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	<title>August Arunanchal &#8211; Patna Now &#8211; Local News Patna and Bihar | Breaking News Patna | Patna News</title>
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		<title>&#8216;फच्चू आया दिल्ली पढ़ने&#8217; एक नई शिल्प में लिखी पुस्तक</title>
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		<pubDate>Thu, 22 Sep 2022 17:05:31 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[अपना शहर]]></category>
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					<description><![CDATA[“ना बुतखाने ना काबे में मिला है, मगर टूटे हुए दिल में मिला है.” दुनिया में साहित्य के सबसे उजले मोती भी इसी पीड़ा की कोख से निकले हैं. ईश्वर को उलाहना देते इस कलाम में जिस सच की बात नाज ख्यालवी कर रहे हैं, उसी सच की परछाई साहित्य है. ये सनद रहे कि दिल सिर्फ प्रेम कहानियों में नहीं चूर हुआ करते. दुकानों के काउंटरों, लेबर चौकों, चकलाघरों से लेकर गली-चौराहों, चलती गाड़ियों, यहां तक कि भगवान के घरों में भी हर वक्त, कहीं ना कहीं, किसी ना किसी का दिल टूटता है. धरती के घूमने जितना ही सातत्य में. बल्कि कहना चाहिए कि अगर दिल ना टूटें तो दुनिया ही आगे ना बढ़े. जालिम जिंदगी कह लीजिए या स्वार्थी मनुष्य, लेकिन दिल अक्सर दूसरों के ही तोड़े जाते हैं. सिवाए तब, जब आप अपना घर छोड़ रहे हों. अपनी मिट्टी से दूर होना अपना दिल अपने हाथों तोड़ना है. इस कहानी के लेखक ने किसानों से जुड़े मसलों का ऑडियो बुक भी निकाला है. भली-भांति जानते हैं एक जगह से निकालकर दूसरी जगह रोपा जाने पौधों तक के लिए कितना मुश्किल होता है. मगर ये मुश्किल ना हो तो पौधों की नई किस्में ही ना बनें. फल, सब्जियां, फूल सीमित इलाकों में कैद होकर रह जाएं. यदि परिवर्तन सत्य है तो पीड़ा को भी सत्य होना होगा. लेकिन अपना फच्चू पीड़ा से डरता नहीं है. उसके मन की खाली स्लेट पर आगे बढ़ने की प्रेरणा होना भी हैरानी दे जाता है. पूरी कहानी में कहीं भी आप [&#8230;]]]></description>
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<p class="has-luminous-vivid-orange-color has-text-color"><strong>“ना बुतखाने ना काबे में मिला है, मगर टूटे हुए दिल में मिला है.”</strong></p>



<figure class="wp-block-image size-full"><img fetchpriority="high" decoding="async" width="650" height="450" src="https://www.patnanow.com/assets/2022/09/Agasrya-book.png" alt="" class="wp-image-66824" srcset="https://www.patnanow.com/assets/2022/09/Agasrya-book.png 650w, https://www.patnanow.com/assets/2022/09/Agasrya-book-350x242.png 350w, https://www.patnanow.com/assets/2022/09/Agasrya-book-130x90.png 130w" sizes="(max-width: 650px) 100vw, 650px" /></figure>



<p></p>



<p>दुनिया में साहित्य के सबसे उजले मोती भी इसी पीड़ा की कोख से निकले हैं. ईश्वर को उलाहना देते इस कलाम में जिस सच की बात नाज ख्यालवी कर रहे हैं, उसी सच की परछाई साहित्य है. ये सनद रहे कि दिल सिर्फ प्रेम कहानियों में नहीं चूर हुआ करते. दुकानों के काउंटरों, लेबर चौकों, चकलाघरों से लेकर गली-चौराहों, चलती गाड़ियों, यहां तक कि भगवान के घरों में भी हर वक्त, कहीं ना कहीं, किसी ना किसी का दिल टूटता है. धरती के घूमने जितना ही सातत्य में. बल्कि कहना चाहिए कि अगर दिल ना टूटें तो दुनिया ही आगे ना बढ़े.</p>



