शिल्प और शिल्पकारों को प्रोत्साहन देने में सरस मेला एक बड़ा बाजार : आमिर सुबहानी




दिसम्बर में गांधी मैदान में होगा बड़े पैमाने पर सरस मेला का आयोजन: राहुल कुमार

सरस मेला का हुआ समापन

हस्तशिल्प,स्वाद और संस्कृति के साथ ही विभिन्न तरह की कलाकृतियों से रंग से सजे और लोगों की उम्मीद और अपने आयोजन के उदेश्य पर शत-प्रतिशत खरा उतरते हुए सरस मेला का समापन रविवार को हो गया.ग्रामीण उधमिता को बढ़ावा देने के उदेश्य से ज्ञान भवन ,पटना में 2 सितम्बर से 11 सितम्बर सरस मेला आयोजित की गई थी.सरस मेला के समापन कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि आमिर सुबहानी, बिहार सरकार ने शिरकत की. समापन समारोह के दौरान अतिथियों ने स्टॉल पर भ्रमण किया और सरस मेला के आयोजन की सराहना की. सरस मंच पर आयोजित समापन कार्यक्रम के अवसर पर अपने स्वागत संबोधन में राहुल कुमार, मुख्य कार्यपालक पदाधिकारी,जीविका ने आगत अतिथियों का स्वागत करे हुए कहा कि सरस के इस प्रथम संस्करण के सफल आयोजन के बाद दिसंबर माह में गांधी मैदान में बड़े स्तर पर आयोजन होगा। इसके साथ ही उन्होंने सरस मेला के आयोजन,उदेश्य और उपलब्धियों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि सरस मेला के माध्यम से ग्रामीण शिल्प और उत्पाद को बड़ा बाज़ार और एक नई पहचान मिली है. इस अवसर पर बाला मुरुगन डी. सचिव, ग्रामीण विकास विभाग ने कहा कि सरस मेला ग्रामीण उत्पादों को प्रोत्साहन देने के साथ ही महिला सशक्तिकरण को भी गति देनी है.बाला मुरुगन डी ने कहा कि कोरोना काल के बाद यह राज्य के लिए बड़ा आयोजन है और तीन करोड़ से ज्यादा की खरीद बिक्री इसकी सफलता बताती है. मुख्य अतिथि आमिर सुबहानी ने अपने संबोधन में जीविका टीम को सबसे पहले आयोजन के लिए बधाई दी और कहा कि ग्रामीण शिल्प और शिल्पकारों को प्रोत्साहन देने के लिए सरस मेला एक बड़ा बाजार है.

मंच पर आगत अतिथियों को  समापन कार्यक्रम में सर्वश्रेष्ठ बिक्री करनेवाली, बेहतर स्वच्छता एवं साज-सज्जा के लिए स्टॉल धारकों को प्रशस्ति- पत्र देकर आगत अतिथियों ने सम्मानित किया. सम्मानित होने वालों में सर्वश्रेष्ठ बिक्री के लिए सहेली स्वयं सहायता समूह,स्वच्छता के लिए दीदी की रसोई एवं सज-सज्जा के लिए शिल्प ग्राम को पुरष्कृत किया गया. धन्यवाद् ज्ञापन राम निरंजन प्रसाद, निदेशक, जीविका ने किया. मंच संचालन संतोष कुमार, प्रबंधक, संचार, जीविका ने किया.

मेला में बिहार समेत 17 राज्यों की शिल्पकार 135 स्टॉल पर ग्रामीण शिल्प, संस्कृति एवं परंपरा को लेकर उपस्थित आयोजित हुआ.बिहार के अलावा उत्तर प्रदेश, झारखण्ड, तेलंगाना, छत्तीसगढ़, हरियाणा, गुजरात, आन्ध्र प्रदेश, आसाम, मध्य प्रदेश, महारष्ट्र, उड़ीसा,पंजाब, राजस्थान,सिक्किम एवं प. बंगाल से स्वयं सहायता समूह से जुड़ी ग्रामीण शिल्प कार अपने यहाँ की शिल्प,संस्कृति,परंपरा एवं व्यंजन को लेकर उपस्थित हुए. मेला में कैशलेश खरीददारी की भी व्यवस्था की गई थी.

