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		<title>साहित्य में जनतंत्र का क्षरण हो रहा हैः प्रो. बद्री नारायण</title>
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		<pubDate>Thu, 27 Jul 2023 10:34:30 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[साहित्य जगत में कलुष आया है भारतीय साहित्य में जनतंत्र को फिर से जीवित करना होगा नई दिल्ली. इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र न्यास (आईजीएनसीए) के कला निधि प्रभाग ने ‘प्रो. नामवर सिंह स्मृति व्याख्यान’ का आयोजन किया. इस व्याख्यान का विषय था- ‘जनतांत्रिक भाव और साहित्य’ और मुख्य वक्ता थे साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित कवि और जी.बी. पंत सोशल साइंस इंस्टीट्यूट, इलाहाबाद के निदेशक प्रो. बद्री नारायण. इस कार्यक्रम की अध्यक्षता आईजीएनसीए के अध्यक्ष श्री रामबहादुर राय ने की और स्वागत भाषण आईजीएनसीए के सदस्य सचिव प्रो. सच्चिदानंद जोशी ने दिया. इस अवसर पर कला निधि प्रभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. रमेश चंद्र गौर और स्व. नामवर सिंह के सुपुत्र श्री विजय सिंह भी उपस्थित थे. मुख्य वक्ता के तौर पर बोलते हुए प्रो. बद्रीनारायण ने कहा कि स्मृति का संस्थानीकरण बहुत महत्त्वपूर्ण है और आईजीएनसीए ने नामवर सिंह की स्मृति का संस्थानीकरण करने का महत्त्वपूर्ण काम किया है. उन्होंने ‘जनतांत्रिक भाव और साहित्य’ विषय पर व्याख्यान की प्रासंगिकता के बारे में बात करते हुए कहा कि नामवर सिंह की स्मृति में आयोजित व्याख्यान के लिए यह बहुत उपयुक्त विषय है, क्योंकि नामवर सिंह हमेशा संवाद के पक्षधर रहे हैं. नामवर सिंह का साथ हर कोई चाहता था, चाहे वह किसी विचारधारा का हो. नामवर जी को किसी से संवाद करने में कोई समस्या नहीं थी. उन्होंने कहा कि नामवर जी के बारे में, उनकी आलोचना के बारे में, उनके स्वभाव के बारे में एक वाक्य में कहें तो वह होगा- संवाद का स्वभाव. प्रो. बद्री नारायण ने नामवर [&#8230;]]]></description>
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<h2 class="wp-block-heading has-pale-cyan-blue-background-color has-background"><strong>साहित्य जगत में कलुष आया है</strong></h2>



<h2 class="wp-block-heading has-black-color has-pale-cyan-blue-background-color has-text-color has-background"><strong>भारतीय साहित्य में जनतंत्र को फिर से जीवित करना होगा</strong></h2>



<figure class="wp-block-image size-large"><img fetchpriority="high" decoding="async" width="433" height="650" src="https://www.patnanow.com/assets/2023/07/namvar-singh-433x650.jpeg" alt="" class="wp-image-76713" srcset="https://www.patnanow.com/assets/2023/07/namvar-singh-433x650.jpeg 433w, https://www.patnanow.com/assets/2023/07/namvar-singh-233x350.jpeg 233w, https://www.patnanow.com/assets/2023/07/namvar-singh-768x1153.jpeg 768w, https://www.patnanow.com/assets/2023/07/namvar-singh-1023x1536.jpeg 1023w, https://www.patnanow.com/assets/2023/07/namvar-singh.jpeg 1066w" sizes="(max-width: 433px) 100vw, 433px" /></figure>



<p>नई दिल्ली. इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र न्यास (आईजीएनसीए) के कला निधि प्रभाग ने ‘प्रो. नामवर सिंह स्मृति व्याख्यान’ का आयोजन किया. इस व्याख्यान का विषय था- ‘जनतांत्रिक भाव और साहित्य’ और मुख्य वक्ता थे साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित कवि और जी.बी. पंत सोशल साइंस इंस्टीट्यूट, इलाहाबाद के निदेशक प्रो. बद्री नारायण. इस कार्यक्रम की अध्यक्षता आईजीएनसीए के अध्यक्ष श्री रामबहादुर राय ने की और स्वागत भाषण आईजीएनसीए के सदस्य सचिव प्रो. सच्चिदानंद जोशी ने दिया. इस अवसर पर कला निधि प्रभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. रमेश चंद्र गौर और स्व. नामवर सिंह के सुपुत्र श्री विजय सिंह भी उपस्थित थे.</p>



