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		<title>राजधानी पटना में भोजपुरी चित्रकला पर हुई गंभीर चर्चा</title>
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		<dc:creator><![CDATA[om prakash pandey]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 16 Jul 2026 13:40:26 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[पिड़िया कला के संरक्षण और विकास पर जोर पटना,15 जुलाई। रविवार को राजधानी पटना में भोजपुरी चित्रकला और बिहार की पारंपरिक लोककलाओं को केंद्र में रखकर दो महत्वपूर्ण कार्यक्रम आयोजित किए गए। अवसर था नाबार्ड के 45वें स्थापना दिवस का। इस अवसर पर बिहार की उन तीन पारंपरिक कलाओं पर विशेष चर्चा हुई, जिन्हें नाबार्ड के सहयोग से जीआई (Geographical Indication) टैग प्राप्त हुआ है। इनमें भोजपुरी अंचल की पिड़िया कला, नालंदा की बावन बूटी तथा गया की पत्थरकट्टी शिल्पकला शामिल हैं। कार्यक्रम में सबसे अधिक चर्चा भोजपुरी क्षेत्र की पिड़िया कला को लेकर हुई। सर्जना न्यास के अध्यक्ष एवं वरिष्ठ चित्रकार संजीव सिन्हा ने पिड़िया कला के इतिहास से लेकर जीआई टैग मिलने तक की पूरी यात्रा पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि इस पूरी प्रक्रिया में नाबार्ड की महत्वपूर्ण भूमिका रही। विशेष रूप से नाबार्ड के तत्कालीन जिला विकास प्रबंधक (डीडीएम) रणजीत सिन्हा तथा नाबार्ड के अन्य अधिकारियों के सहयोग, मार्गदर्शन और संवेदनशील पहल के कारण आज यह ऐतिहासिक उपलब्धि संभव हो सकी। उन्होंने इसके लिए कलाकारों, नाबार्ड, बिहारवासियों और भोजपुरी भाषा-भाषियों को बधाई एवं शुभकामनाएं दीं। कार्यक्रम में नाबार्ड के पूर्व डीडीएम रणजीत सिन्हा ने कहा कि जीआई टैग केवल किसी कला की पहचान नहीं, बल्कि उसे कानूनी संरक्षण और आर्थिक अवसर भी प्रदान करता है। उन्होंने भोजपुरी चित्रकला से जुड़े कलाकारों और संस्थाओं से अपील की कि वे सर्जना न्यास के साथ संगठित होकर कार्य करें, ताकि उन्हें जीआई टैग से मिलने वाले संरक्षण और अन्य लाभों का पूरा फायदा मिल सके। शाम के [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p><strong>पिड़िया कला के संरक्षण और विकास पर जोर</strong></p>



<p><strong>पटना,15 जुलाई।</strong> रविवार को राजधानी पटना में भोजपुरी चित्रकला और बिहार की पारंपरिक लोककलाओं को केंद्र में रखकर दो महत्वपूर्ण कार्यक्रम आयोजित किए गए। अवसर था <strong>नाबार्ड के 45वें स्थापना दिवस</strong> का। इस अवसर पर बिहार की उन तीन पारंपरिक कलाओं पर विशेष चर्चा हुई, जिन्हें नाबार्ड के सहयोग से <strong>जीआई (Geographical Indication) टैग</strong> प्राप्त हुआ है। इनमें <strong>भोजपुरी अंचल की पिड़िया कला</strong>, <strong>नालंदा की बावन बूटी</strong> तथा <strong>गया की पत्थरकट्टी शिल्पकला</strong> शामिल हैं।</p>



