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	<title>उत्तर भारतीय भाषा बोली और साहित्य : एक परिचर्चा &#8211; Patna Now &#8211; Local News Patna and Bihar | Breaking News Patna | Patna News</title>
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		<title>देशी मुर्गी विलायती बोल के चक्कर में पिछड़ रही है मगही</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Nikhil]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 06 Jan 2019 10:40:51 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[नई दिल्ली / पटना (ब्यूरो रिपोर्ट) &#124; रविवार 6 जनवरी को विश्व पुस्तक मेला, प्रगति मैदान में कविता कोश द्वारा आयोजित &#8220;उत्तर भारतीय भाषा, बोली और साहित्य : एक परिचर्चा &#8221; में मगही भाषा पर संवाद हेतु आमंत्रित नालंदा के युवा कवि संजीव कुमार मुकेश से जब यह सवाल किया गया कि मगही आज भोजपुरी और मैथिली से क्यों पिछड़ रही है. इस पर मुकेश ने कहा कि देशी मुर्गी विलायती बोल के चक्कर में मगही पिछड़ रही है. आज हम अपने स्टेटस को मेन्टेन करने के लिये घर में भी हिंदी तो छोड़िये अंग्रेजी को बोल चाल की भाषा बना रहे हैं. बच्चों से संवाद की भाषा भी अंग्रेजी बनती जा रही है. जबकि लोकभाषा में संवाद एक अपनापन पैदा करता है. किसी व्यक्ति तक कोई बात लोक भाषा में आसानी से दिल के करीब तक पहुंचाई जा सकती है, क्योंकि लोक भाषाएं दो व्यक्तियों को वैसे ही जोड़ती है जैसे माँ की कोख. यही कारण है कि बड़े बड़े मंचो से भी शुरुआत इस क्षेत्र की लोकभाषा के अभिवादन शब्दों के साथ खूब किया जा रहा है. मुकेश ने मगही के शुरुआती दौर से आज मगही में हो रहे समृद्ध साहित्यिक विकास की चर्चा की. इस अवसर अंगिका से प्रसून लतांत, अवधी से अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी, बज्जिका से हरि नारायण हरि, मैथिली से कैलाश मिश्र, ब्रज से श्रुति पुरी व भोजपुरी से विनय भूषण जी ने भाग लिया. कार्यक्रम का संचालन रश्मि भारद्वाज ने किया. इस अवसर पर सभी आमंत्रित कवियों साहित्यकारों को प्रतीक चिन्ह से कविता कोश के निदेशक ललित कुमार, संयुक्त [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong><img fetchpriority="high" decoding="async" class="size-full wp-image-37342 aligncenter" src="https://www.patnanow.com/assets/2019/01/pnc-magahi-1.jpg" alt="" width="650" height="366" srcset="https://www.patnanow.com/assets/2019/01/pnc-magahi-1.jpg 650w, https://www.patnanow.com/assets/2019/01/pnc-magahi-1-350x197.jpg 350w" sizes="(max-width: 650px) 100vw, 650px" />नई दिल्ली / पटना (ब्यूरो रिपोर्ट)</strong> | रविवार 6 जनवरी को विश्व पुस्तक मेला, प्रगति मैदान में कविता कोश द्वारा आयोजित &#8220;<em>उत्तर भारतीय भाषा, बोली और साहित्य : एक परिचर्चा</em> &#8221; में मगही भाषा पर संवाद हेतु आमंत्रित नालंदा के युवा कवि संजीव कुमार मुकेश से जब यह सवाल किया गया कि मगही आज भोजपुरी और मैथिली से क्यों पिछड़ रही है. इस पर मुकेश ने कहा कि देशी मुर्गी विलायती बोल के चक्कर में <img decoding="async" class="alignleft size-thumbnail wp-image-37341" src="https://www.patnanow.com/assets/2019/01/pnc-magahi--250x250.jpg" alt="" width="250" height="250" /><img decoding="async" class="size-thumbnail wp-image-37345 alignright" src="https://www.patnanow.com/assets/2019/01/pnc-magahi-4-250x250.jpg" alt="" width="250" height="250" />मगही पिछड़ रही है. आज हम अपने स्टेटस को मेन्टेन करने के लिये घर में भी हिंदी तो छोड़िये अंग्रेजी को बोल चाल की भाषा बना रहे हैं. बच्चों से संवाद की भाषा भी अंग्रेजी बनती जा रही है. जबकि लोकभाषा में संवाद एक अपनापन पैदा करता है. किसी व्यक्ति तक कोई बात लोक भाषा में आसानी से दिल के करीब तक पहुंचाई जा सकती है, क्योंकि लोक भाषाएं दो व्यक्तियों को वैसे ही जोड़ती है जैसे माँ की कोख. यही कारण है कि बड़े बड़े मंचो से भी शुरुआत