<figure class="wp-block-image size-large"><img decoding="async" width="650" height="433" src="https://www.patnanow.com/assets/2023/07/4fbba364-d1d7-438b-868c-1f75171b6e3e-650x433.jpeg" alt="" class="wp-image-76714" srcset="https://www.patnanow.com/assets/2023/07/4fbba364-d1d7-438b-868c-1f75171b6e3e-650x433.jpeg 650w, https://www.patnanow.com/assets/2023/07/4fbba364-d1d7-438b-868c-1f75171b6e3e-350x233.jpeg 350w, https://www.patnanow.com/assets/2023/07/4fbba364-d1d7-438b-868c-1f75171b6e3e-768x512.jpeg 768w, https://www.patnanow.com/assets/2023/07/4fbba364-d1d7-438b-868c-1f75171b6e3e-1536x1023.jpeg 1536w, https://www.patnanow.com/assets/2023/07/4fbba364-d1d7-438b-868c-1f75171b6e3e.jpeg 1600w" sizes="(max-width: 650px) 100vw, 650px" /></figure>



<p>मुख्य वक्ता के तौर पर बोलते हुए प्रो. बद्रीनारायण ने कहा कि स्मृति का संस्थानीकरण बहुत महत्त्वपूर्ण है और आईजीएनसीए ने नामवर सिंह की स्मृति का संस्थानीकरण करने का महत्त्वपूर्ण काम किया है. उन्होंने ‘जनतांत्रिक भाव और साहित्य’ विषय पर व्याख्यान की प्रासंगिकता के बारे में बात करते हुए कहा कि नामवर सिंह की स्मृति में आयोजित व्याख्यान के लिए यह बहुत उपयुक्त विषय है, क्योंकि नामवर सिंह हमेशा संवाद के पक्षधर रहे हैं. नामवर सिंह का साथ हर कोई चाहता था, चाहे वह किसी विचारधारा का हो. नामवर जी को किसी से संवाद करने में कोई समस्या नहीं थी. उन्होंने कहा कि नामवर जी के बारे में, उनकी आलोचना के बारे में, उनके स्वभाव के बारे में एक वाक्य में कहें तो वह होगा- संवाद का स्वभाव.</p>



<figure class="wp-block-image size-large"><img decoding="async" width="433" height="650" src="https://www.patnanow.com/assets/2023/07/badrinarayan-433x650.jpeg" alt="" class="wp-image-76715" srcset="https://www.patnanow.com/assets/2023/07/badrinarayan-433x650.jpeg 433w, https://www.patnanow.com/assets/2023/07/badrinarayan-233x350.jpeg 233w, https://www.patnanow.com/assets/2023/07/badrinarayan-768x1153.jpeg 768w, https://www.patnanow.com/assets/2023/07/badrinarayan-1023x1536.jpeg 1023w, https://www.patnanow.com/assets/2023/07/badrinarayan.jpeg 1066w" sizes="(max-width: 433px) 100vw, 433px" /></figure>



<p>प्रो. बद्री नारायण ने नामवर सिंह के समय को तीन कालखंडों- 1962 से 1973, 1973 से 1991 और 1991 तथा उसके बाद का समय में विभाजित कर उनके सृजन और विचारयात्रा का विश्लेषण किया. उन्होंने कहा कि नामवर जी के बाद हिन्दी आलोचना लगभग समाप्त हो गई है. उन्होंने साहित्य जगत के खेमे में बंट जाने से साहित्य को होने वाले नुकसानों के बारे में विस्तार से बात की. उन्होंने कहा कि हर का अलग-अलग खेमा है. अब तो जातियों के भी अपने अलग-अलग लेखक संगठन बन रहे हैं. बद्री नारायण ने कहा कि नामवर जी का कहना था कि साहित्यकार ‘परकाया प्रवेश’ कर समाज के यथार्थ को समझता है. प्रो. बद्री नारायण ने कहा कि लेकिन अब हमने अपने-अपने बाड़े बना लिए हैं. साहित्य में जनतंत्र का क्षरण हो रहा है. अगर साहित्य में जनतंत्र खत्म हो जाएगा, तो साहित्य कट्टरपंथी हो जाएगा. साहित्यिक जगत के लिए यह बहुत संकट का समय है. साहित्य जगत में कलुष आया है. उन्होंने कहा कि परम्पराओं की बहुलता भारतीय समाज की शक्ति है.</p>