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<p>कार्यक्रम में सबसे अधिक चर्चा भोजपुरी क्षेत्र की <strong>पिड़िया कला</strong> को लेकर हुई। <strong>सर्जना न्यास</strong> के अध्यक्ष एवं वरिष्ठ चित्रकार <strong>संजीव सिन्हा</strong> ने पिड़िया कला के इतिहास से लेकर जीआई टैग मिलने तक की पूरी यात्रा पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि इस पूरी प्रक्रिया में नाबार्ड की महत्वपूर्ण भूमिका रही। विशेष रूप से नाबार्ड के तत्कालीन जिला विकास प्रबंधक (डीडीएम) <strong>रणजीत सिन्हा</strong> तथा नाबार्ड के अन्य अधिकारियों के सहयोग, मार्गदर्शन और संवेदनशील पहल के कारण आज यह ऐतिहासिक उपलब्धि संभव हो सकी। उन्होंने इसके लिए कलाकारों, नाबार्ड, बिहारवासियों और भोजपुरी भाषा-भाषियों को बधाई एवं शुभकामनाएं दीं।</p>



<figure class="wp-block-image size-full"><img loading="lazy" decoding="async" width="768" height="1024" src="https://www.patnanow.com/assets/2026/07/1001511324-scaled.jpg" alt="" class="wp-image-97717" srcset="https://www.patnanow.com/assets/2026/07/1001511324-scaled.jpg 768w, https://www.patnanow.com/assets/2026/07/1001511324-488x650.jpg 488w, https://www.patnanow.com/assets/2026/07/1001511324-1152x1536.jpg 1152w" sizes="auto, (max-width: 768px) 100vw, 768px" /></figure>



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<p>कार्यक्रम में नाबार्ड के पूर्व डीडीएम <strong>रणजीत सिन्हा</strong> ने कहा कि <strong>जीआई टैग</strong> केवल किसी कला की पहचान नहीं, बल्कि उसे कानूनी संरक्षण और आर्थिक अवसर भी प्रदान करता है। उन्होंने भोजपुरी चित्रकला से जुड़े कलाकारों और संस्थाओं से अपील की कि वे <strong>सर्जना न्यास</strong> के साथ संगठित होकर कार्य करें, ताकि उन्हें जीआई टैग से मिलने वाले संरक्षण और अन्य लाभों का पूरा फायदा मिल सके।</p>



<p>शाम के सत्र में <strong>फोकार्टोपीडिया फाउंडेशन</strong> द्वारा <strong>&#8220;टिकुली और भोजपुरी पेंटिंग की चुनौतियां&#8221;</strong> विषय पर परिचर्चा आयोजित की गई। बिहार की लोककलाओं और रचनात्मक अर्थव्यवस्था पर कार्य कर रही इस संस्था की बैठक में टिकुली पेंटिंग और भोजपुरी चित्रकला के समक्ष मौजूद वर्तमान चुनौतियों पर गंभीर विमर्श हुआ।</p>



<p>इस अवसर पर <strong>पद्मश्री अशोक कुमार विश्वास</strong> ने टिकुली पेंटिंग की वर्तमान स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि व्यापक प्रचार-प्रसार के बावजूद गांवों में कलाकारों के प्रशिक्षण के लिए पर्याप्त सरकारी सहयोग नहीं मिल पा रहा है। प्रशिक्षण के अभाव में इस कला के माध्यम से रोजगार सृजन की संभावनाएं भी प्रभावित हो रही हैं।</p>



<p>वहीं वरिष्ठ चित्रकार <strong>संजीव सिन्हा</strong> ने कहा कि <strong>भोजपुरी पेंटिंग पर अभी और व्यापक शोध तथा गंभीर कार्य की आवश्यकता है।</strong> उन्होंने कहा कि सबसे बड़ी चुनौती इसके मूल स्वरूप और सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखते हुए समकालीन विषयों को इससे जोड़ना है, ताकि यह कला आने वाली पीढ़ियों के बीच भी प्रासंगिक बनी रहे।</p>



<p>कार्यक्रम का संचालन प्रसिद्ध कला लेखक एवं नाटककार <strong>अनीश अंकुर</strong> ने किया।</p>



