुस्तक प्रेमियों ने इस उत्सव में शिरकत की। बिहार समेत देश के विभिन्न हिस्सों के 75 लेखक इस उत्सव में आए। पटना से बाहर के चार स्कूलों के बच्चों का उत्सव में आना अप्रत्याशित लेकिन बहुत सुखद रहा। उत्सव में आयोजित पुस्तक प्रदर्शनी से क़रीब सात लाख रुपए की किताबें पाठकों ने ख़रीदीं। पत्रकारों द्वारा पूछे गए सवाल कि किताब उत्सव में कौन सी किताबें पाठकों के बीच सर्वाधिक पसंद की गयीं, के जवाब में आमोद महेश्वरी ने बताया निम्न किताबों के नाम :</p>



<p class="has-vivid-cyan-blue-color has-text-color">रश्मिरथी, लोग जो मुझमें रह गए, आज़ादी मेरा ब्राण्ड, कश्मीर और कश्मीरी पंडित, साये में धूप, अमर देसवा, सच्ची रामायण, रेत समाधि, उसने गांधी को क्यों मारा, भारतीय काव्यशास्त्र, मैला आँचल, भारत विभाजन के गुनहगार, हिंदू बनाम हिंदू, रुकतापुर, दुनिया रोज़ बनती है, गहरी नदिया नाव पुरानी, प्रतिनिधि कहानियाँ, परशुराम की प्रतीक्षा, आधुनिक भारत का ऐतिहासिक यथार्थ, सावरकर : काला पानी और उसके बाद, देहाती दुनिया, राग दरबारी, तानी कथाएँ, काशी का अस्सी, इश्क़ में शहर होना, सोफ़ी का संसार, मेरा परिवार, संस्कृति के चार अध्याय, जगन्नाथ का घोड़ा, गांधी क्यों नहीं मरते, दस साल : जिनसे देश की सियासत बदल गई, बलचनामा। &nbsp;&nbsp;&nbsp;<br><br></p>



<h2 class="has-vivid-purple-color has-text-color wp-block-heading"><strong>संवादधर्मी समाज बनाने की दिशा में एक प्रयास है किताब उत्सव: अशोक महेश्वरी </strong></h2>



<figure class="wp-block-image size-full"><img decoding="async" width="650" height="433" src="https://www.patnanow.com/assets/2022/11/WhatsApp-Image-2022-11-14-at-12.34.41-PM.jpeg" alt="" class="wp-image-68678" srcset="https://www.patnanow.com/assets/2022/11/WhatsApp-Image-2022-11-14-at-12.34.41-PM.jpeg 650w, https://www.patnanow.com/assets/2022/11/WhatsApp-Image-2022-11-14-at-12.34.41-PM-350x233.jpeg 350w" sizes="(max-width: 650px) 100vw, 650px" /></figure>



<p>हमारा समाज परंपरागत रूप से उत्सवधर्मी है. उत्सव निरे मनोरंजन के साधन नहीं होते. उनका विशेष सामाजिक सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य है. समय के साथ समाज का स्वरूप बदलता रहता है. परंपरा में भी परिवर्तन होता है,उसमें नई चीजें जुड़ती हैं. इस तरह नई परंपरा शुरू होती है और हमारी उत्सवधर्मिता भी नया कलेवर ग्रहण करती है. देश के विभिन्न शहरों में किताब उत्सव मनाने की हमारी पहल को निरंतरता और परिवर्तन की इसी धारा में देखना चाहिए.</p>