जीविका दीदियों द्वारा संचालित शिल्प ग्राम, मधुग्राम एवं सोलर स्टॉल के प्रति लोगों के आकर्षण का केंद्र बने रहे.मेला परिसर की स्वच्छता काबिले तारीफ़ रही और आगंतुकों ने भी टीम जीविका के कुशल प्रबंधन को सराहा.2 सितंबर से जारी सरस मेला के अंतिम दिन खरीद बिक्री का आंकड़ा लगभग सवा तीन करोड़ रूपया पार कर गया. अंतिम दिन रविवार को पचास हजार से ज्यादा लोग आये और खरीददारी की . इस सरस मेला में सबसे ज्यादा खरीद-बिक्री हाजी अली उत्पादक समूह ,ओड़िसा के स्टॉल से हुई . हाजी अली के स्टॉल से 6 लाख से ज्यादा परिधान की बिक्री हुई. तारा जीविका स्वयं सहायता समूह ,कैमूर,बिहार के स्टॉल से लगभग पांच लाख के हस्तशिल्प की बिक्री हुई. जीविका द्वारा संचालित दीदी की रसोई के स्टॉल से साढ़े 4 लाख से ज्यादा के व्यंजनों की बिक्री हुई.हजारों वर्षों के स्वर्णिम इतिहास और समृद्ध संस्कृति को अपने आँचल में समेटे भारत के गाँवों की मिट्टी की खुशबु से सराबोर एक सतरंगी मंच “सरस मेला” जो शहर वासियों को अपने धरोहर से जुड़ने का अवसर प्रदान करता है. वर्ष 2014 से जीविका के तत्वाधान में आयोजित बिहार सरस मेला ग्रामीण भारत की कला एवं संस्कृति का एक अनूठा संगम है . विगत 2 वर्षं से कोरोना महामारी की त्रासदी से परेशान लोगों को एक बार पुनः आनंद का अनुभव प्राप्त करने का एक अवसर प्रदान करने की दिशा में इस वर्ष 02 सितंबर से 11 सितंबर 2022 तक पटना के ज्ञान भवन में सरस मेला का सफल आयोजन किया गया.

सरस मेला के आयोजन का मुख्य उद्देश्य धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही कला एवं संस्कृति को पुनर्जीवित करना और लोगों को अपनी मूल संस्कृति से जोड़ना है. हर वर्ष सरस मेला में भारत के विभिन्न राज्यों से छोटे-छोटे शिल्पकारों और ग्रामीण उद्यमियों को आमंत्रित्त किया जाता है और पूरे 10 दिनों तक उनकी कला का प्रदर्शन सह बिक्री का कार्यक्रम आयोजित किया जाता है. मेले में आनेवाले सभी आगंतुक मेले में मौजूद उत्पादों को देख कर भावविभोर हुए बिना नहीं रह पाते.बिहार के मिथिलांचल की ओर से मधुबनी चित्रकला, सिक्की कला और मखाना, भागलपुर से सिल्क से बने मनोरम परिधान, कैमूर से दरी और कालीन, मुजफ्फरपुर से लहठी और चूड़ी , पूर्वी चंपारण से आये सीप से बनी कलाकृतियों के साथ-साथ कटिहार के आये बांस से बने गृह सज्जा के उत्पाद, पटना जिले से कांस्य एवं पीतल धातु से बने बर्तन, भोजपुर से क्रोसिया कला, दरभंगा और मधेपुरा से आये चमरे केउत्पाद, पूर्णिया से आये मलबरी के धागों से बनी सुन्दर साड़ियाँ, गया जिले के पत्थारकट्टी कलाएवं लकड़ियों से बने से बने गृह सज्जा के उत्पादों के सस्थ-साथ भागलपुर के कतरनी चावल और चुडा ने पूरे सरस मेला को अपनी सुन्दरता और खुशबु से सराबोर कर दिया.

