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	<title>pinddan &#8211; Patna Now &#8211; Local News Patna and Bihar | Breaking News Patna | Patna News</title>
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		<title>जीते जी जिन्हें करना पड़ता है अपना पिंडदान</title>
		<link>https://www.patnanow.com/those-who-have-to-donate-their-bodies-while-alive/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[pnc]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 16 May 2023 02:08:33 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अपना शहर]]></category>
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					<description><![CDATA[महिला नागा साध्वी ख़ास मौकों पर ही दिखती हैं कठिन तपस्&#x200d;या के बाद नागा साध्वी  बनती हैं महिलाएं नागा साधुओं की बिरादरी में केवल पुरुष ही नहीं महिलाएं भी भारत साधु-संतों का देश है और साधु-संत भी कई तरह के होते हैं. इनका जीवन भी खासा रोमांचकारी है. कुछ साधु-संत तो ऐसे हैं, जो खास मौकों पर ही दुनिया के सामने आते हैं. इसमें नागा साधु शामिल हैं. आमतौर पर लोग पुरुष नागा साधुओं के बारे में ही जानते हैं, जबकि पुरुषों की तरह महिला नागा साध्वी भी होती  हैं. ये जानने के बाद मन में ये सवाल आना लाजिमी है कि क्&#x200d;या महिला नागा साध्वी निर्वस्&#x200d;त्र रहती हैं, जिस तरह पुरुष नागा साधु रहते हैं. साथ ही महिला नागा साध्वी कौन होती हैं और कब दर्शन देती हैं. नागा साधुओं की बिरादरी में केवल पुरुष ही नहीं महिलाएं भी होती हैं. हालांकि महिला नागा साध्वी काफी कम होती हैं और विरले ही दुनिया के सामने आती हैं. महिलाएं कठिन तपस्&#x200d;या के बाद नागा साध्वी बनती हैं. इसके लिए उन्&#x200d;हें सालों तक कठिन तपस्&#x200d;या करनी पड़ती है, जीते जी अपना पिंडदान करना पड़ता है, सिर मुंडवाना पड़ता है और तब कहीं जाकर महिला नागा साध्वी बनती है. ये महिला नागा साध्वी दुनिया से दूर जंगलों, गुफाओं और पहाड़ों पर रहती हैं और भगवान की भक्ति में लीन रहती हैं. हालांकि पुरुषों की तरह महिला नागा साधु निर्वस्&#x200d;त्र नहीं रहती हैं, बल्कि वे कपड़े पहनती हैं. महिला नागा साध्वी जटाएं रखती हैं, माथे पर तिलक लगाती हैं और शरीर पर राख [&#8230;]]]></description>
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<p></p>



<p></p>



<p><strong>महिला नागा साध्वी ख़ास मौकों पर ही दिखती हैं</strong></p>



<p><strong>कठिन तपस्&#x200d;या के बाद नागा साध्वी  बनती हैं महिलाएं</strong></p>



<p><strong>नागा साधुओं की बिरादरी में केवल पुरुष ही नहीं महिलाएं भी </strong></p>



<p>भारत साधु-संतों का देश है और साधु-संत भी कई तरह के होते हैं. इनका जीवन भी खासा रोमांचकारी है. कुछ साधु-संत तो ऐसे हैं, जो खास मौकों पर ही दुनिया के सामने आते हैं. इसमें नागा साधु शामिल हैं. आमतौर पर लोग पुरुष नागा साधुओं के बारे में ही जानते हैं, जबकि पुरुषों की तरह महिला नागा साध्वी भी होती  हैं. ये जानने के बाद मन में ये सवाल आना लाजिमी है कि क्&#x200d;या महिला नागा साध्वी निर्वस्&#x200d;त्र रहती हैं, जिस तरह पुरुष नागा साधु रहते हैं. साथ ही महिला नागा साध्वी कौन होती हैं और कब दर्शन देती हैं.</p>



<figure class="wp-block-image size-full is-resized"><img fetchpriority="high" decoding="async" src="https://www.patnanow.com/assets/2023/05/11753695_1452210055085635_2649563087284470086_n.jpg" alt="" class="wp-image-74439" width="446" height="670" srcset="https://www.patnanow.com/assets/2023/05/11753695_1452210055085635_2649563087284470086_n.jpg 341w, https://www.patnanow.com/assets/2023/05/11753695_1452210055085635_2649563087284470086_n-233x350.jpg 233w" sizes="(max-width: 446px) 100vw, 446px" /></figure>



