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		<title>भय बनी परीक्षा ने ली एक छात्रा की जान</title>
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		<dc:creator><![CDATA[om prakash pandey]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 20 Feb 2026 11:36:52 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[डर, दबाव और सन्नाटा… एक छात्रा की आखिरी रात क्या परीक्षा अब बच्चों के लिए भय का नाम बन गई है? आरा, 20 फरवरी। बिहार के आरा शहर से आई एक दर्दनाक घटना ने समाज को झकझोर कर रख दिया है। परीक्षा की तैयारी में जुटी एक इंटर की छात्रा ने उस मानसिक दबाव से हार मान ली, जिसे अक्सर हम “सामान्य तनाव” समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। यह सिर्फ एक परिवार का दुख नहीं… बल्कि उस बढ़ते परीक्षा-दबाव का आईना है, जो आज हजारों छात्रों की मानसिक स्थिति को प्रभावित कर रहा है। एक होनहार छात्रा… अधूरी रह गई कहानीक्लब रोड निवासी Indian Railways में कार्यरत पिता सतीश पाण्डेय और गृहिणी माता पिंकी पाण्डेय की दूसरी बेटी अनन्या, जिसे घर में प्यार से “गौरी” कहा जाता था, पढ़ाई में लगी थी. अनन्या DAV जगदीशपुर की इंटर की छात्रा थी जिसका एक्जाम सेंटर सोनवर्षा के MDJ कॉलेज में पड़ा था. 18 फरवरी को वह मोरल साइंस का पेपर दे चुकी थी और पेपर अच्छा भी गया था। लेकिन शरीर साथ नहीं दे रहा था… वह बीमार थी, जॉन्डिस से परेशान थी… और शुक्रवार 20 फरवरी को फिजिक्स का पेपर था. रात को पढ़ाई करते-करते उसने जीवन से ही हार मान ली. जब मां रात करीब 1 बजे देखने गईं तो कमरे से कोई जवाब नहीं आया… दरवाजा तोड़ा गया… और सामने ऐसा दृश्य था जिसे कोई भी परिवार कभी देखना नहीं चाहेगा. स्टडी रूम में अनन्या पंखे से दुपट्टे में झूलती एक अतीत बन चुकी थी. टेबल पर रखा था [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>डर, दबाव और सन्नाटा… एक छात्रा की आखिरी रात</strong></p>



<p><strong>क्या परीक्षा अब बच्चों के लिए भय का नाम बन गई है?</strong></p>



<p>आरा, 20 फरवरी। बिहार के आरा शहर से आई एक दर्दनाक घटना ने समाज को झकझोर कर रख दिया है। परीक्षा की तैयारी में जुटी एक इंटर की छात्रा ने उस मानसिक दबाव से हार मान ली, जिसे अक्सर हम “सामान्य तनाव” समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। यह सिर्फ एक परिवार का दुख नहीं… बल्कि उस बढ़ते परीक्षा-दबाव का आईना है, जो आज हजारों छात्रों की मानसिक स्थिति को प्रभावित कर रहा है।</p>



<p><strong>एक होनहार छात्रा… अधूरी रह गई कहानी</strong><br>क्लब रोड निवासी Indian Railways में कार्यरत पिता सतीश पाण्डेय और गृहिणी माता पिंकी पाण्डेय की दूसरी बेटी अनन्या, जिसे घर में प्यार से “गौरी” कहा जाता था, पढ़ाई में लगी थी. अनन्या DAV जगदीशपुर की इंटर की छात्रा थी जिसका एक्जाम सेंटर सोनवर्षा के MDJ कॉलेज में पड़ा था.</p>



<p>18 फरवरी को वह मोरल साइंस का पेपर दे चुकी थी और पेपर अच्छा भी गया था। लेकिन शरीर साथ नहीं दे रहा था… वह बीमार थी, जॉन्डिस से परेशान थी… और शुक्रवार 20 फरवरी को फिजिक्स का पेपर था. रात को पढ़ाई करते-करते उसने जीवन से ही हार मान ली. जब मां रात करीब 1 बजे देखने गईं तो कमरे से कोई जवाब नहीं आया… दरवाजा तोड़ा गया… और सामने ऐसा दृश्य था जिसे कोई भी परिवार कभी देखना नहीं चाहेगा. स्टडी रूम में अनन्या पंखे से दुपट्टे में झूलती एक अतीत बन चुकी थी. टेबल पर रखा था एक छोटा सा सुसाइड नोट, जिसमें परीक्षा, बीमारी और खुद को बोझ समझने की पीड़ा साफ झलक रही थी.</p>



<p><strong>सुसाइड नोट में क्या लिखा</strong></p>



<figure class="wp-block-image size-full"><img fetchpriority="high" decoding="async" width="859" height="1024" src="https://www.patnanow.com/assets/2026/02/1001015800-scaled.jpg" alt="" class="wp-image-95107" srcset="https://www.patnanow.com/assets/2026/02/1001015800-scaled.jpg 859w, https://www.patnanow.com/assets/2026/02/1001015800-545x650.jpg 545w" sizes="(max-width: 859px) 100vw, 859px" /></figure>