अन्य राज्यों की बात करें तो उत्तर प्रदेश से आये शिल्पकारों द्वारा निर्मित मनमोहक दरी और कालीन के साथ-साथ चादर और सोफे पे बिछाए जानेवाले सुन्दर कलाकृतियों और चमरे के उत्पादों के साथ मध्य प्रदेश से आये बाटिक प्रिंट की साड़ियाँ, आन्ध्र प्रदेश से आये लकड़ी के गृह सज्जा के उत्पाद, ओड़िसा से आये सवाई घांस से बने साज-सज्जा के उत्पाद एवं सांस्कृतिक परिधान, हरियाणा से एप्लिक कला से सुसज्जित चादर और साड़ियाँ, गुजरात के कच्छ के रण से आये कच्छी कला से बने परिधान और हाश्त्शिल्प उत्पाद, झारखंड से आये जन जातीय कबीलों से आये हुए शिल्पकारों द्वारा निर्मित हर्बल औषधियों के साथ साथ मनमोहक आदीवा गहने और जूट से बने अन्य उत्पाद अपने आप में एक कहानी बयान करते हैं. झारखण्ड के जनजातीय कबीलों द्वारा बनाए गए इन गहनों की मांग पूरे देश के जाने-माने संस्थान करते हैं और उन्हें अपने मंच से प्रोत्साहित करते हैं. असाम से आये बांस से बने उत्पाद, पंजाब से आये फुलकारी कला से बने परिधान, सिक्किम से आये हस्तनिर्मित परिधान, पश्चिम बंगाल से आये खजूर के पत्तों से बने मनमोहक कृत्रिम फूलों एवं पत्थर तथा बांस के बने उत्पाद, तेलंगाना से छोटे बच्चों के हस्तनिर्मित परिधान एवं जूट तथा चमरे से बने उत्पाद, छत्तीसगढ़ से आये अत्यंत मनमोहक सलवार-सूट और साड़ियों ने इस सरस मेला को पूर्ण रूप से जीवंत कर दिया.

सरस मेला 2022 में जहाँ हस्तशिल्प के वर्गीकृत स्टाल्स से पूरे मेले में कुल 78 लाख रुपयों का कारोबार हुआ तो वहीँ कपड़ों और अन्य परिधानों के स्टाल्स से लगभग 1 करोड़ 25 लाख रुपयों का कारोबार हुआ. मेले के अन्य हस्तनिर्मित कलाकृतियों एवं उत्पादों के स्टाल्स से 40 लाख रुपयों की बिक्री हुई .मेले के एक विशेष भाग ने मेले में आये आगंतुकों को खाने-पीने के स्वादिष्ट व्यंजनों का लुत्फ़ उठाने का अवसर भी प्रदान किया जहाँ बिहार और महाराष्ट्र के पारंपरिक व्यंजनों के साथ-साथ जीविका द्वारा संचालित “दीदी की रसोई” की दीदियों ने लोगों को अपनी उंगलिया चाटने को विवश कर दिया. रोहतास की गोड़ई मिठाई, बाढ़ जिले का पेड़ा और लाइ, सुपौल का खाजा, पटना का चनाजोर गरम, किसान चाची का मशहूर अचार, और दीदी की रसोई के लिट्टी चोखा, ढोकला, दही बड़ा और ऐसे ही अनन्य स्वादिष्ट व्यंजनों ने आगंतुकों का भरपूर मनोरंजन किया. व्यंजनों के इस भाग में दिनांक 2 सितंबर से 11 सितमबर तक लगभग 37 लाख रूपये का कारोबार हुआ.ग्रामीण संस्कृति के हर एक पहलु को जीवंत और उजागर करता यह सरस मेला हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी इस मेले में आये आगंतुकों केसाथ-साथ मेले में भाग लेने वाले ग्रामीण उद्यमियों के जीवन पे एक अमित छाप छोड़ने में सफल रहा.

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