<p><strong>पटना में गूंजा भोजपुरी चित्रकला का रंग, &#8216;पिड़िया कला&#8217; बनी चर्चा का केंद्र</strong><br><br><strong>पटना,15 जुलाई।</strong> राजधानी पटना में रविवार का दिन भोजपुरी लोककला और उसकी विरासत के नाम रहा। एक ओर नाबार्ड के 45वें स्थापना दिवस पर बिहार की जीआई टैग प्राप्त पारंपरिक कलाओं की उपलब्धियों का जश्न मनाया गया, तो दूसरी ओर भोजपुरी चित्रकला और टिकुली पेंटिंग के भविष्य को लेकर गंभीर मंथन भी हुआ।<br><br>नाबार्ड के स्थापना दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में बिहार की तीन जीआई टैग प्राप्त कलाओं, <strong>भोजपुरी अंचल की पिड़िया कला, नालंदा की बावन बूटी और गया की पत्थरकट्टी शिल्पकला </strong>को विशेष रूप से प्रस्तुत किया गया। हालांकि पूरे आयोजन में सबसे अधिक आकर्षण और चर्चा का केंद्र <strong>भोजपुरी पिड़िया कला</strong> रही।<br><br><strong>सर्जना न्यास</strong> के अध्यक्ष एवं वरिष्ठ चित्रकार <strong>संजीव सिन्हा</strong> ने पिड़िया कला की ऐतिहासिक यात्रा, उसके सांस्कृतिक महत्व और जीआई टैग तक पहुंचने की कहानी साझा की। उन्होंने कहा कि यह उपलब्धि वर्षों की मेहनत का परिणाम है, जिसमें नाबार्ड ने एक महत्वपूर्ण सहयोगी की भूमिका निभाई। उन्होंने विशेष रूप से नाबार्ड के पूर्व जिला विकास प्रबंधक (डीडीएम) <strong>रणजीत सिन्हा</strong> और नाबार्ड के अधिकारियों के सहयोग को याद करते हुए कहा कि उनके प्रयासों के बिना यह मुकाम हासिल करना आसान नहीं था।<br><br>पूर्व डीडीएम <strong>रणजीत सिन्हा</strong> ने कहा कि जीआई टैग किसी कला को केवल नई पहचान ही नहीं देता, बल्कि उसे कानूनी सुरक्षा और आर्थिक मजबूती भी प्रदान करता है। उन्होंने कलाकारों से संगठित होकर कार्य करने और सर्जना न्यास के माध्यम से इस विरासत को आगे बढ़ाने का आह्वान किया, ताकि जीआई टैग का वास्तविक लाभ कलाकारों तक पहुंच सके।<br><br>शाम को <strong>फोकार्टोपीडिया फाउंडेशन</strong> की ओर से आयोजित परिचर्चा में <strong>&#8220;टिकुली और भोजपुरी पेंटिंग की चुनौतियां&#8221;</strong> विषय पर विशेषज्ञों ने अपने विचार रखे। बैठक में इस बात पर चिंता जताई गई कि समृद्ध परंपरा होने के बावजूद इन लोककलाओं के संरक्षण, प्रशिक्षण और बाजार से जोड़ने की दिशा में अभी भी काफी काम किया जाना बाकी है।<br><strong>पद्मश्री अशोक कुमार विश्वास</strong> ने कहा कि टिकुली पेंटिंग को लेकर प्रचार तो हुआ है, लेकिन गांवों में कलाकारों को प्रशिक्षण देने के लिए पर्याप्त सरकारी सहायता नहीं मिल रही है। इसका असर नई पीढ़ी के कलाकारों और रोजगार के अवसरों पर पड़ रहा है।<br>वहीं <strong>संजीव सिन्हा</strong> ने कहा कि भोजपुरी चित्रकला को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने के लिए गहन शोध, दस्तावेजीकरण और नए विषयों पर रचनात्मक प्रयोग की आवश्यकता है। साथ ही उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि आधुनिकता के साथ चलते हुए इस कला की मौलिक पहचान और लोक-संवेदना को हर हाल में सुरक्षित रखा जाना चाहिए। कार्यक्रम का संचालन प्रसिद्ध कला लेखक एवं रंगकर्मी <strong>अनीश अंकुर</strong> ने किया।</p>



<p>बताते चलें कि भोजपुरी चित्रकला को जीआई (Geographical Indication) टैग मिलने के बाद इस लोककला को लेकर कलाकारों और सांस्कृतिक संस्थाओं की सक्रियता लगातार बढ़ रही है। </p>