<figure class="wp-block-image size-full is-resized"><img decoding="async" src="https://www.patnanow.com/assets/2022/09/download-1.jpg" alt="" class="wp-image-66825" width="439" height="359"/><figcaption><strong>अगत्स्य अरुणाचल </strong></figcaption></figure>



<p>जालिम जिंदगी कह लीजिए या स्वार्थी मनुष्य, लेकिन दिल अक्सर दूसरों के ही तोड़े जाते हैं. सिवाए तब, जब आप अपना घर छोड़ रहे हों. अपनी मिट्टी से दूर होना अपना दिल अपने हाथों तोड़ना है. इस कहानी के लेखक ने किसानों से जुड़े मसलों का ऑडियो बुक भी निकाला है. भली-भांति जानते हैं एक जगह से निकालकर दूसरी जगह रोपा जाने पौधों तक के लिए कितना मुश्किल होता है.</p>



<p>मगर ये मुश्किल ना हो तो पौधों की नई किस्में ही ना बनें. फल, सब्जियां, फूल सीमित इलाकों में कैद होकर रह जाएं. यदि परिवर्तन सत्य है तो पीड़ा को भी सत्य होना होगा. लेकिन अपना फच्चू पीड़ा से डरता नहीं है. उसके मन की खाली स्लेट पर आगे बढ़ने की प्रेरणा होना भी हैरानी दे जाता है. पूरी कहानी में कहीं भी आप उसकी दृढ़ता को लेकर आश्वस्त नहीं होते. इसे प्रेरणा ना कहकर घरवालों की इच्छाएं या आशीर्वाद कह सकते हैं.</p>



<p>फच्चू दुनिया को पॉजिटिव नजर से देखता है. दिल्ली की सड़कों पर नजर आते हर दूसरे जलावतन में उसकी नजर एक ऐसा पौधा देखती है, जिसे बेहतर फल के लिए जिंदगी ने दोबारा रोपा है. फच्चू की कहानी महानगरों के असंख्य कोनों में फलने का इंतजार करती जिंदगियों के लिए ताजा फुहार है. ये स्मरण है कि उम्मीद हमेशा रखी जा सकती है.</p>



<p>आज के दौर में किसी किताब को हाथ में लेने के लिए ये जरूरत से ज्यादा वजह है. लेकिन आनंद किसी भी किस्साबयानी की &#8211; बल्कि किसी भी प्रकार की कला की पहली शर्त होनी चाहिए. मुझे नहीं लगता दुनिया के किसी भी साहित्य में इस बात को लेकर मतभेद होगा. ये किताब आपको आपकी जिंदगी के सबसे भीनी यादों में खींचकर ले जाती है. साहित्य के आनंद को दुनियावी आनंद से ऊंचा बताते हुए प्रेमचंद लिखते हैं, “वास्तव में सच्चा आनंद सुंदर और सत्य से मिलता है, उसी आनंद को दर्शाना, वही आनंद उत्पन्न करना साहित्य का उद्देश्य है.”</p>



<p>अपने अतीत के सबसे प्यारे टुकड़े को शब्दों के थाल में ही सही देख और छू सकना, इससे सुंदर और सत्य भला क्या आनंद होगा. इस लिहाज से ये उपन्यास प्रेमचंद के पैमाने पर खरा उतरता है.ये फच्चू भोला सही लेकिन उसे आनंद से नकार नहीं. बल्कि कहना चाहिए भोला है, इसीलिए आनंद से नकार नहीं. </p>



<figure class="wp-block-image size-full"><img decoding="async" width="650" height="390" src="https://www.patnanow.com/assets/2022/09/delhi.png" alt="" class="wp-image-66827" srcset="https://www.patnanow.com/assets/2022/09/delhi.png 650w, https://www.patnanow.com/assets/2022/09/delhi-350x210.png 350w" sizes="(max-width: 650px) 100vw, 650px" /></figure>