<p>किताबें शिक्षा और ज्ञान का सर्वाधिक सुगम साधन हैं और उनका उत्सव शिक्षा और ज्ञान के प्रसार की दिशा में&nbsp;,&nbsp;समाज की बौद्धिक उन्नति की दिशा में एक रचनात्मक प्रयास. जब हमने देश के प्रमुख शहरों में किताब उत्सव मनाने का निर्णय किया तब उसके पीछे यही सोच थी. एक बात और थी. एक प्रकाशन के तौर पर यह वर्ष हमारे लिए विशेष महत्वपूर्ण है. देश इस समय आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है और राजकमल भी अपनी स्थापना के पिचहत्तर वर्ष पूरे कर रहा है. आरंभ से ही विभिन्न विषयों और विधाओं की स्तरीय किताबों के प्रकाशन के जरिये हिंदी क्षेत्र में ज्ञान का विकास और प्रसार उसका संकल्प रहा है. अपने 75 वें वर्ष में किताब उत्सव के जरिये उसने अपने आरंभिक संकल्प को पूरा करने के प्रयासों की परिधि को और विस्तारित किया है,&nbsp;किताब उत्सव में हमने शहर के मूर्धन्य साहित्यकारों का कृतित्व स्मरण,&nbsp;समकालीन साहित्यकारों से बातचीत और परिचर्चा,&nbsp;पत्रकारिता और राजनीति जैसे सहित्येतर लेकिन सहयोगी क्षेत्रों के प्रासंगिक मुद्दों व विषयों पर बातचीत आदि को शामिल किया. साथ साथ किताबों की प्रदर्शनी भी लगाने का निर्णय भी किया. भोपाल और बनारस में किताब उत्सव के आयोजन को वहाँ के लोगों ने अपने शहर के सांस्कृतिक उत्सव की तरह अपनाया. उसे अपने शहर की साहित्यिक सांस्कृतिक विरासत के सम्मान और संवर्धन के रूप में देखा. यह बिलकुल वैसा था जैसा हमने सोचा था.</p>



<p>किताब उत्सव की रूपरेखा बनाते समय हमने आयोजन वाले शहर के मूर्धन्य लेखकों के कृतित्व स्मरण से जुड़े सत्र का नाम रखा था, हमारा शहर हमारे गौरव. किताब उत्सव अमूमन आठ-नौ दिनों का रखा जाता है और प्रति दिन ऐसे एक मूर्धन्य लेखक के कृतित्व और व्यक्तित्व पर चर्चा की जाती है जिनका उस शहर से नाता था. उस लेखक के साहित्य की विशेषज्ञता रखने वालों के साथ लेखक के परिवार के सदस्य भी इस कार्यक्रम में आमंत्रित किए जाते हैं. मसलन पटना में हमने दिनकर, रेणु, नागार्जुन, बेनीपुरी, नलिन विलोचन शर्मा, हरिमोहन झा आदि के कृतित्व स्मरण के सत्र रखे. इसका एक विशेष उद्देश्य था. हम पुरखा लेखकों से वर्तमान युवा पीढ़ी को खास कर जोड़ना चाहते थे. वस्तुतः किताब उत्सव को साहित्य-संस्कृति के क्षेत्र में इस समय सक्रिय चारों पीढ़ियों के लेखकों- रचनाकारों के मेल-मुलाकात का जरिया बनाना हमारे उद्देश्यों में शामिल है. इसी कारण उत्सव के तहत आयोजित कार्यक्रमों में नई किताबों के लोकार्पण, लेखक से बातचीत, परिचर्चा जैसे संवादपरक और विमर्शपरक सत्र रखे जाते हैं. वास्तव में  हम चाहते हैं कि किताब उत्सव न केवल पठन पाठन की पुस्तक संस्कृति विकसित करने का माध्यम बने, बल्कि वरिष्ठतम से लेकर युवतम  पीढ़ी की रचनशीलता से लोगों को परिचित कराने का अद्यतन माध्यम भी बने. समाज को बौद्धिक रूप से आगे बढ़ने में सहयोगी बने.भोपाल, बनारस और अब पटना में किताब उत्सव को पुस्तक प्रेमियों ने जिस उत्साह से अपनाया है उसने हमें अपने उत्तरदायित्व के प्रति और प्रतिबद्ध बनाया है.</p>