<figure class="wp-block-image size-full"><img loading="lazy" decoding="async" width="768" height="1024" src="https://www.patnanow.com/assets/2026/07/1001520293-scaled.jpg" alt="" class="wp-image-97756" srcset="https://www.patnanow.com/assets/2026/07/1001520293-scaled.jpg 768w, https://www.patnanow.com/assets/2026/07/1001520293-488x650.jpg 488w, https://www.patnanow.com/assets/2026/07/1001520293-1152x1536.jpg 1152w" sizes="auto, (max-width: 768px) 100vw, 768px" /></figure>



<p>इसी क्रम में 7 जुलाई को बिहार संग्रहालय में &#8220;भोजपुरी चित्रकला और भविष्य की चुनौतियां&#8221; विषय पर परिचर्चा आयोजित की गई, जिसमें विशेषज्ञों ने इस कला के संरक्षण, शोध, प्रशिक्षण और वैश्विक पहचान पर विस्तार से चर्चा की।कार्यक्रम में अपर निदेशक अशोक कुमार सिन्हा, रंगकर्मी अनीश अंकुर, पूर्व प्राचार्य अजय कुमार पांडे, प्रो. पृथ्वीराज सिंह सहित कई कलाकारों और कला विशेषज्ञों ने भाग लिया। सभी वक्ताओं ने माना कि जीआई टैग मिलने के बाद भोजपुरी चित्रकला के संरक्षण और प्रचार-प्रसार के लिए यह अनुकूल समय है।</p>
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			</item>
		<item>
		<title>मधुबनी के बाद अब पीड़िया की बारी, भोजपुर की लोककला को मिला वैश्विक मंच</title>
		<link>https://www.patnanow.com/three-local-art-got-gitag-including-bhojouri-pidiya/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[om prakash pandey]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 15 Jun 2026 02:27:10 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[भोजपुरी भाषा को अब भी इंतजार, लेकिन भोजपुरी संस्कृति ने मारी बाजी: भोजपुर की पीड़िया पेंटिंग को मिला GI टैग बिहार के तीन कलाओं को मिला GI टैग, भोजपुर की पीड़िया भी शामिल आरा/पटना,15 जून(ओ पी पाण्डेय)। भोजपुरी भाषा को आज भी संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान मिलने का इंतजार है, लेकिन भोजपुरी संस्कृति ने एक बड़ी उपलब्धि हासिल कर ली है। भोजपुर की पारंपरिक पीड़िया पेंटिंग को भौगोलिक संकेतक (GI) टैग मिल गया है। यह केवल एक कला शैली को मिली मान्यता नहीं, बल्कि भोजपुरी अस्मिता, लोक परंपरा और उन कलाकारों के दशकों लंबे संघर्ष की जीत है, जिन्होंने इस विरासत को जीवित रखा। नाबार्ड और बिहार सरकार के प्रयासों से बिहार के तीन पारंपरिक उत्पादों एवं कला शैलियों को GI टैग मिला है। इनमें भोजपुर की पीड़िया पेंटिंग के अलावा नालंदा की बावन बूटी और गया की पत्थरकट्टी शिल्पकला भी शामिल हैं। हालांकि इन तीनों में सबसे खास चर्चा भोजपुरी अंचल की पीड़िया पेंटिंग को लेकर है, क्योंकि यह पहली बार है जब भोजपुरी सांस्कृतिक परंपरा से जुड़ी किसी चित्रकला शैली को इस तरह की राष्ट्रीय पहचान मिली है। सर्जना न्यास की पहल बनी आधार जानकारों के अनुसार पीड़िया पेंटिंग को GI टैग दिलाने की प्रक्रिया में आरा की सांस्कृतिक संस्था सर्जना न्यास की भूमिका महत्वपूर्ण रही। लगभग एक वर्ष पूर्व संस्था द्वारा पीड़िया शैली से जुड़े चित्र, दस्तावेज, ऐतिहासिक संदर्भ और आवश्यक जानकारियां उपलब्ध कराई गई थीं, जिसने GI पंजीकरण की प्रक्रिया को मजबूती प्रदान की। सर्जना न्यास विश्व रिकॉर्डधारी चित्रकार संजीव सिन्हा की संस्था है। [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p><strong>भोजपुरी भाषा को अब भी इंतजार, लेकिन भोजपुरी संस्कृति ने मारी बाजी: भोजपुर की पीड़िया पेंटिंग को मिला GI टैग</strong></p>



