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	<title>ATUL MALIKRAM &#8211; Patna Now &#8211; Local News Patna and Bihar | Breaking News Patna | Patna News</title>
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	<description>Patna News Portal - हर ख़बर पर नज़र</description>
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	<title>ATUL MALIKRAM &#8211; Patna Now &#8211; Local News Patna and Bihar | Breaking News Patna | Patna News</title>
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		<title>मैं हूँ ना !!                   &#8211; अतुल मलिकराम</title>
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		<dc:creator><![CDATA[pnc]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 17 Sep 2023 04:30:32 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[We Care]]></category>
		<category><![CDATA[अपना शहर]]></category>
		<category><![CDATA[काम की ख़बर]]></category>
		<category><![CDATA[सुख समृद्धि]]></category>
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					<description><![CDATA[आप सिर्फ काम पर फोकस करें, बाकी टेंशन कंपनी पर छोड़ दीजिए एक कामकाजी आम नागरिक सबसे ज्यादा वक्त कहाँ बिताता है? घर, मार्केट या रिश्तेदारों में? शायद इनमें से कहीं नहीं… क्योंकि दिन में उसका सबसे अधिक समय उसके ऑफिस या काम की जगह पर ही जाता है. अब एक सामान्य कामकाजी इंसान के पास कितनी तरह की दिक्कतें या चिंताएँ होती हैं, इसका अंदाजा, इस लेख को पढ़ने वाले ज्यादातर लोग लगा सकते हैं. चिंताएँ भी विभिन्न प्रकार की होती हैं, जैसे परिवार की, परिजनों के भविष्य की, समय से पगार न मिलने की, अचानक छुट्टी की दरकार पूरी न होने की या सपनों की लम्बी कतार अधर में लटके होने की आदि. अब यदि एक व्यक्ति इन सभी चिंताओं के बीच कार्यस्थल पर काम करता है, तो क्या वह अपना सौ फीसदी दे पाने में सक्षम होता है? अधिकतर लोगों का जवाब न ही होगा. लेकिन यदि उसे कोई ऐसी कंपनी मिले, जहाँ ये सारी चिंताएँ, उसकी होकर भी उसकी न हो और सभी की जिम्मेदारी उसकी कंपनी ही उठाए.. तो! जी हाँ… सुनने में यह जितना खूबसूरत दिख रहा है, धरातल पर देखने में और भी खास नजर आ सकता है. यदि एक कंपनी का संस्थापक अपने कर्मचारियों के परिवार के सदस्यों से जुड़ जाता है, तो वह उनके सुख-दुःख को समझता है और कई प्रकार से उन्हें सुलझाने की कोशिश करता है, जिससे उस कर्मचारी का बोझ काफी हद तक कम हो जाता है और वह ज्यादा लगन और प्रोडक्टिविटी के साथ काम कर पाता [&#8230;]]]></description>
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<h3 class="wp-block-heading"><br><br><em>आप सिर्फ काम पर फोकस करें, बाकी टेंशन कंपनी पर छोड़ दीजिए</em></h3>



<p>एक कामकाजी आम नागरिक सबसे ज्यादा वक्त कहाँ बिताता है? घर, मार्केट या रिश्तेदारों में? शायद इनमें से कहीं नहीं… क्योंकि दिन में उसका सबसे अधिक समय उसके ऑफिस या काम की जगह पर ही जाता है. अब एक सामान्य कामकाजी इंसान के पास कितनी तरह की दिक्कतें या चिंताएँ होती हैं, इसका अंदाजा, इस लेख को पढ़ने वाले ज्यादातर लोग लगा सकते हैं. <strong>चिंताएँ भी विभिन्न प्रकार की होती हैं, जैसे परिवार की, परिजनों के भविष्य की, समय से पगार न मिलने की, अचानक छुट्टी की दरकार पूरी न होने की या सपनों की लम्बी कतार अधर में लटके होने की आदि. अब यदि एक व्यक्ति इन सभी चिंताओं के बीच कार्यस्थल पर काम करता है, तो क्या वह अपना सौ फीसदी दे पाने में सक्षम होता है? </strong>अधिकतर लोगों का जवाब न ही होगा. लेकिन यदि उसे कोई ऐसी कंपनी मिले, जहाँ ये सारी चिंताएँ, उसकी होकर भी उसकी न हो और सभी की जिम्मेदारी उसकी कंपनी ही उठाए.. तो!</p>



