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		<title>जुगनू शारदेय नहीं रहे</title>
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		<dc:creator><![CDATA[pnc]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 15 Dec 2021 10:28:19 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अपना शहर]]></category>
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		<category><![CDATA[Jugnu shardey passed on 15 dec]]></category>
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					<description><![CDATA[धारदार लेखनी और मनमौजी जीवनशैली के लिए मशहूर मुख्यमंत्री ने जताया शोक दी श्रद्धांजलि जन’, ’दिनमान’ और ’धर्मयुग’ और कई पत्र-पत्रिकाओं के थे संपादक बिहार के जाने-माने पत्रकार जुगनू शारदेय का बुधवार को दिल्ली के एक वृद्धाश्रम में निधन हो गया. वह न्युमोनिया से ग्रस्त हो गए थे और उन्हें वृद्धाश्रम की गढ़मुक्तेश्वर स्थित शाखा से दिल्ली लाया गया था. सामाजिक कार्यकर्त्ता राजेंद्र रवि उनकी स्थितियों की लगातार जानकारी ले रहे थे, लेकिन उनकी मृत्यु की जानकारी आश्रम वालों ने दाह संस्कार के बाद दी क्योंकि आश्रम में पुलिस ने लावारिस बता कर भर्ती कराया था. राजेंद्र ने श्मशान जाकर उनकी ठंडी हो गयी चिता पर अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की.उनकी मृत्यु के समय उनका कोई रिश्तेदार या मित्र उनके पास नहीं था. परिवार से वह बहुत पहले निकल गए थे और मित्रों के एक विशाल समूह में विचरते रहते थे. उन्हें जानने वालों में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद भी शामिल हैं. समाजवादी आंदोलन से निकले जुगनू अपनी धारदार लेखनी और मनमौजी जीवनशैली के लिए मशहूर थे. जिंदगी के कुछ आखिरी साल उन्होंने बीमारी और अकेलेपन में काटे. दिल्ली में जब बीमार हालत में उन्हें लक्ष्मीनगर पुलिस ने अपने सरक्षण में लिया और वृद्धाश्रम में दाखिल कराया तो कई पत्रकारों और सामजिक कार्यकर्ताओं ने उनकी देखरेख की व्यवस्था के लिए बिहार के मुख्यमंत्री से अपील की, लेकिन कुछ नतीजा नहीं निकला.वह आश्रम में खासा लोकप्रिय थे और आश्रम के कर्मचारीउन्हें जुगनू दादा कह कर पुकारते थे. अपने अंतिम दिनों में भीउनकी याददाश्त और हंसी कायम [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>धारदार लेखनी और मनमौजी जीवनशैली के लिए मशहूर</strong></p>



<p><strong>मुख्यमंत्री ने जताया शोक दी श्रद्धांजलि </strong></p>



<p><strong>जन’, ’दिनमान’ और ’धर्मयुग’ और कई पत्र-पत्रिकाओं के थे संपादक</strong></p>



<p>बिहार के जाने-माने पत्रकार जुगनू शारदेय का बुधवार को दिल्ली के एक वृद्धाश्रम में निधन हो गया. वह न्युमोनिया से ग्रस्त हो गए थे और उन्हें वृद्धाश्रम की गढ़मुक्तेश्वर स्थित शाखा से दिल्ली लाया गया था. सामाजिक कार्यकर्त्ता राजेंद्र रवि उनकी स्थितियों की लगातार जानकारी ले रहे थे, लेकिन उनकी मृत्यु की जानकारी आश्रम वालों ने दाह संस्कार के बाद दी क्योंकि आश्रम में पुलिस ने लावारिस बता कर भर्ती कराया था. राजेंद्र ने श्मशान जाकर उनकी ठंडी हो गयी चिता पर अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की.उनकी मृत्यु के समय उनका कोई रिश्तेदार या मित्र उनके पास नहीं था. परिवार से वह बहुत पहले निकल गए थे और मित्रों के एक विशाल समूह में विचरते रहते थे. उन्हें जानने वालों में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद भी शामिल हैं.</p>



<figure class="wp-block-image size-large"><img fetchpriority="high" decoding="async" width="300" height="332" src="https://www.patnanow.com/assets/2021/12/jugnu_shardeya.jpg" alt="" class="wp-image-57816"/></figure>



<p>समाजवादी आंदोलन से निकले जुगनू अपनी धारदार लेखनी और मनमौजी जीवनशैली के लिए मशहूर थे. जिंदगी के कुछ आखिरी साल उन्होंने बीमारी और अकेलेपन में काटे. दिल्ली में जब बीमार हालत में उन्हें लक्ष्मीनगर पुलिस ने अपने सरक्षण में लिया और वृद्धाश्रम में दाखिल कराया तो कई पत्रकारों और सामजिक कार्यकर्ताओं ने उनकी देखरेख की व्यवस्था के लिए बिहार के मुख्यमंत्री से अपील की, लेकिन कुछ नतीजा नहीं निकला.वह आश्रम में खासा लोकप्रिय थे और आश्रम के कर्मचारीउन्हें जुगनू दादा कह कर पुकारते थे. अपने अंतिम दिनों में भीउनकी याददाश्त और हंसी कायम रही. अकेला छोड़ देने वालेमित्रों को लेकर उन्हें कोई शिकायत नहीं थी. </p>



<figure class="wp-block-image size-large"><img decoding="async" width="300" height="332" src="https://www.patnanow.com/assets/2021/12/jugnu_shardeya-1.jpg" alt="" class="wp-image-57817"/></figure>



<p>मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने वरिष्ठ पत्रकार जुगनू शारदेय के निधन पर गहरी शोक संवेदना व्यक्त की है. मुख्यमंत्री ने उनके निधन पर शोक व्यक्त करते हुए कहा कि जुगनू शारदेय हिन्दी के जाने-माने पत्रकार थे. मुख्यमंत्री ने दिवंगत आत्मा की चिर शांति तथा उनके परिजनों को दुःख की इस घड़ी में धैर्य धारण करने की शक्ति प्रदान करने की ईश्वर से प्रार्थना की है।</p>



<p>‘जन’, ’दिनमान’ और ’धर्मयुग’ के साथ-साथ वह कई पत्र-पत्रिकाओं के संपादन एवं प्रकाशन से जुड़े रहे.जंगलों से उन्हें बेहद लगाव था। जंगलों के प्रति उनका यही लगाव उनके जीवों के प्रति लगाव में बदल गया. चर्चित ‘मोहन प्यारे का सफेद दस्तावेज’ सफेद बाघ पर लिखी गयी वन्य जीवन की उनकी अनूठी किताब है. इस किताब को पर्यावरण मंत्रालय ने भी 2007 में प्रतिष्ठित ‘मोदिनी पुरस्कार’ से नवाजा था। उनके निधन का समाचार अत्यंत दुखद है. उनके निधन से पत्रकारिता जगत को अपूरणीय क्षति हुई है.</p>



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