<p>टोनी मॉरिसन की किताब सॉन्ग ऑफ सोलोमन से उधार लूं तो “पहली बीयर की बोतल को उसका गला आभार में लगभग छलकने जा रही आंखों से साथ लेता है. दूसरी बोतल को पहली बोतल के नशे पर मुहर लगाने और उसे बढ़ाने के लिए. लेकिन तीसरी बोतल वो इसलिए उठाता है क्योंकि रखी है तो पीने से क्या बिगड़ जाएगा? क्या फर्क पड़ता है?” सुरा और सौंदर्य दोनों के मामले में अपना फच्चू तीन बोतलों के इस क्रम-विकास को पार करता है. वो नई मिट्टी में जड़ें जरूर तलाश रहा है लेकिन उसके तनों से नई टहनियों की कोंपले भी निकल रही हैं. कुछ पत्ते जर्द हो रहे हैं तो कुछ नए भी आ रहे हैं. उसकी जीवन ऊर्जा स्थावर नहीं है, जंगम है. लेखक ईमानदार शब्दों में नायक की इस यात्रा को बयान करते हैं. पत्रकारिता में कलम को अक्सर मर्यादा की ज्यादा कड़ी बेड़ियों की आदत हो जाती है. लेकिन अगस्त्य अरुणाचल की लेखनी ना तो शब्दों से कहानी को या सत्य को ढांपने की कोशिश करती है और ना ही सस्ते रोमांच के लिए उघाड़ने की चेष्टा करती है. जो जैसा है, बेलाग वैसा ही आपके सामने रख देती है.</p>



<p>बेलाग शैली जवानी और प्यार के किस्सों को और भी रंगीन बना देती है. बहुत आसान होता है पाठक जीतने के लिए उस रंगीनियत को रचना का आखिरी ध्येय बना लेना. लेकिन जैसा कि मंटो लिखते हैं, “किसी लड़के को लड़की से इश्क हो जाए तो मैं उसे जुकाम के बराबर भी अहमियत नहीं देता. मगर वह लड़का मेरी तवज्जो अपनी ओर जरूर खींचेगा जो जाहिर करे कि उस पर सैकड़ों लड़कियां जान देती हैं. लेकिन असल में वह मोहब्बत का इतना ही भूखा है जितना बंगाल का भूख से पीड़ित बाशिंदा.”</p>



<p>फच्चू पोस्टरों से झांकता खुली बांहों से देखने वालों को उनके सपने परोसता नायक नहीं है. वो भीड़ का गुमनाम चेहरा है. हमारी कल्पनाओं की पोर्टेट मोड सेल्फी का ब्लर हिस्सा. किताब को पढ़ते हुए वो कब उस ब्लर हिस्से से बाहर निकलकर आपके बगल में कंधे पर हाथ रखकर मुस्कुराता हुआ खड़ा हो जाएगा, पता भी नहीं चलेगा.</p>



<p>अंत में वो क्या बना, क्यों बना, कुछ बना भी या नहीं, इसका फैसला पाठक को खुद करना है. ये भी खुद ही तय कीजिए कि क्या फच्चू आज खुद को कामयाब मानता होगा? अपने अतीत को कितना मिस करता होगा वो? घर, गांव को नहीं तो क्या उस फच्चू को भी नहीं जो ट्रंक घसीटते शहर की ट्रेन पर चढ़ा था?</p>



<figure class="wp-block-image size-full"><img loading="lazy" decoding="async" width="518" height="600" src="https://www.patnanow.com/assets/2022/09/0eba23d5-5caf-452d-8f7a-32cdf6588c40.jpg" alt="" class="wp-image-66826" srcset="https://www.patnanow.com/assets/2022/09/0eba23d5-5caf-452d-8f7a-32cdf6588c40.jpg 518w, https://www.patnanow.com/assets/2022/09/0eba23d5-5caf-452d-8f7a-32cdf6588c40-302x350.jpg 302w" sizes="(max-width: 518px) 100vw, 518px" /><figcaption><strong>दीपक शर्मा </strong></figcaption></figure>



<p>जैसा कि गीतांजलि श्री कहती हैं, “पन्ना मंच है &#8211; द पेज इज अ स्टेज.” अगस्त्य अरुणाचल ने अपने इस उपन्यास के हर पन्ने पर इन्हीं सवालों को मंच दिया है. इस उम्मीद में कि&nbsp; महानगरों की गलियों, दफ्तरों, दुकानों और कैंपसों के नए और पुराने फच्चू इनमें अपनी जिंदगी के सवाल ढूंढेंगे.</p>



<p><strong>दीपक शर्मा,वरिष्ठ पत्रकार,बीबीसी </strong></p>
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