<p>जी हाँ… सुनने में यह जितना खूबसूरत दिख रहा है, धरातल पर देखने में और भी खास नजर आ सकता है. यदि <strong><em>एक कंपनी का संस्थापक अपने कर्मचारियों के परिवार के सदस्यों से जुड़ जाता है, तो वह उनके सुख-दुःख को समझता है और कई प्रकार से उन्हें सुलझाने की कोशिश करता है, जिससे उस कर्मचारी का बोझ काफी हद तक कम हो जाता है और वह ज्यादा लगन और प्रोडक्टिविटी के साथ काम कर पाता है. इससे उसके और उसकी कंपनी, दोनों की उन्नति के रास्ते खुल जाते हैं.</em></strong></p>



<figure class="wp-block-image size-large is-resized"><img fetchpriority="high" decoding="async" src="https://www.patnanow.com/assets/2023/09/atul-sir-2-431x650.jpg" alt="" class="wp-image-78246" width="363" height="547" srcset="https://www.patnanow.com/assets/2023/09/atul-sir-2-431x650.jpg 431w, https://www.patnanow.com/assets/2023/09/atul-sir-2-232x350.jpg 232w, https://www.patnanow.com/assets/2023/09/atul-sir-2-768x1159.jpg 768w, https://www.patnanow.com/assets/2023/09/atul-sir-2-1017x1536.jpg 1017w, https://www.patnanow.com/assets/2023/09/atul-sir-2-1357x2048.jpg 1357w, https://www.patnanow.com/assets/2023/09/atul-sir-2-scaled.jpg 1696w" sizes="(max-width: 363px) 100vw, 363px" /></figure>



<p>हम जानते हैं, आजकल दोस्त और रिश्तेदार सिर्फ कहने के लिए रह गए हैं. यह भी सच है कि कई लोग जो यह लेख पढ़ रहे हैं उन्हें बुरा लगेगा, पर यह एक कटु सत्य है. जब आप खुश हैं, तब सब आपके दरवाजे पर आएँगे, लेकिन जब आप दुखी होंगे, तब कोई नहीं आएगा और आता भी है तो बस दिखावे के लिए और कई बार तो दस बातें ऐसी कर जाने के लिए, जिससे आप और दुखी हो जाएँ. ऐसे में यदि कोई आपके दरवाजे आकर आपकी ओर अपनापन दिखाता है, तो उस दुःख से लड़ने की ताकत तो उसी वक़्त मिल जाती है, लेकिन यदि वह शुभचिंतक आपका बॉस हो, तो आप उस दुःख या पीड़ा से ऊपर आ जाते हैं. और यदि एक बॉस, जिसे आप न जाने कितने ही कारणों से कोसते हैं, उससे दूर भागते हैं, वही यदि आपका मसीहा बन जाए, तो फिर बात ही क्या&#8230;!</p>



<p>इसलिए मैं पहल करना चाहता हूँ कि<strong> हर एक कंपनी के संस्थापक को अपनी कंपनी के कर्मचारियों से व्यक्तिगत रूप से जुड़ना चाहिए, ताकि उसके छत्रछाया में जो लोग भी काम कर रहे हैं, वो पूरे मन से काम कर सकें और एक अच्छा माहौल बनाएँ, ताकि काम के लिए एक अच्छा वातावरण तैयार हो सके. इससे आपके ऑफिस में कार्यरत लोगों के परिजनों को भी तसल्ल्ली रहती है कि उनका बेटा या बेटी एक सुरक्षित और अच्छे वातावरण में काम कर रहा है और उसकी तरक्की पर भी कोई आशंका नहीं होती</strong>. कुल मिलाकर देखें, तो एक सफल व्यवसाय के लिए, कामगारों के साथ संबंध विकसित करना बहुत आवश्यक होता है. एक ऐसी कंपनी जो अपने कर्मचारियों को समझती है, उनकी समस्याओं का समाधान करती है, उनके जीवन में उन्हें उत्तम बनाने के लिए संबंधों को मजबूत बनाती है, तो ज़ाहिर तौर पर ऐसी कंपनी हमेशा अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने में सफल होती है. जब एक संस्थापक अपने कर्मचारियों के परिवार से मिलते हैं, तो उनके द्वारा दिए गए प्यार और समर्थन से सभी लोग आपस में एक समूह बन जाते हैं.</p>



<p><em>एक अच्छे संबंध के साथ, लोग बेहतर काम करने के लिए मोटिवेट होते हैं, उनकी संभावनाओं को समझा जाता है, और वे अपनी क्षमताओं को बढ़ा पाते हैं. इससे कंपनी को उनके भरोसे, उत्साह, और निष्ठा का फायदा मिलता है</em> और इससे कर्मचारियों के लिए कंपनी के प्रति लंबी अवधि तक की निष्ठा बनाए रखना भी आसान हो जाता है.</p>