<p><strong>PNCDESK</strong></p>
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		<title>आचार्य शिवपूजन सहाय ने स्त्री विमर्श की आधारशिला रखी : गीताश्री</title>
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		<dc:creator><![CDATA[pnc]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 08 Nov 2022 03:41:28 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[PATNA]]></category>
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					<description><![CDATA[प्रेमचंद की रचना में भी भोजपुरी समाहित है : प्रकाश उदय किताबों और कृतित्व पर हो रही गुफ्तगू राजकमल प्रकाशन समूह का आयोजन &#8216;किताब उत्सव&#8216; राजकमल प्रकाशन समूह द्वारा आयोजित &#8216;किताब उत्सव&#8217; के तीसरे दिन अचार्य शिवपूजन सहाय: कृतित्व स्मरण, रेणु के गांव, अरज- निहोरा: भोजपुरी कविता का नया प्रस्थान विषय पर अलग-अलग सत्रों में बातचीत हुई. इसके अलावा रविन्द्र भारती का कविता संग्रह ‛जगन्नाथ का घोड़ा’ का लोकार्पण हुआ. जिसमें बड़ी संख्या में साहित्यकार, लेखक, पत्रकार, बुद्धिजीवी, रंगकर्मी, छात्र आदि शामिल हुए. कार्यक्रम के प्रथम सत्र में &#8216;हमारा शहर हमारी गौरव&#8217; के तहत प्रख्यात साहित्यकार शिवपूजन सहाय को समर्पित चर्चा हुई. चर्चा में अपनी बात रखते हुए कथाकार गीताश्री ने कहा कि “आचार्य शिवपूजन सहाय संपादक की भूमिका में वे खुद को साहित्यकार के रूप में भुला दिया. उन्होंने प्रेमचंद के किताब का भी संपादन किया. उनकी &#8216;भगजोगनी&#8217; उपन्यास समाज की सच्चाइयों को सामने रखता है. वर्ष 1928 में ही &#8216;भगजोगनी आज भी जीवित है&#8217; लिखकर उन्होंने स्त्री विमर्श और स्त्री लेखन की आधारशिला रखा था. उनके इस लेखन से ही स्त्री विमर्श का आधार तैयार होता है. विद्युत दूरदर्शी लेखक थे. गीताश्री ने आगे कहा उन्होंने अपने लेखन के माध्यम से बताया कि जिस तरह बाल विवाह एक सामाजिक बुराई है उसी तरह वृद्ध विवाह भी सामाजिक बुराई है. &#160;उन्होंने समाज और सरकारी तंत्र दोनों पर प्रहार किया.” आचार्य शिवपूजन सहाय को याद करते हुए लेखक व पत्रकार विकास कुमार झा ने कहा &#8221; हमें इस बात पर विचार करना चाहिए कि आज वह हमारे लिए कितना प्रासंगिक [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>प्रेमचंद की रचना में भी भोजपुरी समाहित है : प्रकाश उदय</strong></p>



<p><strong>किताबों और कृतित्व पर हो रही गुफ्तगू</strong></p>



<p><strong>राजकमल प्रकाशन समूह का आयोजन &#8216;किताब उत्सव</strong>&#8216;</p>



<p><br>राजकमल प्रकाशन समूह द्वारा आयोजित &#8216;किताब उत्सव&#8217; के तीसरे दिन अचार्य शिवपूजन सहाय: कृतित्व स्मरण, रेणु के गांव, अरज- निहोरा: भोजपुरी कविता का नया प्रस्थान विषय पर अलग-अलग सत्रों में बातचीत हुई. इसके अलावा रविन्द्र भारती का कविता संग्रह ‛जगन्नाथ का घोड़ा’ का लोकार्पण हुआ. जिसमें बड़ी संख्या में साहित्यकार, लेखक, पत्रकार, बुद्धिजीवी, रंगकर्मी, छात्र आदि शामिल हुए. कार्यक्रम के प्रथम सत्र में &#8216;हमारा शहर हमारी गौरव&#8217; के तहत प्रख्यात साहित्यकार शिवपूजन सहाय को समर्पित चर्चा हुई.</p>



<figure class="wp-block-image size-full"><img decoding="async" width="650" height="431" src="https://www.patnanow.com/assets/2022/11/xxxx.jpg" alt="" class="wp-image-68483" srcset="https://www.patnanow.com/assets/2022/11/xxxx.jpg 650w, https://www.patnanow.com/assets/2022/11/xxxx-350x232.jpg 350w" sizes="(max-width: 650px) 100vw, 650px" /></figure>