<p><strong>बिहार के तीन कलाओं को मिला GI टैग, भोजपुर की पीड़िया भी शामिल</strong></p>



<p><strong>आरा/पटना,15 जून(ओ पी पाण्डेय)। </strong>भोजपुरी भाषा को आज भी संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान मिलने का इंतजार है, लेकिन भोजपुरी संस्कृति ने एक बड़ी उपलब्धि हासिल कर ली है। भोजपुर की पारंपरिक <strong>पीड़िया पेंटिंग</strong> को भौगोलिक संकेतक (GI) टैग मिल गया है। यह केवल एक कला शैली को मिली मान्यता नहीं, बल्कि भोजपुरी अस्मिता, लोक परंपरा और उन कलाकारों के दशकों लंबे संघर्ष की जीत है, जिन्होंने इस विरासत को जीवित रखा।</p>



<figure class="wp-block-image size-full"><img loading="lazy" decoding="async" width="1024" height="664" src="https://www.patnanow.com/assets/2026/06/1001411294-scaled.jpg" alt="" class="wp-image-97106" srcset="https://www.patnanow.com/assets/2026/06/1001411294-scaled.jpg 1024w, https://www.patnanow.com/assets/2026/06/1001411294-650x421.jpg 650w" sizes="auto, (max-width: 1024px) 100vw, 1024px" /></figure>



<p>नाबार्ड और बिहार सरकार के प्रयासों से बिहार के तीन पारंपरिक उत्पादों एवं कला शैलियों को GI टैग मिला है। इनमें भोजपुर की पीड़िया पेंटिंग के अलावा नालंदा की बावन बूटी और गया की पत्थरकट्टी शिल्पकला भी शामिल हैं। हालांकि इन तीनों में सबसे खास चर्चा भोजपुरी अंचल की पीड़िया पेंटिंग को लेकर है, क्योंकि यह पहली बार है जब भोजपुरी सांस्कृतिक परंपरा से जुड़ी किसी चित्रकला शैली को इस तरह की राष्ट्रीय पहचान मिली है।</p>



<figure class="wp-block-gallery has-nested-images columns-default is-cropped wp-block-gallery-1 is-layout-flex wp-block-gallery-is-layout-flex">
<figure class="wp-block-image size-large"><img loading="lazy" decoding="async" width="794" height="1024" data-id="97100" src="https://www.patnanow.com/assets/2026/06/1001407029-scaled.jpg" alt="" class="wp-image-97100" srcset="https://www.patnanow.com/assets/2026/06/1001407029-scaled.jpg 794w, https://www.patnanow.com/assets/2026/06/1001407029-504x650.jpg 504w, https://www.patnanow.com/assets/2026/06/1001407029-1191x1536.jpg 1191w" sizes="auto, (max-width: 794px) 100vw, 794px" /></figure>
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<p><br><br><strong>सर्जना न्यास की पहल बनी आधार</strong></p>



<figure class="wp-block-image size-full"><img loading="lazy" decoding="async" width="456" height="652" src="https://www.patnanow.com/assets/2026/06/1001411296.jpg" alt="" class="wp-image-97105" srcset="https://www.patnanow.com/assets/2026/06/1001411296.jpg 456w, https://www.patnanow.com/assets/2026/06/1001411296-455x650.jpg 455w" sizes="auto, (max-width: 456px) 100vw, 456px" /></figure>