<p>नागा साधुओं की बिरादरी में केवल पुरुष ही नहीं महिलाएं भी होती हैं. हालांकि महिला नागा साध्वी काफी कम होती हैं और विरले ही दुनिया के सामने आती हैं. महिलाएं कठिन तपस्&#x200d;या के बाद नागा साध्वी बनती हैं. इसके लिए उन्&#x200d;हें सालों तक कठिन तपस्&#x200d;या करनी पड़ती है, जीते जी अपना पिंडदान करना पड़ता है, सिर मुंडवाना पड़ता है और तब कहीं जाकर महिला नागा साध्वी बनती है. ये महिला नागा साध्वी दुनिया से दूर जंगलों, गुफाओं और पहाड़ों पर रहती हैं और भगवान की भक्ति में लीन रहती हैं. हालांकि पुरुषों की तरह महिला नागा साधु निर्वस्&#x200d;त्र नहीं रहती हैं, बल्कि वे कपड़े पहनती हैं.</p>



<figure class="wp-block-image size-full is-resized"><img decoding="async" src="https://www.patnanow.com/assets/2023/05/images.jpg" alt="" class="wp-image-74440" width="525" height="476"/></figure>



<figure class="wp-block-image size-full is-resized"><img decoding="async" src="https://www.patnanow.com/assets/2023/05/download-1-1.jpg" alt="" class="wp-image-74441" width="641" height="365"/></figure>



<p>महिला नागा साध्वी जटाएं रखती हैं, माथे पर तिलक लगाती हैं और शरीर पर राख लपेटती हैं. यानी कि बाकी नागा साधुओं की तरह रहती हैं लेकिन बिना कपड़ों के रहने की बजाय गेरुए रंग का एक वस्&#x200d;त्र भी धारण करती हैं. महिला नागा साध्वी का ये वस्&#x200d;त्र बिना सिला हुआ होता है, जिससे वे अपने तन को ढंकती हैं.  महिला नागा साधु कुंभ, महाकुंभ जैसे खास मौकों पर ही दुनिया के सामने आती हैं. पवित्र नदियों में स्&#x200d;नान के बाद वे जल्&#x200d;द ही गायब हो जाती हैं. यही वजह है कि बहुत कम लोग ही महिला नागा साध्वीओं के दर्शन कर पाते हैं.</p>
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		<title>वाराणसी में पीएम मोदी की मां हीराबेन और पूर्वजों का किया पिंडदान</title>
		<link>https://www.patnanow.com/pind-daan-of-pm-modis-mother-heeraben-and-ancestors-in-varanasi/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[pnc]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 06 May 2023 05:58:42 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Big News]]></category>
		<category><![CDATA[अपना शहर]]></category>
		<category><![CDATA[देश दुनिया]]></category>
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					<description><![CDATA[भाई पंकज मोदी ने किया पिंडदान काशी के प्रसिद्ध दशाश्वमेध घाट पर काशी के ब्राह्मणों द्वारा पिंडदान किया पीएम नरेंद्र मोदी के भाई पंकज मोदी वाराणसी पहुंचे. यहां उन्होंने पूरे विधि-विधान से अपनी मां हीराबेन और पूर्वजों का पिंडदान किया. काशी के प्रसिद्ध दशाश्वमेध घाट पर काशी के ब्राह्मणों द्वारा पिंडदान किया गया. सभी अनुष्ठान तीर्थ पुरोहित राजू झा ने विधि-विधान के साथ पूर्ण कराए. इस दौरान कई बार पंकज मोदी भावुक भी नजर आए. इसके बाद हीराबेन की आत्मा की शांति के लिए पंकज मोदी ने नम आंखों से मां गंगा की प्रार्थना की. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पांच भाई और एक बहन हैं. इसमें सबसे बड़े सोमभाई, उसके बाद अमृत भाई, तीसरे नंबर पर नरेंद्र भाई , उसके बाद प्रहलाद भाई, फिर बहन वसंतीबेन और सबसे छोटे पंकज मोदी हैं. तीर्थ पुरोहित राजू झा ने बताया कि वाराणसी के सांसद और देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की माता जी का पिंडदान विधि-विधान से किया गया. माता जी के साथ उनके पूर्वजों का पिंडदान भी किया गया. काशी मुक्ति क्षेत्र है, यहां पर 84 घाट में दशाश्वमेध घाट प्रधान घाट है. यहां पर पिंडदान करने से उनके माता-पिता और पूर्वजों को मुक्ति प्राप्त होगी. PNCDESK]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p></p>



