आखिर ऐसा “क्या” हुआ कि एक ही दिन में सारा गुस्सा ठंढा पड़ गया?

पटना (अनुभव सिन्हा की कलम से), 5 April । मौजूदा माहौल में सुप्रीम कोर्ट की भूमिका यदि वैसी न हो जैसी है, तो देश का हाल कैसा होता ? यह सवाल न्यायिक प्रणाली की मजबूती से इंकार नहीं करता, लेकिन देश में जिस तरह से राजनीतिक कलह को हवा दी जा रही है, उसका जवाब भी नहीं देता. इसमें सुप्रीम कोर्ट क्या करे ? अर्जित शाश्वत को दंगा भड़काने के आरोप में जेल भेज दिया गया. लेकिन रामनवमी में दंगे की साजिश अपने चौदह दिनों के प्रवास में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने रची, यह आरोप लगाने वाले तेजस्वी को बोलने के लिए खुला क्यों छोड़ दिया गया ? एक दिलचस्प तथ्य यह भी है कि साम्प्रदायिक माहौल बिगाड़ने के आरोप में सत्ता पक्ष के लोग ही बुक हुए लेकिन माहौल को उन्मादी बनाने वाले विपक्ष का एक भी नेता पुलिस की जद में नहीं आया !!! रोहतास में मुख्यमंत्री के काफिले पर हमला हुआ और सीएम ने सामूहिक माफी दे दी उसका लिहाज रखा गया क्या ? फिर माहौल बिगाड़ने वालों को चिन्हित करने का यह कौन सा तरीका है जिससे समाज में सद्भाव स्थापित होगा और इसे कोई बताना जरूरी नहीं समझता !!!
विकास से जुड़े सामाजिक सरोकारों पर सुप्रीम कोर्ट ने अपनी पैनी नजर रखी है जिससे नेताओं , सफेदपोशों और भ्रष्टाचारियों के होश फाख्ता होते रहे हैं लेकिन इसका ग्रे एरिया वह तमाम अवमाननावाद हैं जो यही साबित करते हैं कि न्यायिक प्रणाली में कार्यपालिका हस्तक्षेप भले न करे लेकिन क्रियान्वयन के मामले में हीला-हवाली करने से बाज भी नहीं आती. उदाहरण के लिए अनुसूचित जाति-जनजाति अधिनियम को लेकर 20 मार्च को दिए गए फैसले के खिलाफ दो अप्रैल का भारत बंद जितना हिंसक रहा हो और सरकार पर दबाव बनाने की कवायद से किया गया हो, सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले पर रोक से साफ इंकार कर दिया. इस एक इंकार ने दलितों के आक्रोश को ठंढा कर दिया. यहीं सवाल पैदा होता है, क्या बंद के दौरान की गई हिंसा साजिशन नहीं थी ? आखिर ऐसा “क्या” हुआ कि एक ही दिन में सारा गुस्सा ठंढा पड़ गया ? यह साफ है कि अदालत से लड़ना कोई नहीं चाहता लेकिन अपनी सियासत के लिए समाज को अस्थिर करने में भी किसी को परहेज नहीं है. भड़काउ बातें कहना, बिना आधार के दोषारोपण करना और समाज को उद्वेलित करना भी तो असंवैधानिक यानि गैर कानूनी ही है. इस बिन्दू पर सरकार सियासत के जरिए नफा-नुकसान देखने के बजाए ऐसा करने वालों को चिन्हित क्यों नहीं करती ? यह तो वैसा ही है जैसे पति की भले मौत हो जाए लेकिन सौतन विधवा होनी ही चाहिए.