<p><br>जानकारों के अनुसार पीड़िया पेंटिंग को GI टैग दिलाने की प्रक्रिया में आरा की सांस्कृतिक संस्था <strong>सर्जना न्यास</strong> की भूमिका महत्वपूर्ण रही। लगभग एक वर्ष पूर्व संस्था द्वारा पीड़िया शैली से जुड़े चित्र, दस्तावेज, ऐतिहासिक संदर्भ और आवश्यक जानकारियां उपलब्ध कराई गई थीं, जिसने GI पंजीकरण की प्रक्रिया को मजबूती प्रदान की। सर्जना न्यास विश्व रिकॉर्डधारी चित्रकार <strong>संजीव सिन्हा</strong> की संस्था है। संजीव सिन्हा पिछले लगभग 30 वर्षों से भोजपुरी पेंटिंग और उसकी विशिष्ट लोक शैलियों पर निरंतर कार्य कर रहे हैं। उन्होंने भोजपुरी समाज के लोकगीत, लोककथाओं, विवाह संस्कारों, पर्व-त्योहारों, कृषि संस्कृति और ग्रामीण जीवन को अपनी चित्रकला के माध्यम से देश और विदेश तक पहुंचाया है।<br><br><strong>दीवारों से निकलकर दुनिया तक पहुंचेगी पीड़िया</strong></p>



<figure class="wp-block-gallery has-nested-images columns-default is-cropped wp-block-gallery-2 is-layout-flex wp-block-gallery-is-layout-flex">
<figure class="wp-block-image size-large"><img loading="lazy" decoding="async" width="1024" height="675" data-id="97101" src="https://www.patnanow.com/assets/2026/06/1001407026-scaled.jpg" alt="" class="wp-image-97101" srcset="https://www.patnanow.com/assets/2026/06/1001407026-scaled.jpg 1024w, https://www.patnanow.com/assets/2026/06/1001407026-650x429.jpg 650w, https://www.patnanow.com/assets/2026/06/1001407026-1536x1013.jpg 1536w" sizes="auto, (max-width: 1024px) 100vw, 1024px" /></figure>
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<p>भोजपुर क्षेत्र में पीड़िया पेंटिंग सदियों से महिलाओं द्वारा बनाई जाती रही है। यह पेंटिंग बहनों द्वारा भाई की लंबी आयु के लिए 15 दिनों तक दीवार पर बनाने का एक उत्सव है। यह केवल चित्र नहीं, बल्कि लोक स्मृति का दस्तावेज है। इसमें परिवार, रिश्ते, प्रकृति, कृषि, लोकदेवताओं और सामाजिक जीवन की झलक दिखाई देती है। गांवों की मिट्टी की दीवारों पर उकेरी जाने वाली यह कला अब वैश्विक बाजार और अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचने की तैयारी में है।<br><br><strong>अब सिर्फ मधुबनी नहीं, बिहार की और भी पहचानें</strong><br>अब तक बिहार की कला का पर्याय लगभग मधुबनी पेंटिंग को ही माना जाता रहा है। GI टैग मिलने के बाद पीड़िया पेंटिंग और गया की पत्थरकट्टी शिल्पकला भी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान बनाएंगी।<br><br><strong>नालंदा की बावन बूटी</strong> हाथकरघे पर बुनी जाने वाली एक विशिष्ट वस्त्रकला है, जिसमें 52 प्रकार के बौद्ध एवं सांस्कृतिक प्रतीकों को बुना जाता है।</p>



<figure class="wp-block-image size-full"><img loading="lazy" decoding="async" width="761" height="1024" src="https://www.patnanow.com/assets/2026/06/1001411313-scaled.jpg" alt="" class="wp-image-97107" srcset="https://www.patnanow.com/assets/2026/06/1001411313-scaled.jpg 761w, https://www.patnanow.com/assets/2026/06/1001411313-483x650.jpg 483w" sizes="auto, (max-width: 761px) 100vw, 761px" /></figure>