<p><strong>PNCDESK</strong></p>
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		<title>लक्ष्य से दूर भारत और इंडिया दोनों : अतुल मलिकराम</title>
		<link>https://www.patnanow.com/both-bharat-and-india-are-far-from-the-target-atul-malikram/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[pnc]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 15 Sep 2023 05:22:20 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Politics]]></category>
		<category><![CDATA[अपना शहर]]></category>
		<category><![CDATA[काम की ख़बर]]></category>
		<category><![CDATA[ATUL MALIKRAM]]></category>
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					<description><![CDATA[सामान्य नागरिक को मूल मुद्दों से भटकाना है आज भी 22.4 करोड़ लोगों के पास एक वक्त की रोटी नहीं लैंगिक समानता के मामले में भारत की स्थिति 146 देशों की सूची में 127वें पायदान पर भारत और इंडिया में बीच छिड़ी जंग प्रत्यक्ष रूप से सभी के सामने है, लेकिन इस विषय के पीछे छिपे देश के मूल लक्ष्य पर किसी की नजर नहीं है. हम शून्य गरीबी, शून्य भुखमरी, क्वालिटी एजुकेशन, जेंडर इक्वालिटी जैसे सतत विकास लक्ष्यों को भूलकर, राजनीतिक के एक ऐसे सूत्र का शिकार हो रहे हैं, जिसका उद्देश्य ही सामान्य नागरिक को मूल मुद्दों से भटकाना है. आजादी के सात दशक बीत गए लेकिन एक खुशहाल विश्व की दृष्टि से एसडीजी लक्ष्यों को धरातल पर लाने वाले यूएन के मुताबिक, भारत या इंडिया (देश का सबसे ज्वलंत मुद्दा) में आज भी 22.4 करोड़ लोगों के पास एक वक्त की रोटी नहीं है. नीति आयोग द्वारा जारी पिछले साल की रिपोर्ट के अनुसार भारत की 25 प्रतिशत आबादी गरीबी की मार झेल रही है, यानि देश की कुल जनसंख्या का हर चौथा व्यक्ति गरीबी में जीवन यापन करने पर मजबूर है. यूनिसेफ की एक रिपोर्ट बताती है कि देश में 6-13 वर्ष आयु वर्ग के लगभग 60 लाख बच्चे स्कूल ही नहीं जाते हैं, और वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की ताजा रिपोर्ट ये भी दिखाती है कि लैंगिक समानता के मामले में भारत या इंडिया की स्थिति 146 देशों की सूची में 127वें पायदान पर बेहद दयनीय बनी हुई है. उपरोक्त उदाहरण सिर्फ चार विषयों को लेकर [&#8230;]]]></description>
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<p><strong>सामान्य नागरिक को मूल मुद्दों से भटकाना है</strong></p>



<p><strong>आज भी 22.4 करोड़ लोगों के पास एक वक्त की रोटी नहीं </strong></p>



<p><strong>लैंगिक समानता के मामले में भारत की स्थिति 146 देशों की सूची में 127वें पायदान पर</strong></p>



<p>भारत और इंडिया में बीच छिड़ी जंग प्रत्यक्ष रूप से सभी के सामने है, लेकिन इस विषय के पीछे छिपे देश के मूल लक्ष्य पर किसी की नजर नहीं है. हम शून्य गरीबी, शून्य भुखमरी, क्वालिटी एजुकेशन, जेंडर इक्वालिटी जैसे सतत विकास लक्ष्यों को भूलकर, राजनीतिक के एक ऐसे सूत्र का शिकार हो रहे हैं, जिसका उद्देश्य ही सामान्य नागरिक को मूल मुद्दों से भटकाना है. आजादी के सात दशक बीत गए लेकिन एक खुशहाल विश्व की दृष्टि से एसडीजी लक्ष्यों को धरातल पर लाने वाले यूएन के मुताबिक, भारत या इंडिया (देश का सबसे ज्वलंत मुद्दा) में आज भी 22.4 करोड़ लोगों के पास एक वक्त की रोटी नहीं है. नीति आयोग द्वारा जारी पिछले साल की रिपोर्ट के अनुसार भारत की 25 प्रतिशत आबादी गरीबी की मार झेल रही है, यानि देश की कुल जनसंख्या का हर चौथा व्यक्ति गरीबी में जीवन यापन करने पर मजबूर है. यूनिसेफ की एक रिपोर्ट बताती है कि देश में 6-13 वर्ष आयु वर्ग के लगभग 60 लाख बच्चे स्कूल ही नहीं जाते हैं, और वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की ताजा रिपोर्ट ये भी दिखाती है कि लैंगिक समानता के मामले में भारत या इंडिया की स्थिति 146 देशों की सूची में 127वें पायदान पर बेहद दयनीय बनी हुई है.</p>