<p></p>



<p><strong>भाई पंकज मोदी ने किया पिंडदान </strong></p>



<p><strong>काशी के प्रसिद्ध दशाश्वमेध घाट पर काशी के ब्राह्मणों द्वारा पिंडदान किया</strong></p>



<p>पीएम नरेंद्र मोदी के भाई पंकज मोदी वाराणसी पहुंचे. यहां उन्होंने पूरे विधि-विधान से अपनी मां हीराबेन और पूर्वजों का पिंडदान किया. काशी के प्रसिद्ध दशाश्वमेध घाट पर काशी के ब्राह्मणों द्वारा पिंडदान किया गया. सभी अनुष्ठान तीर्थ पुरोहित राजू झा ने विधि-विधान के साथ पूर्ण कराए. इस दौरान कई बार पंकज मोदी भावुक भी नजर आए. इसके बाद हीराबेन की आत्मा की शांति के लिए पंकज मोदी ने नम आंखों से मां गंगा की प्रार्थना की.</p>



<figure class="wp-block-image size-full"><img loading="lazy" decoding="async" width="650" height="410" src="https://www.patnanow.com/assets/2023/05/pinddan.png" alt="" class="wp-image-74082" srcset="https://www.patnanow.com/assets/2023/05/pinddan.png 650w, https://www.patnanow.com/assets/2023/05/pinddan-350x221.png 350w" sizes="(max-width: 650px) 100vw, 650px" /></figure>



<p>प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पांच भाई और एक बहन हैं. इसमें सबसे बड़े सोमभाई, उसके बाद अमृत भाई, तीसरे नंबर पर नरेंद्र भाई , उसके बाद प्रहलाद भाई, फिर बहन वसंतीबेन और सबसे छोटे पंकज मोदी हैं. तीर्थ पुरोहित राजू झा ने बताया कि वाराणसी के सांसद और देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की माता जी का पिंडदान विधि-विधान से किया गया. माता जी के साथ उनके पूर्वजों का पिंडदान भी किया गया. काशी मुक्ति क्षेत्र है, यहां पर 84 घाट में दशाश्वमेध घाट प्रधान घाट है. यहां पर पिंडदान करने से उनके माता-पिता और पूर्वजों को मुक्ति प्राप्त होगी.</p>



<p><strong>PNCDESK</strong></p>
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		<item>
		<title>रूस, जर्मनी,स्पेन समेत कई देशों से पहुंचे पिंडदानी, गया में किया पिंडदान</title>
		<link>https://www.patnanow.com/foreign-pilgrims-from-many-countries-are-also-reaching-gaya-ji/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[pnc]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 13 Sep 2022 06:52:23 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Big News]]></category>
		<category><![CDATA[अपना शहर]]></category>
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					<description><![CDATA[पितृपक्ष में पूर्वजों को मोक्ष दिलाने में विदेशी नागरिक भी आगे कई देशों के विदेशी श्रद्धालु भी पहुंच रहे हैं गया जी आश्विन कृष्णपक्ष की प्रतिपदा से शुरू होकर अमावस्या तक की अवधि पितृपक्ष भारत की सनातन परंपरा विदेशियों को खींच लाई है. पूर्वजों को मोक्ष दिलाने वे भी यहां की पवित्र धरती पर आ रहे हैं. विदेशियों का एक जत्था गुरुवार को गया जी पहुंचा. सभी ने भारतीय वेशभूषा में वैदिक मंत्रोच्चार के बीच कर्मकांड किया. जत्थे में रूस, जर्मनी,स्पेन आदि देश के लोग हैं.उन्होंने बताया कि ये लोग भारतीय संस्कृति से काफी प्रभावित हैं. सभी ने गया जी पहुंचने के बाद पावन भूमि को नमन किया. पितृपक्ष में वे अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए तर्पण व कर्मकांड कर रहे हैं. रूस से टीटोवा मैरिना, शेरेंदो इकातेरी, सामिया डेहरडे, जुलकारिनिवा जुल्फ व इप्रेनटेसेवा यालिया, जर्मनी से युगेनिया क्रेंच, अन्ना बारोन, फिलकोवा इरीना और सेरगिरवा इरीना, माले से क्रियूको एलेक्सैंट, क्यूकोवा टेटालिया, क्रूरकिना इरीना एवं ज्ञेमचिकहिना मॉरी, लक्ष्मी नारायण कौर, ज्वाइंट पैनी, लक्ष्मण सिंह, छैगोतेरीवा, गोलिनोवा विक्टर, सिमेंटेस केसीनूए और स्पेन की डारिया आदि हैं. उन्&#x200d;होंने मोक्षदायिनी फल्गु नदी में तर्पण अर्पण करने के बाद देवघाट पर पिंडदान किया. वे दूसरे दिन शनिवार को पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान और रविवार को अक्षयवट में कर्मकांड करेंगे. उसके बाद सभी नई दिल्ली के लिए रवाना हो गए.जहाँ से वे अपने अपने देश जायेंगे. क्या है वैदिक मत वैदिक मतानुसार जीवित चेतन पितरों अर्थात&#x200d;् जीते हुए ज्ञानी पुरुषों का श्रद्धापूर्वक भोजनादि से सत्कार करना श्राद्ध करना [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p><strong>पितृपक्ष में पूर्वजों को मोक्ष दिलाने में विदेशी नागरिक भी आगे </strong></p>