<p>वहीं <strong>गया की पत्थरकट्टी शिल्पकला</strong> अपनी बारीक नक्काशी और काले ग्रेनाइट पत्थरों से निर्मित मूर्तियों के लिए देशभर में प्रसिद्ध है।<br><br><strong>रोजगार और पहचान दोनों बढ़ेंगे</strong><br>विशेषज्ञों का मानना है कि GI टैग मिलने के बाद पीड़िया पेंटिंग से जुड़े कलाकारों, विशेषकर ग्रामीण महिलाओं और लोक चित्रकारों के लिए नए अवसर पैदा होंगे। इससे न केवल कला का संरक्षण होगा, बल्कि कलाकारों की आय और बाजार तक पहुंच भी बढ़ेगी।<br><br><strong>यह शुरुआत है, मंजिल नहीं : संजीव सिन्हा</strong></p>



<figure class="wp-block-image size-full"><img loading="lazy" decoding="async" width="799" height="1024" src="https://www.patnanow.com/assets/2026/06/1001410057-1-scaled.jpg" alt="" class="wp-image-97104" srcset="https://www.patnanow.com/assets/2026/06/1001410057-1-scaled.jpg 799w, https://www.patnanow.com/assets/2026/06/1001410057-1-507x650.jpg 507w, https://www.patnanow.com/assets/2026/06/1001410057-1-1198x1536.jpg 1198w" sizes="auto, (max-width: 799px) 100vw, 799px" /></figure>



<figure class="wp-block-image size-full"><img loading="lazy" decoding="async" width="328" height="480" src="https://www.patnanow.com/assets/2026/06/1001409961.jpg" alt="" class="wp-image-97103" /></figure>



<figure class="wp-block-image size-full"><img loading="lazy" decoding="async" width="799" height="1024" src="https://www.patnanow.com/assets/2026/06/1001410057-scaled.jpg" alt="" class="wp-image-97102" srcset="https://www.patnanow.com/assets/2026/06/1001410057-scaled.jpg 799w, https://www.patnanow.com/assets/2026/06/1001410057-507x650.jpg 507w, https://www.patnanow.com/assets/2026/06/1001410057-1198x1536.jpg 1198w" sizes="auto, (max-width: 799px) 100vw, 799px" /></figure>



<p>चित्रकार संजीव सिन्हा का कहना है कि GI टैग मिलना एक बड़ी उपलब्धि जरूर है, लेकिन असली चुनौती अब शुरू होती है। जरूरत इस बात की है कि पीड़िया पेंटिंग को देश और दुनिया के बाजार तक पहुंचाया जाए, कलाकारों को प्रशिक्षित किया जाए और इस कला को नई पीढ़ी से जोड़ा जाए।</p>



<p>इस प्रक्रिया में मुख्य रूप से नाबार्ड के मुख्य महाप्रबंधक गौतम कुमार सिंह, भोजपुर के पुर्व प्रबंधक रंजीत सिन्हा, और जीआई पंजीकरण की प्रक्रिया में ह्यूमन वेलफेयर एसोसिएशन (HWA), वाराणसी के महासचिव, पद्मश्री डॉ. रजनीकांत जी जिन्होंने कानूनी प्रक्रिया और दस्तावेजी करण में सहायता की। इसके साथ ही सर्जना न्यास से जुड़े कलाकारों, सहयोगीयो, शुभचिंतकों की भूमिका अहम रही।</p>



<p>भोजपुरी भाषा को भले ही अब तक संवैधानिक मान्यता नहीं मिली हो, लेकिन पीड़िया पेंटिंग को मिला GI टैग यह साबित करता है कि भोजपुरी संस्कृति की जड़ें कितनी गहरी, समृद्ध और वैश्विक महत्व की हैं। यह उपलब्धि केवल भोजपुर की नहीं, बल्कि पूरे भोजपुरी समाज की सांस्कृतिक जीत है। इस खबर के बाद लगभग सभी कला के विधाओं के कलाकारों, साहित्यकारों और सांस्कृति कर्मियों के खुशी की लहर है वे सभी एक दूसरे को बधाई दे रहे हैं वही चित्रकार कमलेश कुंदन, सुरेश पाण्डेय,रौशन राय, मीरा, खुशबू,अमन सहित कई लोगों ने इसे कलाकारों के मेहनत की जीत बताया है और संजीव सिन्हा के इस प्रयास की प्रशंसा की है।</p>
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