इस क्षेत्र की लोकभाषा के अभिवादन शब्दों के साथ खूब किया जा रहा है. मुकेश ने मगही के शुरुआती दौर से आज मगही में हो रहे समृद्ध साहित्यिक विकास की चर्चा की. इस अवसर अंगिका से प्रसून लतांत, अवधी से अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी, बज्जिका से हरि नारायण हरि, मैथिली से कैलाश मिश्र, ब्रज से श्रुति पुरी व भोजपुरी से विनय भूषण जी ने भाग लिया. कार्यक्रम का संचालन रश्मि भारद्वाज <img loading="lazy" decoding="async" class="alignleft size-thumbnail wp-image-37344" src="https://www.patnanow.com/assets/2019/01/pnc-magahi-3-250x250.jpg" alt="" width="250" height="250" /><img loading="lazy" decoding="async" class="size-thumbnail wp-image-37343 alignright" src="https://www.patnanow.com/assets/2019/01/pnc-magahi-2-250x250.jpg" alt="" width="250" height="250" />ने किया. इस अवसर पर सभी आमंत्रित कवियों साहित्यकारों को प्रतीक चिन्ह से कविता कोश के निदेशक ललित कुमार, संयुक्त निदेशक शारदा सुमन व उपनिदेशक राहुल शिवाय ने सम्मानित किया. विदित हो कि कविता कोश अंतरजाल पर उपलब्ध भारतीय काव्य के सबसे बड़े और सुव्यवस्थित स्रोतो में से एक है. विकि तकनीक पर आधारित इस कोश की वेबसाइट पर हिन्दी व उर्दू भाषा के प्रमुख कवियों की कृतियों का संकलन है. इसके अतिरिक्त कविता कोश में अनूदित रचनाओं तथा लोकभाषा और लोकगीतो को भी संग्रहित किया गया है. यूनिकोड आधारित होने की वजह से कविता कोश में उपलब्ध सामग्री को किसी भी कम्प्यूटर पर बिना किसी विशेष सॉफ्टवेयर/फ़ॉन्ट के पढ़ा जा सकता है..<br />
<strong><span style="color: #800000;"><em>मगही में प्रकाशित पत्रिका &#8211;</em></span></strong><br />
<em>मगही</em>&#8211; संपादक, डॉ श्रीकांत शास्त्री (1953)<br />
<em>विहान</em>&#8211; संपादक, डॉ श्रीकांत शास्त्री और रामनंदन (1958)<br />
<em>सारथी</em> &#8211; मथुरा प्रसाद नवीन व मिथलेश (1971)<br />
<em>पाटली</em> &#8211; केशव प्रसाद वर्मा, दिलीप कुमार (1989)<br />
<em>मगही पत्रिका</em> (दिल्ली से), <em>झारखड मागधी</em> रांची से, <em>बंग मागधी</em> कोलकाता से, <em>अलका मागधी</em> पटना से, संपादक, धनंजय श्रोत्रिय (2001) अलका मागधी के 200 अंक निकाले गये.<br />
<em>मगध की आवाज़</em>&#8211; पारस सिंह (कोलकाता)<br />
<span style="color: #800000;"><em><strong>महाकाव्य का मगही में अनुवाद-</strong> </em></span><br />
<em>रामायण</em> &#8211; डॉ योगेश्वर प्रसाद सिंह योगेश<br />
<em>गीता</em> &#8211; उदय शंकर शर्मा<br />
<span style="color: #800000;"><strong><em>अ</em><em>न्य भाषा के पुस्तक का अनुवाद-</em> </strong></span><br />
<em>मेघदूत व गीतांजलि</em> &#8211; डॉ उदय शंकर शर्मा<br />
<em>काला पानी</em> (दस्तवस्की), <em>आज कल से हीरो</em> (लेरमंतव) <em>रशियन उपन्यास का मगही अनुवाद </em>&#8211; अनुवादक- ई नारायण प्रसाद<br />
<em>मोती के कंगन बाली लड़की</em> (कन्नड़) &#8211; अनुवादक- ई नारायण प्रसाद<br />
<em>समता के समर्थक अंबेडकर</em>&#8211; उदय कुमार भारती<br />
<span style="color: #800000;"><strong><em>मगही हाल में रिलीज़ चर्चित फ़िल्म &#8211;</em></strong></span><br />
<em>देबन मिसिर</em> (निर्देशक मिथलेश सिंह)<br />
<em>बिधाता के विधान</em> &#8211; प्रभात वर्मा<br />
<span style="color: #800000;"><em><strong>मगही की पढ़ाई:</strong></em></span><br />
पटना विश्वविद्यालय के प्रवेशिका परीक्षा में पद्य संग्रह में मगही के दू गो कविता चाँद और जगउनी (कृष्णदेव प्रसास) 1943 से पढ़ाई जा रही है. मगध विश्वविद्यालय में बीए और एमए में मगही की पढ़ाई 1965 से शुरू हुई. बिहार इंटरमीडिएट में 11वीं व 12वीं में भी मगही की पढ़ाई चल रही है. नालंदा खुला विश्वविद्यालय में मगही की पढ़ाई 2005 से चल रही है. 100 से अधिक छात्रों ने अब तक पीएचडी की उपाधि मगही में शोध पर प्राप्त किया है.</p>
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