<p><br>चर्चा में अपनी बात रखते हुए कथाकार गीताश्री ने कहा कि “आचार्य शिवपूजन सहाय संपादक की भूमिका में वे खुद को साहित्यकार के रूप में भुला दिया. उन्होंने प्रेमचंद के किताब का भी संपादन किया. उनकी &#8216;भगजोगनी&#8217; उपन्यास समाज की सच्चाइयों को सामने रखता है. वर्ष 1928 में ही &#8216;भगजोगनी आज भी जीवित है&#8217; लिखकर उन्होंने स्त्री विमर्श और स्त्री लेखन की आधारशिला रखा था. उनके इस लेखन से ही स्त्री विमर्श का आधार तैयार होता है. विद्युत दूरदर्शी लेखक थे. गीताश्री ने आगे कहा उन्होंने अपने लेखन के माध्यम से बताया कि जिस तरह बाल विवाह एक सामाजिक बुराई है उसी तरह वृद्ध विवाह भी सामाजिक बुराई है. &nbsp;उन्होंने समाज और सरकारी तंत्र दोनों पर प्रहार किया.”</p>



<figure class="wp-block-image size-full"><img loading="lazy" decoding="async" width="650" height="431" src="https://www.patnanow.com/assets/2022/11/1.jpg" alt="" class="wp-image-68480" srcset="https://www.patnanow.com/assets/2022/11/1.jpg 650w, https://www.patnanow.com/assets/2022/11/1-350x232.jpg 350w" sizes="(max-width: 650px) 100vw, 650px" /></figure>



<p><br>आचार्य शिवपूजन सहाय को याद करते हुए लेखक व पत्रकार विकास कुमार झा ने कहा &#8221; हमें इस बात पर विचार करना चाहिए कि आज वह हमारे लिए कितना प्रासंगिक हैं. उनके लेखन में विचार कि वह ईंट है, जिस पर आगे का बुनियाद तैयार करना है. उन्होंने बताया आलोचक परमानंद श्रीवास्तव ने उनके बारे में लिखा है कि वे जनता के लेखक थे और जनता की जीवन शक्ति के लेखक थे. वे बड़े निबंधकार थे. फणीश्वर नाथ रेणु के &#8216;मैला आँचल&#8217; से पहले ही ग्रामीण जीवन पर वर्ष 1954 में उन्होंने &#8216;देहाती दुनिया&#8217; लिख दिया था. साहित्य एक सामूहिक कार्य है. आचार्य शिवपूजन जी का जीवन इसी दर्शन पर आगे बढ़ा है. उन्होंने अपने समकालीन साहित्यकारों की रचना पर कठोर परिश्रम किया तथा उसका संपादन किया. उनका लेखन क्षेत्र विविध था. साहित्य, निबंध, व्यंग, पत्रकारिता सभी क्षेत्रों में उन्होंने लिखा है.”<br>&nbsp;</p>



<figure class="wp-block-image size-full"><img loading="lazy" decoding="async" width="650" height="431" src="https://www.patnanow.com/assets/2022/11/3.jpg" alt="" class="wp-image-68481" srcset="https://www.patnanow.com/assets/2022/11/3.jpg 650w, https://www.patnanow.com/assets/2022/11/3-350x232.jpg 350w" sizes="(max-width: 650px) 100vw, 650px" /></figure>



<p>कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कथाकार अवधेश प्रीत ने कहा “उनके कृतित्व में ही उनका व्यक्तित्व निहित है. उन्होंने अपनी आत्मकथा &#8216;मेरा जीवन&#8217; तो लिखा है लेकिन उसमें अपने समकालीन लेखकों की भी चर्चा &nbsp;की है. ऐसे लेखक थे जो किसी भी चीज को गहराइयों में जाकर लिखते थे. कथाकार प्रेमचंद के बारे में उनकी लेखनी एक गतिमान चित्र प्रस्तुत करती है. &nbsp;उन्होंने बताया कि रामपूजन सहाय समाज की कुरीतियों पर प्रहार करते थे. वे गांव की सामाजिक परिस्थितियों का व्यापक और निर्मम चित्र प्रस्तुत किया है.</p>