<p>उन्होंने नामवर सिंह के व्यक्तित्व और कृतित्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वे मौखिक परम्परा को बहुत महत्त्व देते थे. उन्होंने लिखा कम है, बोला ज्यादा है. मौखिक परम्परा लोक चेतना को अभिव्यक्त करती है. आधुनिकता हमारी संवाद परम्परा को बाधित करती है. भारतीय समाज आदान-प्रदान का समाज है. एक-दूसरे को सम्मान देने का समाज है. यह पुनर्जागरण (रिसरेक्शन) का समय है. यह सभ्यता के पुनर्जागरण का समय है. भारतीय साहित्य में जनतांत्रिक चित्ति को फिर से जीवित करना होगा. और, इसके लिए लोक से सीखना होगा, लोक से जुड़ना होगा. उन्होंने इस संदर्भ में कहा कि नामवर सिंह की सैद्धांतिक व वैचारिक जड़ें भी बहुत मजबूत थीं और उनके जीवन की जड़ें भी बहुत मजबूत थीं. उनका मन लोक समाज में रमता था, जहां से वे आए थे.</p>



<figure class="wp-block-image size-large"><img loading="lazy" decoding="async" width="650" height="433" src="https://www.patnanow.com/assets/2023/07/5404d6ac-a38a-48cb-8cef-8bd380831f52-650x433.jpeg" alt="" class="wp-image-76716" srcset="https://www.patnanow.com/assets/2023/07/5404d6ac-a38a-48cb-8cef-8bd380831f52-650x433.jpeg 650w, https://www.patnanow.com/assets/2023/07/5404d6ac-a38a-48cb-8cef-8bd380831f52-350x233.jpeg 350w, https://www.patnanow.com/assets/2023/07/5404d6ac-a38a-48cb-8cef-8bd380831f52-768x512.jpeg 768w, https://www.patnanow.com/assets/2023/07/5404d6ac-a38a-48cb-8cef-8bd380831f52-1536x1023.jpeg 1536w, https://www.patnanow.com/assets/2023/07/5404d6ac-a38a-48cb-8cef-8bd380831f52.jpeg 1600w" sizes="(max-width: 650px) 100vw, 650px" /></figure>



<p>इससे पूर्व प्रो. सच्चिदानंद जोशी ने अपने स्वागत भाषण में कहा कि यह विषय ‘जनतांत्रिक भाव और साहित्य’ बड़ा महत्त्वपूर्ण है, विशेष रूप से जब हम साहित्य के परिप्रेक्ष्य में विचारों की सापेक्षता और निरपेक्षता की बात करते हैं, तो ये बात समझ में आती है कि वर्तमान परिदृश्य कितना कलुषित सा होता जा रहा है कि वहां कोई भी विषय निरपेक्ष नहीं रह गया है. ये साहित्य भी निरपेक्ष भाव से लिखा जाता या उसकी जो वस्तुनिष्ठता (ऑब्जेक्टिविटी) है, उसको देखना हमारे लिए बहुत कठिन हो गया है.</p>



<p>अपने अध्यक्षीय भाषण में रामबहादुर राय ने कहा कि नामवर जी के पास जाने के बाद ये नहीं लगता था कि हम किसी बहुत बड़े, ऊंचे साहित्यकार के पास आए हैं, बल्कि उनके पास जाने से लगता था कि हम अपने अभिभावक के पास आए हैं. साहित्य परम्परा में नामवर सिंह उन लोगों में से हैं, जिनमें हम समाज की छवि देख सकते हैं. नामवर सिंह को अपना परिचय स्वयं मालूम था. मुझे ऐसा लगता है कि जिसको अपना परिचय मालूम है, ऐसा ही कोई व्यक्ति साहित्यकार होता है.</p>



<p>आईजीएनसीए के कला निधि प्रभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. रमेशचंद्र गौर ने इस अवसर पर कला निधि पुस्तकालय और विभिन्न विद्वानों व मशहूर शख्सियतों द्वारा केंद्र को दिए गए निजी संग्रहों के बारे में जानकारी दी. इस निजी संग्रह में आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, प्रो. नामवर सिंह, आचार्य देवेंद्र स्वरूप, प्रो. सुनीति चटर्जी, श्याम बेनगेल, मुल्कराज आनंद जैसे प्रख्यात लोगों द्वारा दी गई सामग्री शामिल है. उन्होंने शोधार्थियों का आह्वान किया कि वे आएं और अपने शोध कार्य में इस संदर्भ पुस्तकालय का लाभ उठाएं. व्याख्यान के अंत में कला निधि प्रभाग के ओ.एन. चौबे ने सभी वक्ताओं, अतिथियों और आगंतुकों को धन्यवाद ज्ञापित किया.</p>



<p><strong>PNCDESK</strong></p>
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