<p><strong>कई देशों के विदेशी श्रद्धालु भी पहुंच रहे हैं गया जी</strong></p>



<p><strong>आश्विन कृष्णपक्ष की प्रतिपदा से शुरू होकर अमावस्या तक की अवधि पितृपक्ष </strong></p>



<p>भारत की सनातन परंपरा विदेशियों को खींच लाई है. पूर्वजों को मोक्ष दिलाने वे भी यहां की पवित्र धरती पर आ रहे हैं. विदेशियों का एक जत्था गुरुवार को गया जी पहुंचा. सभी ने भारतीय वेशभूषा में वैदिक मंत्रोच्चार के बीच कर्मकांड किया. जत्थे में रूस, जर्मनी,स्पेन आदि देश के लोग हैं.उन्होंने बताया कि ये लोग भारतीय संस्कृति से काफी प्रभावित हैं. सभी ने गया जी पहुंचने के बाद पावन भूमि को नमन किया. </p>



<figure class="wp-block-image size-large"><img loading="lazy" decoding="async" width="650" height="433" src="https://www.patnanow.com/assets/2022/09/FcHR3Q6aUAE_0Dh-650x433.jpg" alt="" class="wp-image-66604" srcset="https://www.patnanow.com/assets/2022/09/FcHR3Q6aUAE_0Dh-650x433.jpg 650w, https://www.patnanow.com/assets/2022/09/FcHR3Q6aUAE_0Dh-350x233.jpg 350w, https://www.patnanow.com/assets/2022/09/FcHR3Q6aUAE_0Dh.jpg 720w" sizes="(max-width: 650px) 100vw, 650px" /></figure>



<p>पितृपक्ष में वे अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए तर्पण व कर्मकांड कर रहे हैं. रूस से टीटोवा मैरिना, शेरेंदो इकातेरी, सामिया डेहरडे, जुलकारिनिवा जुल्फ व इप्रेनटेसेवा यालिया, जर्मनी से युगेनिया क्रेंच, अन्ना बारोन, फिलकोवा इरीना और सेरगिरवा इरीना, माले से क्रियूको एलेक्सैंट, क्यूकोवा टेटालिया, क्रूरकिना इरीना एवं ज्ञेमचिकहिना मॉरी, लक्ष्मी नारायण कौर, ज्वाइंट पैनी, लक्ष्मण सिंह, छैगोतेरीवा, गोलिनोवा विक्टर, सिमेंटेस केसीनूए और स्पेन की डारिया आदि हैं. </p>



<figure class="wp-block-image size-full"><img loading="lazy" decoding="async" width="650" height="391" src="https://www.patnanow.com/assets/2022/09/forener.jpg" alt="" class="wp-image-66605" srcset="https://www.patnanow.com/assets/2022/09/forener.jpg 650w, https://www.patnanow.com/assets/2022/09/forener-350x211.jpg 350w" sizes="(max-width: 650px) 100vw, 650px" /></figure>



<p>उन्&#x200d;होंने मोक्षदायिनी फल्गु नदी में तर्पण अर्पण करने के बाद देवघाट पर पिंडदान किया. वे दूसरे दिन शनिवार को पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान और रविवार को अक्षयवट में कर्मकांड करेंगे. उसके बाद सभी नई दिल्ली के लिए रवाना हो गए.जहाँ से वे अपने अपने देश जायेंगे.</p>