<p><strong>लेखक हमेशा सरकार को चुनौती पेश करते हैं</strong><br>कार्यक्रम के दूसरे सत्र में राजकमल प्रकाशन समूह से प्रकाशित जाने-माने कवि व नाटककार रविंद्र भारती की नई कविता संग्रह &#8216;जगन्नाथ का घोड़ा&#8217; का लोकार्पण हुआ. लोकार्पण कार्यक्रम में &nbsp;लेखक रविंद भारती सहित प्रख्यात कवि आलोक धन्वा, कवि श्री राम तिवारी एवं पत्रकार अरुण नारायण शामिल थे. लोकार्पण कार्यक्रम में श्रीराम तिवारी ने कहा कि इस कविता के माध्यम से यह दिखाया गया है कि सामान्य आदमी जगन्नाथ का घोड़ा है. यह कविता सामान्य आदमी के दुख दर्द का प्रतिनिधित्व करता है. लोकार्पण समारोह को संबोधित करते हुए आलोक धन्वा ने कहा कि रविंद्र भारती हमेशा से अच्छी कविता लिखते रहे हैं. हालांकि उन्होंने अपने जीवन में काफी दुर्घटना भी झेला है. बेहद खुशी है कि उन्होंने फिर से पुनर्लेखन की प्रक्रिया शुरू की है.</p>



<figure class="wp-block-image size-full"><img loading="lazy" decoding="async" width="650" height="431" src="https://www.patnanow.com/assets/2022/11/2.jpg" alt="" class="wp-image-68482" srcset="https://www.patnanow.com/assets/2022/11/2.jpg 650w, https://www.patnanow.com/assets/2022/11/2-350x232.jpg 350w" sizes="(max-width: 650px) 100vw, 650px" /></figure>



<p>लोकार्पण समारोह में कविता संग्रह के लेखक रविंद्र भारती से पत्रकार अरुण नारायण ने लंबी बातचीत किया. सवाल के जवाब में रविंद्र भारती ने कहा “जगन्नाथ का घोड़ा कविता संग्रह मनुष्य के बाहरी नहीं भीतरी जगत को समझने और देखने की रचना प्रक्रिया है. जब उनसे पूछा गया कि कविता लिखते हुए आप 1974 के जेपी आंदोलन में जेल भी गए? इस पर रविंद्र भारती ने कहा कि “1974 के आंदोलन में कवि ने सरकार को चुनौती पेश किया था. दिनकर की कविता ‛सिंहासन खाली करो कि जनता आती है’ की पंक्तियां तख्ती एवं बैनरों पर हर जगह देखने को मिलती थी. उस आंदोलन में कवि प्रत्यक्ष रूप से शामिल थे. जगह जगह नुक्कड़ों पर कविता पाठ आयोजित की जाती थी. नाटक में भिखारी ठाकुर कविता में नागार्जुन एवं नेता में कर्पूरी ठाकुर ने &nbsp;काफी चुनौती पेश किया. कार्यक्रम में कर्पूरी ठाकुर जयप्रकाश नारायण और फणीश्वर नाथ रेणु से अपने गहरे संबंध के बारे में भी उन्होंने विस्तार से बताया.”</p>