<figure class="wp-block-image size-large"><img decoding="async" width="650" height="366" src="https://www.patnanow.com/assets/2023/09/amg1-IndiavsBharat-650x366.jpeg" alt="" class="wp-image-78176" srcset="https://www.patnanow.com/assets/2023/09/amg1-IndiavsBharat-650x366.jpeg 650w, https://www.patnanow.com/assets/2023/09/amg1-IndiavsBharat-350x197.jpeg 350w, https://www.patnanow.com/assets/2023/09/amg1-IndiavsBharat-768x432.jpeg 768w, https://www.patnanow.com/assets/2023/09/amg1-IndiavsBharat-1536x864.jpeg 1536w, https://www.patnanow.com/assets/2023/09/amg1-IndiavsBharat.jpeg 1600w" sizes="(max-width: 650px) 100vw, 650px" /></figure>



<p><br>उपरोक्त उदाहरण सिर्फ चार विषयों को लेकर हैं, लेकिन ऐसे तीस अन्य विषय हो सकते हैं जो वास्तव में चिंतन-मंथन का मुद्दा हैं लेकिन अफ़सोस वे टीवी डिबेट्स में कभी जगह नहीं बना पाते. चूंकि इन विषयों में भारत या इंडिया का असल मुद्दा छिपा है, लिहाज़ा ऐसे विषयों का जिक्र भी राजनेताओं के लिए निषेध माना जाता है और शायद इसीलिए एक के बाद एक मुद्दे, जो यक़ीनन चर्चा का विषय बनने लायक भी नहीं हैं, रणनीतिक ढंग से प्राइम टाइम में आपके सामने परोस दिए जाते हैं. जाहिर है राजनीति में कथनी और करनी, समय और माहौल को देखकर एक्शन लेती है, इसलिए यह भी उम्मीद की जा सकती है कि 2030 तक देश में सतत विकास लक्ष्यों को छोड़कर दूसरे सभी बेमेल मुद्दे आपके सामने आते रहें और एसडीजी लक्ष्यों को कई और सालों के लिए टाल दिया जाएगा. मैं समझता हूं कि फिलहाल भारत हो या इंडिया, जो भी निर्णय हो वो जनता के मत से हो, और जनता का मत राजनीतिक न होकर खुद के लिए हो. आम मतदाता आज यह प्रश्न करने की स्थिति में भले न हो कि आखिर क्यों सिर्फ सियासी लाभ के लिए, बीजेपी-कांग्रेस द्वारा देश का नाम इस्तेमाल किया जा रहा है, लेकिन अपने मत से जवाब देने की स्थिति में जरूर है.</p>



<p>मैं मानता हूं कि देशवासी भारत और इंडिया के बीच का सियासी फेर अच्छे से समझ रहे हैं, लेकिन संशय में है क्योंकि दोनों ही प्रमुख दलों के राज में भारत सबसे गरीब लाचार लोगों की रैंकिंग में नीचे से शीर्ष पर पहुँच गया है. समाज हिन्दू-मुस्लिम के फेर से निकलने के प्रयास में मणिपुर-मेवात जैसी परिस्थितियों का सामना करने पर मजबूर है. उग्रता और कट्टरता आम धारणा बनती जा रही है. एक आम नागरिक के तौर पर हमें खुद से सवाल करने की जरुरत है कि हम देश चलाने के लिए कैसे नेतृत्व का चुनाव कर रहे हैं. समस्या जटिल है क्योंकि राजनीति से प्रेरित है, लेकिन एक राजनीति ही है जो इस समस्या का हल भी है, यदि राजनेता इधर उधर के मुद्दों की बजाए, सतत विकास लक्ष्यों को केंद्र में रखकर कार्य करने लगें तो शायद राजनीति से नाजायज विषयों से देश को बरगलाने की नीति का ही अंत हो जाए, और भारत या इंडिया को एक आदर्श सफल राष्ट्र बनने, या विषय गुरु बनने में अधिक समय न लगे…एक बार सोचियेगा जरूर…</p>



<p><strong>लेखक राजनीतिक रणनीतिकार हैं </strong></p>
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