जनजातीय प्रतीकों को वैश्विक पहचान दिलाते: एल अनात्सुई

एल अनात्सुई का कला स्टूडियो इन दिनों नाइजीरिया के एनसुक्का, एनुगु में अवस्थित है, जहां रहकर उन्होंने आज दुनिया भर को प्रभावित करने में सक्षम अनेक कलाकृतियां रची हैं।

कला जीवन का प्रतिबिंब है। जीवन कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे हम काट कर ठीक कर सकते हैं। यह हमेशा प्रवाहमान रहता है।

मैं ऐसी जगह से आता हूं जहां आपके पास बहुत बड़ा आसमान है। लेकिन [न्यूयॉर्क शहर में] आपको यह महसूस करने के लिए वास्तव में आसमान को निहारना होगा तब शायद आपको लगे कि कहीं न कहीं आकाश है। …वैसे आकाश कोई सामान्य वस्तु नहीं है।
शुरू में मैं मूर्तिकला से जुड़ा था – मूर्तिकला में यह स्वतंत्रता होती है कि आप किसी भी तरह से उसका रूप बदल सकते हैं। आप इसे सिकोड़ सकते हैं, तो आप इसे फैला भी सकते हैं, आप इसे किसी भी तरह का आकार दे सकते हैं।
मेरा काम (कलाकृति) अब पेंटिंग और मूर्तिकला के बीच का संयोजन है।
मैं कलाकृतियों में निश्चित होने वाली चीजों में विश्वास नहीं करता।

यदि आप अपना देश छोड़ते हैं तो आप एक प्रकार की खानाबदोश मानसिकता और एक ऐसी मानसिकता विकसित करते हैं जो चाहती है कि आप घूमते रहें। अगर मैं घाना में रहता तो मेरा दिमाग उस तरह सक्रिय नहीं होता, या कहें कि मेरे अनुभवों का विस्तार नहीं हुआ होता। या मैं बहुत आराम से होता।

मेरी कलाकृतियों की योजना में भूगोल और वे सभी चीजें बहुत ज्यादा मायने नहीं रखती हैं। मुझे लगता है कि सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कोई व्यक्ति कहीं पहुंचने या संवाद करने में सक्षम है। मुझे लगता है कि लोग भूगोल का उपयोग यह देखने के लिए करना चाहते हैं कि क्या वे आपको समझ सकते हैं, या कुछ इसी तरह की बातों के लिए। इसलिए मुझे यकीन है कि कला इतिहासकार और मानवविज्ञानी भूगोल, या जातीय समूह या ऐसी चीजों के आधार पर ही लोगों का वर्गीकरण करेंगे।

एक चीज जिसके बीच मैं बड़ा हुआ हूं, वह है उन चीजों के साथ काम करना जो पहले इस्तेमाल की जा चुकी हैं – ऐसी चीजें जो लोगों को एक साथ जोड़ती हैं। मुझे डीएनए के बारे में पता नहीं है, यदि आप किसी चीज को छूते हैं तो आप उस पर एक ऊर्जा (आवेश) छोड़ देते हैं, और बाद में इसे छूने वाला कोई भी व्यक्ति इस तरह आपसे एक तरह से जुड़ जाता है। और तथ्य यह है कि इंसानों द्वारा इस्तेमाल की गई हर चीज का एक इतिहास होता है, इसलिए यह गुण मुझे लगता है कि कुछ अर्थ हासिल करने के लिए मेरी रचनाओं में मेरी मदद करती है।
बोतल के ढक्कन के साथ अब मैं कोई कलाकृति नहीं बनाता। हो सकता है कि आप अपने आप को किसी विशेष विचार का गुलाम बना रहे हों। लेकिन मैं चीजों को इधर-उधर करते रहने की आजादी का आनंद लेना चाहता हूं ।
शुरू में मुझे नहीं लगता था कि मैं पेंटिंग के करीब या पेंटिंग से संबंधित कुछ कर रहा हूं। जैसे-जैसे समय बीतता गया, मैंने देखा कि कुछ ऐसे तत्व थे जिन्हें मैं विभिन्न ढक्कनों के रंगों की तरह अनदेखा कर रहा था – लाल, काला सफेद, पीला सब थे वहाँ। तो मैं भी इस बात के प्रति जागरूक होने लगा।

अल अनात्सुई घाना मूल के मूर्तिकार हैं, जिन्होंने अपने कलाकार जीवन का अधिकांश समय नाइजीरिया में बिताया है। एल अनात्सुई का कला स्टूडियो इन दिनों नाइजीरिया के एनसुक्का, एनुगु में अवस्थित है, जहां रहकर उन्होंने आज दुनिया भर को प्रभावित करने में सक्षम अनेक कलाकृतियां रची हैं। देखा जाए तो वे अफ्रीकी कला इतिहास के सबसे अधिक प्रशंसित कलाकारों में से एक हैं, इतना ही नहीं आज वैश्विक समकालीन कला की दुनिया के वे एक महत्वपूर्ण कलाकार बन चुके हैं। अपनी कलाकृतियों के निर्माण के लिए अनात्सुई आमतौर पर उपयोग के बाद छोड़े गए संसाधनों इस्तेमाल करते हैं जैसे शराब की बोतल के ढक्कन और कसावा (एक स्थानीय फसल ) का।




