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	<title>mithileshwar ji &#8211; Patna Now &#8211; Local News Patna and Bihar | Breaking News Patna | Patna News</title>
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		<title>कहानीकार मिथिलेश्वर जी के पांच दशक के साहित्य का उदबोधन</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Nikhil]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 02 Feb 2020 16:10:16 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अपना शहर]]></category>
		<category><![CDATA[कला और साहित्य]]></category>
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		<category><![CDATA[मिथिलेश्वर जी कथाकार]]></category>
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					<description><![CDATA[मेरे जानते कहानी साहित्य की सबसे लोकप्रिय विधा रही है. उसकी लोकप्रियता की शक्ति अपने समय और समाज के सच की अभिव्यक्ति तथा संवेदना के नये आख्यानों की रचना में ही निहित होती है. शायद यही वजह है कि अपने जीवन में पढ़ी अनेक कहानियों को हम कभी भूल नहीं पाते हैं. &#8220;उसने कहा था&#8221; के लहना सिंह तथा &#8220;शतरंज के खिलाड़ी&#8221; के मीर मिर्जा ही नहीं, ऐसे सैकड़ों चरित्र और उनके प्रसंग हमारी चेतना को प्रेरित और प्रभावित करते रहे हैं.इन्हीं विशेषताओं के चलते कहानी से मेरा लगाव प्रारंभ से ही रहा है. शायद इसीलिए जिस उम्र में रचनाकार कविता से शुरुआत करते हैं, मैंने कहानी से की. वह 1970 का वर्ष था जब मैं कथा लेखन की दुनिया में आया. वह हिन्दी में व्यापक पाठकीयता का समय था।&#8221;धर्मयुग&#8221;, &#8220;साप्ताहिक हिन्दुस्तान&#8221;, &#8220;सारिका&#8221; जैसी जिन पत्रिकाओं में मैं लिखता था, उनकी प्रसार संख्या लाखों में थी. उस समय पठकों की उत्साहजनक प्रतिक्रियाएं हमारे रचनाकार मन को आश्वस्त करती थीं. कहने की आवश्यकता नहीं कि तब लेखन हमें सामाजिक विकास के संघर्ष में रचनात्मक भागीदारी का एहसास कराता था.इस तरह पिछले पचास वर्षों के दौरान पत्रिकाओं में प्रकाशित कहानियों से जब-जब नए कहानी संग्रह प्रकाशित होते रहे, हमें रचनात्मक सुख की अनुभूति कराते हुए निरंतर रचनारत रहने के लिए प्रेरित करते रहे. इसके मूल में हमारे समय की पाठकीयता की भूमिका महत्वपूर्ण रही है. इस क्रम में मेरे 12 कहानी संग्रह प्रकाशित हुए -बाबूजी-1976, बंद रास्तों के बीच -1978, दूसरा महाभारत-1979, मेघना का निर्णय-1980, तिरिया जनम-1982, हरिहर काका-1983, एक में अनेक-1987, [&#8230;]]]></description>
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<p>मेरे जानते कहानी साहित्य की सबसे लोकप्रिय विधा रही है. उसकी लोकप्रियता की शक्ति अपने समय और समाज के सच की अभिव्यक्ति तथा संवेदना के नये आख्यानों की रचना में ही निहित होती है. शायद यही वजह है कि अपने जीवन में पढ़ी अनेक कहानियों को हम कभी भूल नहीं पाते हैं. &#8220;उसने कहा था&#8221; के लहना सिंह तथा &#8220;शतरंज के खिलाड़ी&#8221; के मीर मिर्जा ही नहीं, ऐसे सैकड़ों चरित्र और उनके प्रसंग हमारी चेतना को प्रेरित और प्रभावित करते रहे हैं.<br>इन्हीं विशेषताओं के चलते कहानी से मेरा लगाव प्रारंभ से ही रहा है. शायद इसीलिए जिस उम्र में रचनाकार कविता से शुरुआत करते हैं, मैंने कहानी से की. वह 1970 का वर्ष था जब मैं कथा लेखन की दुनिया में आया. वह हिन्दी में व्यापक पाठकीयता का समय था।&#8221;धर्मयुग&#8221;, &#8220;साप्ताहिक हिन्दुस्तान&#8221;, &#8220;सारिका&#8221; जैसी जिन पत्रिकाओं में मैं लिखता था, उनकी प्रसार संख्या लाखों में थी. उस समय पठकों की उत्साहजनक प्रतिक्रियाएं हमारे रचनाकार मन को आश्वस्त करती थीं. कहने की आवश्यकता नहीं कि तब लेखन हमें सामाजिक विकास के संघर्ष में रचनात्मक भागीदारी का एहसास कराता था.<br>इस तरह पिछले पचास वर्षों के दौरान पत्रिकाओं में प्रकाशित कहानियों से जब-जब नए कहानी संग्रह प्रकाशित होते रहे, हमें रचनात्मक सुख की अनुभूति कराते हुए निरंतर रचनारत रहने के लिए प्रेरित करते रहे. इसके मूल में हमारे समय की पाठकीयता की भूमिका महत्वपूर्ण रही है. इस क्रम में मेरे 12 कहानी संग्रह प्रकाशित हुए -बाबूजी-1976, बंद रास्तों के बीच -1978, दूसरा महाभारत-1979, मेघना का निर्णय-1980, तिरिया जनम-1982, हरिहर काका-1983, एक में अनेक-1987, एक थे प्रो.बी.लाल-1993, भोर होने से पहले-1994, चल खुसरो घर आपने-2000, जमुनी-2001 तथा रैन भई चहुँ देस-2020 शीघ्र प्रकाश्य.<br>ऐसा नहीं है कि इन पचास वर्षों के दौरान मैंने सिर्फ इन कहानियों की ही रचना की. इस बीच समय-समय पर उपन्यास, आत्मकथाएं, विचार साहित्य, बाल साहित्य और लोक साहित्य की भी रचना की. लेकिन इन सबके मूल में कहानी ही रही. कहानी लेखन की चेतना से ही मेरा पूरा सृजन कार्य प्रेरित और संचालित रहा.<br>कहानी प्रेमी पाठकों, साहित्य के सुधीजनों, शोध छात्रों तथा मित्रों के अवलोकनार्थ अब तक प्रकाशित मेरे कहानी संग्रह यहां प्रस्तुत हैं. विदित है कि पाठकों की सुविधा को ध्यान में रख कर अब इन सभी कहानी संग्रहों की कहानियों को इन्द्रप्रस्थ प्रकाशन, दिल्ली ने &#8220;संपूर्ण कहानियां&#8221; नामक संग्रह के तहत तीन खण्डों में प्रकाशित किया है, जो अमेजॉन आदि अनलाइन विक्रय केन्द्रों पर उपलब्ध हैं. मेरे पाठकों और शोध छात्रों के बीच संपूर्ण कहानियां के इन खण्डों के प्रति बढ़ती लोकप्रियता ने हमारे रचनाकार मन को आश्वस्त किया है.<br> (<strong>हिन्दी के ख्यात कथाकार मिथिलेश्वर की कलम से</strong>)</p>
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