<p class="has-pale-cyan-blue-background-color has-background">क्या है वैदिक मत</p>



<p class="has-pale-cyan-blue-background-color has-background">वैदिक मतानुसार जीवित चेतन पितरों अर्थात&#x200d;् जीते हुए ज्ञानी पुरुषों का श्रद्धापूर्वक भोजनादि से सत्कार करना श्राद्ध करना है. वैदिक मत में जीवित चेतन पितरों, ज्ञाननिष्ठ सत्त्वगुणी पुरुषों का, जो लोक-नाम स्थान है, वही पितृलोक है. जिस प्रदेश में मानस कर्म में प्रधान विचारशील ज्ञानी लोग निवास करते हैं, वह पितृलोक है अथवा उन पितरों के समुदाय मेल का नाम पितृलोक है. पौराणिक ग्रन्थों में जिनके लिये मरने के पश्चात शास्त्रों में पितृलोक में जाना लिखा है, वे शरीर छोड़ने के पश्चात पितृजनों के समुदाय अथवा प्रदेश में अर्थात&#x200d;् पितरों के घरों में जाकर जन्म लेते हैं. मनुस्मृति में उत्पादक, यज्ञोपवीत कराने वाला, विद्यादाता, अन्नदाता और भय से बचाने वाला, ये पांच पिता माने गये हैं. इस प्रकार पितृ शब्द योगरूढ़ है, और अपने उत्पादक पिता में रूढ़ि भी है. लौकिक व्यवहार में पिता शब्द से प्रकरणानुसार जनक, यज्ञोपवीत कराने, अन्न देने व भय से बचाने वाले का ग्रहण होता है. परन्तु श्राद्ध कर्म में विशेषकर पितृ शब्द से विद्यादाता का ग्रहण होता है. अपने उत्पादक पिता की सेवा शुश्रूषा तो सबको सदैव करनी ही चाहिए. ज्ञान अथवा विद्या देने वाले ज्ञानी पिता का भी भोजनादि से प्रतिदिन सत्कार करना चाहिए, वही श्राद्ध है.</p>



<p class="has-cyan-bluish-gray-background-color has-background">श्राद्ध कर्म में पूजने योग्य दो ही हैं&#8211; पितृ और देव</p>



<p class="has-cyan-bluish-gray-background-color has-background">&nbsp;वाणी के कर्म में प्रवीण, पढ़ाने और उपदेश करने में सदा प्रवृत्त अर्थात&#x200d;् पढ़ाने और उपदेशादि वाणी के कर्म द्वारा विद्या का प्रचार करके जगत का उपकार करने के लिए प्रतिक्षण प्रवृत्त पुरुष देवता कहलाते हैं. वाक&#x200d;्, वाणी, सरस्वती, विद्या आदि एकार्थक शब्दों के मद्देनजर विद्यावान लोगों को देव मानना सैद्धांतिक रूप से ठीक ही है. मानसकर्म ज्ञान में सदा रमण करने, मन ही मन में शुद्ध आनन्द की लहरियों का अनुभव करने, अच्छे-बुरे का सदा विवेक से निर्णय करने, अल्पभाषी, अथवा वाणी को वश में करके मौन रहने वाले, जगत के उपकार हेतु सम्यक&#x200d;् ज्ञान व अनुभव प्राप्त विषयों को सरल कर प्रचलित करने वाले पितर हैं.</p>



<p class="has-vivid-cyan-blue-background-color has-background">शतपथ ब्राह्मण के अनुसार जिनमें सत्य बोलना, हितकारी वाक्य बोलना, प्रियवाणी बोलना और वेदादिशास्त्र पढ़ना इन्हीं चार प्रसंगों में वाणी का व्यय करना, किन्तु क्रोधादिपूर्वक नहीं बोलना ये गुण जिनमें हो वे देव हैं. और मानस विचार में तत्पर रहें अर्थात&#x200d;् मन के तीन दोष- किसी दूसरे की वस्तु को लेने की तृष्णा, दूसरों का अनिष्ट विचार और व्यर्थ असम्भव विचार– ये दोष जिनमें न हों तथा मानस तीन गुण&#8211; सब प्राणियों पर दया, निरपेक्ष व संतोष और शुभकर्मों परमात्मा की उपासनादि में श्रद्धाभक्ति, जिनमें विशेष कर हों, वे पितर कहलाते हैं. जिनकी वाणी सब प्रकार शुद्ध है, वे देव और जिनका मन सब प्रकार शुद्ध है, वे पितृ कहलाते हैं. मानस विचार की रक्षा वाणी से होती है, इसीलिए पितृ कार्य का रक्षक देवकार्य को माना है, तथा देव को ऋषि और पितृ को मुनि भी कहा जाता है.</p>