अपनी कलाकृतियों के निर्माण में इन सामग्रियों का उपयोग और पुन: उपयोग व परिवर्तन, देश काल की सीमाओं को पार करते हुए भी अपने महाद्वीप से जुड़ने की उनकी आंतरिक इच्छा को दर्शाता है। अनात्सुई अपने उन मूर्तिशिल्पों के लिए प्रसिद्ध है, जो स्थानीय अल्कोहल रीसाइक्लिंग स्टेशनों से प्राप्त एल्यूमीनियम बोतल के ढक्कन के हजारों मुड़े हुए और टूटे हुए टुकड़ों से बनी होती है और तांबे के तार से एक साथ बंधी होती है। एल अनात्सुई का जन्म 1944 में घाना के एनाको में हुआ था, उनके पिता कपडा बनाने के काम में सिद्धहस्त थे। उन्होंने कुमासी के विज्ञान और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय में कला प्रशिक्षण प्राप्त किया, जो घाना के सर्वोच्च रैंकिंग विश्वविद्यालयों में से एक है। 1975 में विश्वविद्यालय से स्नातक की उपाधि प्राप्त करने के बाद उन्होंने नाइजीरिया विश्वविद्यालय, नसुक्का में मूर्तिकला के प्रोफेसर के रूप में पढ़ाना शुरू किया। उन्होंने चार दशकों से अधिक समय तक यहाँ पढ़ाया।

नाइजीरिया विश्वविद्यालय के कला संकाय के सदस्य के रूप में, एल अनात्सुई ने अपने स्वदेशी प्रतीकों, घाना के रूपांकनों और वैचारिक और तार्किक प्रतीकवाद के साथ-साथ दक्षिणपूर्वी नाइजीरिया के स्थानीय जनजातियों की उली एवं नसिबिडी शैली को अपने काम में शामिल करना शुरू किया। वह जल्द ही उली शैली को पुनर्जीवित करने और समकालीन कला में इसके डिजाइनों को शामिल करने के साझा दृष्टिकोण के साथ नसुक्का नामक एक कला समूह से जुड़ गए। अनात्सुई की कलाकृतियों को समझने के लिए यहाँ इस उली (उरी) एवं नसीबीदी (नसिबिरि) के बारे में जानना आवश्यक होगा। उली (उरी) दक्षिणपूर्वी नाइजीरिया के इग्बो जनजातीय समाज द्वारा तैयार एक घुमावदार पारंपरिक डिजाइन हैं। ये डिज़ाइन आम तौर पर अमूर्त होते हैं, जिसमें रैखिक रूप और ज्यामितीय आकार होते हैं। परंपरागत रूप से, इन्हें या तो शरीर पर दाग दिया जाता है या इमारतों के किनारों पर भित्ति चित्रों के रूप में चित्रित किया जाता है। ये डिजाइन अक्सर विषम होते हैं और अक्सर अनायास ही रंगे जाते हैं। पूजास्थलों की दीवारों पर चित्रित और कुछ सामुदायिक अनुष्ठानों के संयोजन में बनाई गई छवियों के अलावा, उली को आम तौर पर पवित्र नहीं माना जाता है।

बात करें नसीबीदी की तो इसे नसिबिरि के नाम से भी जाना जाता है, यह दक्षिण नाइजीरिया में विकसित प्रतीकों या प्रोटो-लेखन की एक प्रणाली है, जिसे चित्रलेख के रूप में वर्गीकृत किया गया है। इस प्रतीक प्रणाली के बारे में पहली बार 1904 में जानकारी सामने आयी थी। कैलाबार क्षेत्र में खुदाई से टेराकोटा के जहाजों, हेडरेस्ट और एंथ्रोपोमोर्फिक मूर्तियां मिली हैं जिसका काल 5 वीं से 15वीं शताब्दी तक का माना जाता है। इसमें प्रयुक्त आइकनोग्राफी को इस नसीबीदी शैली से जोड़कर देखा जाता है। इस विशिष्ट लेखन शैली में कई सौ प्रतीक चिन्ह हैं। इस लिपि को कभी स्कूली बच्चों को पढ़ाया भी जाता था। इनमे से कई संकेत प्रेम संबंधों से संबंधित हैं; लेकिन जो संकेत युद्ध और पवित्रता से संबंधित हैं उन्हें गुप्त रखा जाता था। इस शैली का उपयोग दीवार के डिजाइन बनाने, धातु पर अंकन करने, पत्ते व तलवारों पर अंकित करने के लिए किया जाता रहा है। इस शैली का प्रयोग वहां के एक खास जनजातीय समाज जिसे एनजीबी या एगबो के नाम से भी जाना जाता है द्वारा किया जाता है। यूं तो अनात्सुई की आरंभिक वैश्विक पहचान एक मूर्तिकार के तौर पर बनी, किन्तु हाल ही में उन्होंने अपना ध्यान इंस्टॉलेशन आर्ट पर केंद्रित किया है। उनकी कुछ कृतियाँ बुने हुए कपड़े जैसे कांटेदार कपड़ों से मिलती-जुलती हैं, लेकिन इसे वे वस्त्रों या महज कपड़ों की बजाए मूर्तिशिल्पों के तौर पर सामने लाते हैं । अनात्सुई के अनुसार, “कला प्रत्येक विशेष परिस्थिति से विकसित होती है, और मेरा मानना है कि कलाकारों के लिए बेहतर होगा कि वे अपने परिवेश से जुडी वस्तुओं के साथ प्रयोग करें ।” एक पश्चिमी कला समीक्षक ने कहा है कि अनात्सुई के बॉटल टॉप्स की तुलना “ड्यूचैम्प्स के साइकिल व्हील” से की जा सकती है।”

  • सुमन कुमार सिंह