<p>मेरे से नहीं होश है अब। मैं एग्जाम नहीं दे पाऊंगी मेरा बोर्ड्स है मेरी तबीयत ही खराब रहती है हमेशा। सब मेरी गलती है। मेरे चलते मेरे पेरेंट्स परेशान है बट हो गया… अब और नहीं… मैं जा रही हूं और किसी के चलते नहीं खुद से जा रही हूं। मम्मी डैडी अपना ध्यान रखिएगा। दीदी बाबू तुम भी…</p>



<p>बाय<br>अनन्या/ गौरी</p>



<p><strong>एक सुसाइड नोट… और हजार सवाल</strong><br>अपने छोड़े सुसाइड नोट में उसने लिखा था कि वह बीमार रहती है… परीक्षा नहीं दे पाएगी… माता-पिता परेशान हैं… और वह किसी के कारण नहीं, खुद से यह कदम उठा रही है।</p>



<p>यह शब्द सिर्फ एक छात्रा की निराशा नहीं… बल्कि उस अदृश्य डर की आवाज हैं। फेल होने का डर… पीछे छूट जाने का डर… और उम्मीदों पर खरा न उतर पाने का डर।</p>



<p><strong>क्या परीक्षा अब डर का दूसरा नाम बन गई है?</strong><br>आज परीक्षा सिर्फ ज्ञान की नहीं… मानसिक सहनशीलता की भी परीक्षा बनती जा रही है। देर से पहुंचने पर केंद्र में प्रवेश नहीं, ट्रैफिक जाम या स्वास्थ्य समस्या की कोई राहत नहीं,“एक मौका चूक गए… तो साल बर्बाद” की मानसिकता इन परिस्थितियों में छात्र परीक्षा को अवसर नहीं… अंतिम निर्णय की तरह देखने लगते हैं।</p>



<p>हाल ही में मसौढ़ी में भी परीक्षा से जुड़ी निराशा के कारण एक बच्ची ने ट्रेन के सामने कूदकर जान दे दी। दो अलग घटनाएं… लेकिन कारण एक परीक्षा का असहनीय दबाव।</p>



<figure class="wp-block-image size-full"><img decoding="async" width="1024" height="593" src="https://www.patnanow.com/assets/2026/02/1001015801-scaled.jpg" alt="" class="wp-image-95108" srcset="https://www.patnanow.com/assets/2026/02/1001015801-scaled.jpg 1024w, https://www.patnanow.com/assets/2026/02/1001015801-650x377.jpg 650w, https://www.patnanow.com/assets/2026/02/1001015801-1536x890.jpg 1536w" sizes="(max-width: 1024px) 100vw, 1024px" /></figure>



<p>अनन्या के पिता रोते हुए सिर्फ इतना कह पाए -“हमने कभी उस पर पढ़ाई का दबाव नहीं बनाया… समझ ही नहीं पाए कि उसने ऐसा क्यों किया…”यही सबसे बड़ा सवाल है &#8211; बच्चे कब चुपचाप टूट जाते हैं… हमें पता ही नहीं चलता।</p>



<p><strong>विशेषज्ञ क्या कहते हैं?</strong><br>मनोवैज्ञानिकों के अनुसार परीक्षा तनाव के प्रमुख कारण:</p>



<ul class="wp-block-list">
<li>असफलता का भय</li>



<li>स्वास्थ्य समस्याओं के साथ पढ़ाई का दबाव</li>



<li>“परफेक्ट होना ही पड़ेगा” की सोच</li>



<li>तुलना और सामाजिक अपेक्षाएं</li>



<li>एक ही परीक्षा को जीवन का फैसला मान लेना<br>जब इन सबके साथ कठोर परीक्षा नियम जुड़ते हैं, तो संवेदनशील बच्चे इसे जीवन-मरण का प्रश्न मान लेते हैं।</li>
</ul>



<p>“फेल होना जीवन की हार नहीं” यह संदेश सभी को देना चाहिए। क्या हम बच्चों को पढ़ा रहे हैं… या उन्हें डरना सिखा रहे हैं? एक छात्रा चली गई… लेकिन पीछे छोड़ गई चेतावनी । परीक्षा से ज्यादा जरूरी है जीवन। यदि आपके घर में भी परीक्षार्थी है तो ध्यान रखें</p>



<ul class="wp-block-list">
<li>उनसे रोज खुलकर बात करें</li>



<li>सिर्फ रिजल्ट नहीं, उनकी भावनाएं पूछें</li>



<li>बीमारी या थकान को हल्के में न लें</li>



<li>तुलना बिल्कुल न करें</li>



<li>जरूरत हो तो काउंसलिंग लें</li>
</ul>



<p>जरूरत क्या है ..सख्ती या संवेदनशीलता?<br>परीक्षा अनुशासन जरूरी है… लेकिन क्या मानवीय परिस्थितियों के लिए लचीलापन नहीं होना चाहिए?<br>बीमारी या आकस्मिक स्थिति में वैकल्पिक परीक्षा,<br>देर से आने पर सीमित समय के साथ प्रवेश और<br>स्कूल स्तर पर मानसिक स्वास्थ्य काउंसलिंग जैसे कार्य किए जा सकते हैं।</p>



<p>अनन्या की कहानी सिर्फ एक खबर नहीं…यह एक समाज की जिम्मेदारी है। जब परीक्षा डर बन जाए<br>तो किताबें नहीं… व्यवस्था बदलने की जरूरत होती है।</p>



<p><strong>PNCB</strong></p>
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