<p class="has-vivid-green-cyan-background-color has-background">मनुस्मृति तृतीय अध्याय श्राद्ध प्रकरण में कहा गया है कि सत्त्वगुण की प्रधानता होने से बुद्धिवर्द्धक तथा खाने योग्य कव्य पदार्थों को प्रयत्न के साथ ज्ञानियों को खिलाना चाहिए और होमने योग्य वस्तु चारों प्रकार के विद्वानों को खिलानी चाहिए. उपनिषदों में भी कहा गया है&#8211; आत्मज्ञानी की पूजा करें. उपनिषदों के इस वचन से भी ज्ञानी लोगों का ही सत्कार सिद्ध होता है. सत्य-असत्य का विवेक करने वाले ज्ञानीजनों की सम्यक&#x200d;् श्रद्धा, भक्ति से सेवा करने वाले सेवकों पर प्रसन्न होकर वे कल्याण करने के लिए मन लगाते हैं. श्रेष्ठमार्ग उपदेश से जता देते हैं कि यह काम ऐसे करना चाहिए. इसी कारण ज्ञानयुक्त पितृजनों की अन्नादि दान से श्रद्धापूर्वक सेवा-शुश्रूषा करनी चाहिए. प्राणियों का प्राण अन्न के ही आश्रय होने के कारण सब सत्कारों में भोजनार्थ अन्न से सत्कार करना ही सबमें मुख्य माना गया है. इसीलिए तर्पण और श्राद्ध में अन्न, जल से सत्कार करना मुख्य है. कालान्तर में वैदिक ज्ञान से दूर होने से तर्पण व श्राद्ध की इस प्राचीन परम्परा में विकृति आ गई, और मृत्यु को प्राप्त लोगों के नाम से पिंड देने की परम्परा चल पड़ी. वैदिक विद्वान वेदविरोधी इन प्रसंगों को प्रक्षिप्त मानते हैं और कहते हैं कि भोजन से ज्ञानी पितृ लोगों का श्राद्ध करना अत्यन्त उचित है.</p>



<p class="has-pale-pink-background-color has-background">पौराणिक मत में आश्विन कृष्णपक्ष की प्रतिपदा से शुरू होकर अमावस्या तक की अवधि को पितृपक्ष माना जाता है. इस काल में पितरों के लिए श्रद्धा से श्राद्ध करना पुण्यकर्म माना गया है. मनुस्मृति के अनुसार नित्य अन्न, जल, दूध अथवा खीर, फल और कन्दमूलों से पितृ नाम ज्ञानी पुरुषों का प्रीतिपूर्वक श्रद्धा से सत्कार करें.</p>



<p class="has-pale-pink-background-color has-background">पाणिनीय सूत्र में श्राद्धे शरदः कहा गया है. इस सूत्र का आशय यह है कि ऋतुवाचक शरद शब्द से श्राद्ध अर्थ में ठञ&#x200d;् प्रत्यय होता है. शरद ऋतु में नैमित्तिक श्राद्ध की विशेषता समझनी चाहिए. अर्थात&#x200d;् साधनों के ठीक-ठीक न मिलने आदि पर श्राद्ध का नैमित्तिक करना कहा गया है. भोजन करने योग्य वस्तु सर्वोपरि उत्तम पदार्थ, वस्तु सब दूध से बनते हैं. और वर्षा ऋतु के होने से गौ आदि पशुओं के भक्ष्य घासादि की अधिकता से दूध अधिक उत्पन्न होता है. श्राद्ध में खीर आदि पुष्ट वस्तुओं का विधान किया गया है. अन्नों के बीच उत्तम माने जाने वाले चावल भी वर्षा की अधिकता से शरद ऋतु में ही उत्पन्न होते हैं. वर्तमान में श्राद्ध नित्य कर्म के रूप में कम और नैमित्तिक कर्म के रूप में ही होता ज्यादा दिखाई देता है.</p>



<p><strong>PNCDESK</strong></p>
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