<p><strong>रेणु की रचनाओं में गांव की महक है</strong><br>रेणु के गाँव से विषय पर बातचीत करते हुए गिरिन्द्रनाथ ने राजशेखर से कहा कि हम जो फिल्मों में गाना लिखते है तो हमने जिस तरह से फिल्मों में पंजाबी गाना एवं पंजाबी बोल की लोकप्रियता थी. उसी में मैंने अपने बिहार के गीतों का जो जोग्राफिया &nbsp;नैहर,पीहर जैसे शब्दों को हमने अपने गानों में डाला जिसमे रेणु के शब्दों का समावेश मिलता है . सत्र को आगे बढ़ाते हुए गिरिन्द्रनाथ ने कहा कि रेणु के गाँव मे जब आप जाएंगे तो अभी भी रेणु के द्वार पर वही फुंस का कुछ झलक मिलेगा &nbsp;अभी भी गांव में वही माहौल है अगर ढूंढेंगे. मैं भी गाँव मे रहता हूँ रेणु की रचनाओं में जो गाँव की महक मिलती है और उनके जो पात्र है उसी में जीना चाहता हूँ . गिरिन्द्रनाथ ने राजशेखर से पूछा कि क्या मुम्बई में भी रेणु के पात्र मिलते हैं. इस बात पर राजशेखर ने कहा मैं अभी भी अपने गांव के माहौल को ढूंढता हूँ और तीसरी कसम में जो भाषा है उसे ढूंढने की कोशिश करता हूँ फिल्मों में जो गांव दिखाए जाते हैं वो तो पंजाब के गांव दिखते हैं बहुत दिनों के बाद मैथिली में जो फ़िल्म बनी गामक घर उसमे रेणु के गांव की झलक मिलती है क्योंकि रेणु की रचनाओं में जिस गाँव को रेणु दिखाते हैं वैसा गाँव भी मैं ढूंढने की कोशिश करता हूँ. राजशेखर ने एक वाक्या सुनाया कि जब मैं मुंबई में था और एक फ़िल्म निर्देशक के साथ असिस्ट कर रहा था उसी दौरान उनको पता चला कि मैं लिखता हूँ उन्होंने मुझे कहा कि एक गाना लिखो और एक गीत लिखा &#8220;रंगरेज मेरे रंगरेज मेरे&#8221; इस गाने में कुछ ऐसे शब्द थे कि उसे डिरेक्टर ने सुना ही नहीं था इस पर उन्होंने कहा ये शब्द कौन सी भाषा के शब्द हैं. &nbsp;इस तरह कि दिक्कते आज फ़िल्म इंडस्ट्रीज में है कि उनको बहुत कुछ पता भी नहीं है. गिरिन्द्रनाथ ने कहा कि रेणु को लेकर वर्कशॉप होने चाहिए जो गांव में हो न कि शहर के बंद कमरे में रेणु की बात गाँव मे क्यों नहीं हो रही पटना दिल्ली जैसे बड़े शहरों में ही क्यों होती है. &nbsp;रेणु की बात रेणु के गांव के माहौल में हो जिससे गांव के लोगों को भी रेणु से परिचित हो सकें. रेणु के बहाने ही सही शहर के नई युवा पीढ़ी को गांव की महक तो मिलेगी नहीं तो गांव इसी तरह रोता रहेगा.</p>



<figure class="wp-block-image size-full"><img loading="lazy" decoding="async" width="650" height="431" src="https://www.patnanow.com/assets/2022/11/4.jpg" alt="" class="wp-image-68484" srcset="https://www.patnanow.com/assets/2022/11/4.jpg 650w, https://www.patnanow.com/assets/2022/11/4-350x232.jpg 350w" sizes="(max-width: 650px) 100vw, 650px" /></figure>



<p><strong>प्रेमचंद की रचना में भी भोजपुरी समाहित है </strong><br>आज के अंतिम सत्र में भोजपुरी के कवि प्रकाश उदय और निराला बिदेशिया की बातचीत में कवि प्रकाश उदय ने कहा आम तौर पर भोजपुरी को ध्वस्त करने की बात होती है कि अन्य भाषाओं में बहुत लेखकों की चर्चा होती तो भोजपुरी के भाषा में क्यों नही थोड़ी कम भोजपुरी की रचना है तो &nbsp;विद्यापति ,सुर और तुलसी भी भोजपुरी के ही हैं . हिंदी कविता में भी भोजपुरी समाई है प्रेमचंद की रचना में भी भोजपुरी समाहित है आप कह सकते हैं कि हर जगह आपको भोजपुरी की झलक दिखाई पड़ती है. आज के सत्र में श्रोता के रूप में प्रो तरुण कुमार, अनीश अंकुर, अवधेश प्रीत, समता राय, चन्द्रबिंद, यशवंत मिश्रा, गौतम गुलाल आदि कई लोग मौजूद रहे.</p>
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